Nov 5, 2016

कब मिलेगी ब्याज से मुक्ति ?


कर्ज न चुका पाने पर साहूकारों ने कहा कि पत्नी और बेटी को हमें सौंप दो। इससे अनिल अग्रवाल को गहरा सदमा लगा और उनके पूरे परिवार ने ज़हर खाकर मौत को गले लगा लिया। यह मामला जालंधर [पंजाब] के भोगपुर थाने का का है। इस घटना से साफ पता चलता है कि पंजाब में गरीब लोगों का किस तरह साहूकार शोषण कर रहे हैं। सुसाइट नोट में 55 वर्षीय अनिल अग्रवाल ने लिखा है कि उनसे कुछ लोगों से ब्याज पर आधारित क़र्ज़ लिया था। मगर मूलधन पर ब्याज बढ़ता ही गया। पैसा देने वाले लोग कहते हैं कि वह पत्नी और बेटी को उठा ले जाएंगे, जिससे आहत होकर वह परिवार सहित जान दे रहा है। पुलिस ने घर से अनिल, पत्नी रजनी और 18 वर्षीय राशि और 23 वर्षीय बेटे अभिषेक का शव बरामद किया। सभी ने सल्फास का सेवन कर आत्महत्या की। मौके से सल्फास की शीशी और पानी की बोतल मिली।
हमारे देश में ब्याजमुक्त क़र्ज़ एक सपने की तरह है | हम आयेदिन ब्याज से विभिन्न प्रकार की हानियों को देख रहे हैं | ब्याज ने हमारे देश समेत दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को आहत कर रखा है , फिर भी इसके विरुद्ध कारगर आवाज़ का न उठ पाना बेहद अफ़सोसनाक है | इस्लाम में ब्याज की सभी सूरतें वर्जित हैं | यह बड़े गुनाह का काम है | यह माँ के साथ व्यभिचार के सदृश है | अतः इससे बचने के सभी प्रयास किये जाने चाहिए |
मानसिक तनाव और दबाव आत्महत्या के प्रमुख कारण हैं। सत्य है कि किसान अक्सर बैंकों से ऋण लेते हैं और उसकी अदायगी नहीं कर पाते , चक्र वृद्धि व्याज इसमें अति घातक भूमिका निभाता है | उनके लिए सरकार की भी ' कल्याणकारी राज्य ' की परिकल्पना साकार नहीं हो पाती | सरकार का अनुदारवादी चेहरा ही उन्हें अक्सर देखना पड़ता है | वे इस विषम परिस्थिति का मुक़ाबला नहीं कर पाते और कायरतापूर्ण क़दम उठा लेते हैं | निःसंदेह आज चहुंओर विकट स्थिति है | इतनी विकट कि कहा जाता है कि आज के दौर में शायद दुनिया में कोई ऐसा आदमी न होगा , जिसने अपने जीवन में कभी आत्महत्या करने के बारे मे न सोचा हो।
ऐसा भी होता है कि अनायास या सप्रयास वह बुरा वक्त गुजर जाता है और जिन्दगी फिर अपनी रप्तार से चल पड़ती है । सच यही है कि यदि वह समय गुजर जाये जिस समय व्यक्ति आत्मघात की ओर प्रवृत्त होता है , तो फिर वह आत्महत्या नहीं करेगा | कुछ कहते हैं कि आत्महती लम्बे समय से तनाव में था। महीने? दो महीने? छः महीने? मगर यह मुद्दत तो गुज़ारी जा सकती है | क्या बरसात के बाद सर्दी और सर्दी के बाद गर्मी की ऋतु नहीं आती ? क्या पतझड़ के बाद वसंत नहीं आता ? फिर जिन्दगी में हॅंसी - खुशी के दिन क्यो नहीं आ सकते हैं ? जिन्दगी हजार नेमत है |
वास्तव में जिन्दगी को जीना चाहिए | उसे जीना इन शब्दों में चाहिए कि उसे स्वाभाविक ज़िन्दगी मिले | ज़िन्दगी को निराशा से परे रखना चाहिए |. ठहरा हुआ तो पानी भी सड़ जाता है | अतः ज़िन्दगी में ठहराव अर्थात स्वांत नहीं आना चाहिए . ज़िन्दगी तो है ही चलने का नाम | ये जो गमो की स्याह रात है कितनी भी लम्बी हो कट ही जायेगी . फिर सुबह होगी, सूरज निकलेगा,फूल खिलेंगें, भौंरे गुनगुनायेंगें, पंछी चहचहायेंगें. फिर ज़िन्दगी में ही कैसे अन्धकार कैसे कायम रह सकता है ?
हमेशा सुबह की आशा रखनी चाहिए | लेकिन फिर सवाल यह आएगा कि यह संभव कैसे होगा , तो इसके लिए धार्मिकता को अपनाना ज़रूरी है | वह भी सच्ची धार्मिकता | जब कार्य ईश्वर के इच्छानुसार किये जाएंगे और उसे ही कार्यसाधक भी माना जाएगा , तो ज़िन्दगी में निराशा , चिंता . कुंठा और हतोत्साह का आना असंभव है | दिल में सरलता और निर्मलता आ जाएगी . चिन्तन सकारात्मक होगा |


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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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