Nov 18, 2016

काले धन के ख़िलाफ़ 9/11 ?


यह तरीक़ा प्रभावकारी नहीं !

विदेश से चाहे काला धन स्वदेश आए या न आए , पांच सौ और हज़ार रुपये के नोट 9 नवंबर से बंद कर दिए और दावा कर दिया गया कि यह काले धन के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक व 9 / 11 है | अतः केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू का यह ट्वीट उचित ही कहा जाएगा कि ' भ्रष्टाचार और काले धन पर श्री नरेंद्र मोदी जी की सर्जिकल स्ट्राइक | भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भारत की लड़ाई में साथ दें | ' वैसे यह फ़ैसला स्वागतयोग्य है , लेकिन पूर्व तैयारी और प्रबंध के पूरी जनता से बड़े नोटों को छीन लेना एवं उन्हें परेशानियों में डाल देना कतई सराहनीय नहीं है | अभी दस रूपये के सिक्कों को लेकर पूरे देश में बक - झक चल रही थी | इसी बीच बड़े नोटों पर सर्जिकल स्ट्राइक करके उन्हें एकबारगी नष्ट कर जनता को अनावश्यक परेशानी में डाला गया | यह काम जनता को कम 'आहत ' करके चरणबद्ध भी हो सकता था | सरकार को शायद यह वह्म और गुमान है कि इस क़दम से काला धन बाहर आकर ही रहेगा और भ्रष्टाचार का अंत हो जाएगा | सच्चाई यह है कि हमारे देश में काला धन सिर्फ पांच सौ और हज़ार रूपये के नोटों तक सीमित नहीं है | देश के काले धन का एक उल्लेखनीय हिस्सा विदेशी बैंकों और विदेशी संपत्तियों में लगा हुआ है | साथ ही स्वदेश में काला धन रियल इस्टेट , सोना , ज़मीन और अन्य बेनामी संपत्तियों में लगा हुआ है | इन वास्तविकताओं को देखते हुए कोई कैसे कह सकता है कि काला धन अब नष्ट होकर ही रहेगा ? हाँ , कुछ ऐसी रक़म का ज़रूर पता चलेगा , लेकिन काले धन के शातिर खिलाड़ियों पर बड़े नोटों को बंद कर देने से विशेष प्रभाव पड़ने से रहा ! डॉ . मनमोहन सिंह ने भी प्रधानमंत्री की हैसियत से 2005 से पूर्व के पांच सौ के नोटों को बंद किया था , लेकिन उनका यह काम चरणबद्ध था | यह प्रयोग एक नहीं दो बार हो चुका है। 16 जनवरी 1978 को मोरारजी देसाई सरकार ने 500, 1000, पांच हजार और 10 हजार के नोटों को बंद करने का काम किया था। लेकिन उसका क्या नतीजा निकला? क्या उससे भ्रष्टाचार रुक गया या फिर कालाधन खत्म हो गया ?
केंद्र सरकार विदेश से तो काला धन वापस नहीं ला पाई , देश के भीतर भी इस बाबत कुछ ठोस काम नहीं कर सकी है | इन्कम डिस्क्लोज़र स्कीम पहले ही बुरी तरह फ्लाप हो चुकी है | केंद्र सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए काले धन पर लगाम कसने के अपने वादे के तहत विदेशी खातों की जानकारी लेने के साथ ही देश के लोगों को 30 सितंबर 2016 तक अपनी अघोषित आय का ब्योरा देने का जो वक्त दिया था , उसका भी कोई उल्लेखनीय लाभ नहीं मिल पाया | केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना इन्कम डिस्क्लोज़र स्कीम (आईडीएस) बुरी तरह फ्लाप हो गय | अरबों रुपये का लेन-देन करने वाले लोगों का पता फर्जी पाया गया | छह लाख 90 हजार नोटिसें बैरंग वापस लौट आयीं | यह बड़ा खुलासा हुआ है कि बैंकों के जरिए बहुत बड़ी तादाद में काले धन का ट्रांजैक्शन हो रहा है | प्राइवेट बैंक इस दुष्कर्म में बढ़त लिए हुए हैं | नियम-कानून ताक पर रख कर देश के विभिन्न बैंक पैन नंबर दर्ज किए बगैर करोड़ों और अरबों रुपये का लेन-देन धड़ल्ले से कर रहे हैं | केंद्र सरकार को समझ में ही नहीं आ रहा है कि ऐसे में क्या किया जाए ! पैन नंबर दर्ज किए बगैर हुए करोड़ों और अरबों रुपये के सात लाख बड़े व सामूहिक लेन-देन (क्लस्टर ट्रांजैक्शन) से सम्बन्धित लोगों को जो नोटिसें भेजी गई थीं, उनमें से छह लाख 90 हजार नोटिसें एड्रेसी नॉट फाउंडलिख कर वापस आ गईं | इन बड़े ट्रांजैक्शंस में जो पते लिखाए गए थे, उन पतों पर कोई नहीं मिला | न नाम का पता चल पा रहा है, न पते पर कोई पाया जा रहा है और न उनके केवाईसी (नो योर कस्टमर) का ही कोई ओर-छोर मिल रहा है | 90 लाख बैंक लेन-देन (ट्रांजैक्शन) पैन नंबर के बगैर हुए, जिनमें 14 लाख बड़े (हाई वैल्यू) ट्रांजैक्शन हैं और सात लाख बड़े ट्रांजैक्शन हाई-रिस्कवाले हैं | इन्हीं सात लाख ट्रांजैक्शन के सिलसिले में नोटिसें जारी हुई थीं, जो लौट कर वापस आ गईं | दूसरी विदेशी काले धन की बात तक विस्मृत हो चुकी है | विदेशी खाताधारकों की पक्की जानकारी होने के वावजूद उनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं जा रही है ! इस सब गंभीर मामलों पर गहरी ख़ामोशी है ! इस विषम स्थिति में नोटबंदी की घोषणा किसी राजनीतिक चाल जैसी है |


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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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