Nov 18, 2016

पुलिस सुधार का सहज सवाल

पुलिस सुधार का सहज सवाल
भोपाल - मुठभेड़ के बाद एक बार फिर पुलिस की कार्यशैली विभिन्न सवालों के घेरे में है | हक़ीक़त यह है कि यह महत्वपूर्ण विभाग हमारे देश में सरकार का ग़ुलाम बना रहता है | अतः इसके नसीब में कभी नहीं था और है कि यह आज़ादाना काम करे | निष्पक्षता तो इसके बस की बात नहीं ! सत्तारूढ़ राजनेताओं का बल बनी पुलिस से न्याय और इन्साफ की कैसे आशा की जा सकती है ? यह तथ्य भी बार - बार उजागर हो चुका है कि राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण भी वे अपराध बढ़े हैं , जिन्हें पुलिस ख़ुद अंजाम देती और दिलवाती है |
भोपाल पुलिस द्वारा सिमी के आठ कथित आतंकवादियों को मुठभेड़ बताकर मार गिराने को इसी कारण के अंतर्गत माना जा रहा है | इस घटनाक्रम पर बहुतेरे सवाल पैदा हुए हैं |
दिल्ली पुलिस भी अब अपनी कार्रवाइयों से बदनाम है | उत्तर प्रदेश की पुलिस बरसों से जातीय रंग में रंगी हुई है | वहां आपराधिक भ्रष्टाचार के साथ जातिवाद का बोलबाला है | इस प्रदेश में भी पुलिस अपने आक़ाओं की ग़ुलाम है और वे सारे काम करती है , जो उसे कभी करना चाहिए | अखिलेश यादव के चहेते मंत्री राम मूर्ति सिंह वर्मा के इशारे पर तत्कालीन पुलिस कोतवाल श्रीप्रकाश राय ने अपने साथ चार पुलिसकर्मियों को शाहजहांपुर के पत्रकार जागेन्द्र सिंह को विगत एक जून 2015 को जिन्दा जला दिया , फिर भी इन सबको निलंबन की दिखावटी कार्रवाई के बाद साफ़ बचा लिया गया | पुलिस ने पूरे मामले को गलत ढंग से विवेचित कर दिया !
बिहार पुलिस भी बार - बार अपने निकम्मेपन को साबित कर चुकी है | वह आज के युग में भी जातीय आधार पर चूल्हा - चौके का इन्तिज़ाम करवाती है | इस अफ़सोसनाक सूरतेहाल में पुलिस की कार्यप्रणाली और विवेचना कैसी होगी , सभी को सहज ही समझ में आ सकती है | पुलिस की खराब कार्यप्रणाली और गलतकारी से पुलिस सुधार आयोग सदैव चिन्तित रहता है | उसका मानना है कि पुलिस का वर्तमान तौर - तरीक़ा संतोषजनक नहीं है |
पुलिस सुधार आयोग भी पुलिस तंत्र में सतत सुधार की सिफ़ारिशें करता रहता है , क्योंकि उसका मानना है कि पुलिस का वर्तमान तौर - तरीक़ा संतोषजनक नहीं है | पुलिस सुधार आयोग की सिफ़ारिशों में एक महत्वपूर्ण सिफ़ारिश थानों में पुलिस प्रशासन से अलग एक विवेचना इकाई की स्थापना है , ताकि मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई संभव हो सके | ऐसी सिफ़ारिश विवेचना अधिकारियों द्वारा दबाव में काम करने एवं इस प्रकार न्याय की जगह अन्याय का पैरोकार बनने की शिकायतों के कारण की गयी थी , जिस पर अभी तक अमल नहीं हो सका है |
सत्ता व पुलिस का जो गठजोड़ है , वह एक - दूसरे के मनोबल के प्रति इतना फिक्रमंद होता है कि आम नागरिक का मनोबल बरक़रार न रह सके | देखा जाता है कि इस पूरे मनोबल को बचाने में विवेचनाधिकारी लगा रहता है, जो सबूतों का अभाव खड़ा कर उन्हें बरी करवाने की कोशिश करता है | आजकल सीबीआई भी दबावों से मुक्त नहीं है | अल्पसंख्यकों के मामले में पुलिस की भूमिका क्या होती है ? हम इसे बार - बार देखते और भुगतते हैं | भोपाल में इसे हाल में एक बार फिर देखा गया | अब सारी निगाहें इस कथित मुठभेड़ की जाँच पर लगी हैं | इसकी जाँच भोपाल हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज एस . के . पाण्डेय कर रहे हैं |
देश में पुलिस द्वारा की गई फर्जी मुठभेड़ों की जांच चाहे वह यूपी के सोनभद्र में रनटोला कांड, जहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दो छात्रों को डकैत बताकर की गई हत्या का मामला हो या फिर उत्तराखंड के रणवीर हत्याकांड की हो इन सभी में विवेचनाधिकारी ने पुलिस अधीक्षक का नाम न लेकर उसे बचाने का कार्य किया है , जबकि सजा पाने वाले पुलिस कर्मियों ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि ऐसा उन्होंने एसपी के कहने पर किया था | निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है| इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ कांड को कौन भूल सकता हैं, जिसमें राज्य के पुलिस अधिकारियों पर राज्य सरकार के संरक्षण में हत्या का आरोप है |
वहीं उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से गिरफ्तार किए गए तारिक-खालिद की गिरफ्तारी पर गठित निमेष कमीशन, गिरफ्तारी को संदिग्ध मानते हुए पुलिस के अधिकारियों को दोषी मानता है, वहीं इस मामले के विवेचनाधिकारी ने पुलिस की गिरफ्तारी को सही माना है| इसी तरह छत्तीसगढ़ में सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर डालने वाले पुलिस अधिकारियों में से एक एसपी अंकित गर्ग को राष्ट्रपति द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जाता है ! यह एक बड़ी विडंबना है | सर्वोच्च न्यायालय विवेचनाधिकारी को एक स्वंतंत्र जांच अधिकारी के बतौर कार्य करने की बात कहता है | पुलिस की कार्यशैली में आमूल सुधार की ज़रूरत है | भोपाल मुठभेड़ की सही ढंग से जाँच कराकर इसकी शुरूआत की जानी चाहिए |


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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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