Jul 19, 2016

जमाअत इस्लामी हिन्द की देशव्यापी मुहिम 21 अगस्त से

देश में अम्न व इन्सानियत का संदेश - वक्त की बड़ी ज़रूरत

देश के शुभचिंतकों , हितैषियों और विवेकशील लोगों को इस बात का शिद्दत से अहसास है कि हमारा प्रिय देश इस समय सांप्रदायिकता की आग में तेज़ी से जलने लगा है | उन्हें इस बात की काफ़ी चिंता भी है कि अगर इस नकारात्मक प्रवृत्ति पर फ़ौरन रोक नहीं लगाई गयी , तो स्थिति काफ़ी गंभीर हो सकती है | सही सूरतेहाल यह है कि आज हमारा प्यारा देश चौतरफ़ा समस्याओं से घिरा हुआ है | गरीबी , बेरोज़गारी , महंगाई, भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं ने अलग से आम आदमी की मुश्किलें बहुत बढ़ा दी हैं | यह भी सच है कि इन समस्याओं में अम्न , शांति और मानवता को नुक़सान पहुँचाने की समस्या सर्व प्रमुख है | इसे देखते हुए जमाअत इस्लामी हिन्द ने देशव्यापी अम्न व इन्सानियत मुहिम चलाने का फ़ैसला किया है | मुहिम के संयोजक जनाब सआदत उल्लाह हुसैनी , जो जमाअत के उपाध्यक्ष भी हैं, ने बताया कि यह पन्द्रह दिवसीय मुहिम 21 अगस्त 16 से 4 सितंबर 16 के बीच आयोजित होगी | उनके अनुसार , देश की एक बड़ी शक्ति इसका सुदृढ़ सामाजिक ढांचा है | इतने बड़े देश में इतने भिन्न - भिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समूहों की मौजूदगी और उनके बीच सदियों से सामाजिक स्तर पर सद्भाव की ऐसी मिसाल दुनिया में और कहीं नहीं मिलती | इसने पूरी दुनिया में हमारे देश की इज्ज़त और शक्ति बढाई है | आज़ादी के बाद देश का जो संविधान बना , उसने भी धार्मिक स्वतंत्रता और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच शांति और भाईचारे के लिए सुदृढ़ आधार प्रदान किया | मगर इधर कुछ वर्षों से इस सुदृढ़ ढांचे को सख्त चुनौतियों का सामना है | सांप्रदायिक परिस्थिति तेज़ी से बिगड़ती जा रही है | सांप्रदायिक ताक़तों ने अब यह बात अच्छी तरह समझ ली है कि उनको राजनैतिक लाभ मिलने का दारोमदार अति सांप्रदायिक विभाजन पर है | यह विभाजन जितना अधिक होगा , उनके लिए सफलता उतनी ही आसान होगी | इसलिए ऐसा महसूस होता है कि वे पूरे देश को विशेषकर सांप्रदायिक तौर पर संवेदनशील राज्यों को स्थायी रूप से साम्प्रदायिक तनाव की स्थिति में रखना चाहते हैं | बड़े सांप्रदायिक दंगे के नतीजे में विश्व में बड़ी बदनामी होती है और अंतर्राष्ट्रीय विरोध का खतरा बना रहता है, इसलिए अब नया रुझान छोटे - छोटे लेकिन अत्यंत भयावह घटनाओं की स्थाई निरन्तरता का है | लोकसभा में गृह मंत्रालय की ओर से पेश किये गये आंकड़ों के अनुसार , गत वर्ष [ 2015 ] सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में 17 प्रतिशत वृद्धि हुई और एक वर्ष के दौरान ऐसी 751 घटनाएं घटीं | इनमें से अक्सर [ लगभग 87 प्रतिशत ] घटनाएं केवल सात राज्यों [ उत्तर प्रदेश , कर्नाटक , महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश , बिहार , राजस्थान और गुजरात ] में घटित हुई हैं | आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि चुनाव के निकट समय में इन घटनाओं की संख्या अचानक बढ़ जाती है ! इन बर्बर घटनाओं की कई मिसालें हाल के दिनों में सामने आई हैं |
झारखंड में एक नवयुवक और एक कम उम्र लड़की की पेड़ पर लटकी हुई लाशें , दादरी में मुहम्मद अख्लाक की निर्मम हत्या , सांप्रदायिकता का विरोध करनेवाले बुद्धिजीवियों को निशाना बनाकर हत्या करने की घटनाएं , दिल्ली , हरियाणा , मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ , आगरा और मुंबई में चर्चों पर हमले , विश्वविद्यालयों में दलितों पर अत्याचार , पुणे में एक आई टी इंजीनियर की भीड़ द्वारा हत्या आदि कुछ उल्लेखनीय घटनाएं हैं , जो मीडिया में चर्चा का विषय बनती रही हैं | इनके अतिरिक्त गाँवों में , सड़कों पर , बसों और ट्रेनों में यहाँ तक कि दफ़्तरों और कार्य स्थलों पर भी सांप्रदायिक आधारों पर टिप्पणियाँ , प्रताड़ना और हिंसा की घटनाओं की बहुतायत हो गई है | ऐसा नहीं है कि जमाअत इस्लामी हिन्द ने पहली बार इन रुझानात पर चिंता जताई हो और इनकी रोकथाम का प्रयास किया हो | पिछले वर्ष जमाअत इस्लामी हिन्द के तत्कालीन महासचिव जनाब नुसरत अली ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को लिखे पत्र में यह चिंता जताई थी कि भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद से अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के खिलाफ़ भगवा घृणास्पद आंदोलन में तेज़ी आयी है। 10 सितंबर 15 को लिखे अपने पत्र मे उन्होंने कहा था कि यह घृणास्पद आंदोलन न केवल देश के बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष ढांचे को नुक़सान पहुंचाएगा , बल्कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की विकास योजना में भी बाधा उत्पन्न करेगा | पत्र में यह भी कहा गया था कि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान देश ने घृणित राजनीतिक आंदोलन देखा। एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार से आशा की जा रही थी कि इस घृणित आंदोलन पर लगाम लगेगा, लेकिन मामला और भी बीभत्स और व्याकुल करने वाला है। ऐसा लगता है कि आंदालनकारियों को और पंख लग गए हैं।लव जिहाद’, ‘सांप्रदायिक बलात्कारऔर बलात् धर्म परिवर्तनजैसी नई - नई शब्दावलियों का ईजाद कर फ़र्जी दुष्प्रचार का नया सिलसिला क़ायम किया गया है। यह सही है कि क़ानून और व्यवस्था की जि़म्मेदारी राज्य सरकार की है लेकिन अगर राज्य सरकार क़ानून और व्यवस्था को क़ायम रखने में असफल रहती है और घृणास्पद आंदोलन एक बड़ा सांप्रदायिक तनाव पैदा करता है तो केंद्र को चुप नहीं बैठना चाहिए।यह केंद्र एवं राज्य दोनों सरकारों का दायित्व ही नहीं बल्कि उनकी अनिवार्यता है कि संविधान प्रदत्त देश के सभी नागरिकों, समूहों और समुदायों बसमूल अल्पसंख्यकों के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए राज धर्म का पालन करें। यह भी जरूरी है कि समाज में सांप्रदायिक सौहार्द पैदा करने के लिए सभी समुदायों के प्रभावशाली लोगों को आगे आना चाहिए | बुद्धिजीवी , सामाजिक लीडर , धार्मिक रहनुमा , विद्यार्थियों , नवयुवकों और महिलाओं के रहनुमा , पत्रकार , वकील - सभी को अग्रसर किया जाए | सांप्रदायिक सद्भाव , बेहतर पारस्परिक विचार - विनिमय और आपसी विश्वास के वातावरण को बहाल करने के लिए काम किया जाए | मीडिया और सोशल मीडिया में भी मानव - अंतरात्मा को जाग्रत किया जाए | इस्लाम वैचारिक स्वतंत्रता और कर्म का पक्षधर है | वह धार्मिक ज़बरदस्ती , हिंसा और असहिष्णुता का विरोधी है | इस्लाम की दृष्टि में प्रत्येक इन्सान को आस्था और धर्म की स्वतंत्रता प्राप्त है और इसी स्वतंत्रता के द्वारा उसकी परीक्षा अभीष्ट है | इस्लाम चाहता है कि विचार , दृष्टिकोण और धार्मिक मतभेदों पर खुले वातावरण में गंभीर वार्तालाप हो एवं सत्य को पाने का प्रयास किया जाए और इस सिलसिले में कोई ज़ोर - ज़बरदस्ती न हो | इस्लाम की इन शिक्षाओं की रोशनी में जमाअत इस्लामी हिन्द हमेशा पक्षपात , संकीर्णता और धर्म के नाम पर आक्रामकता की विरोधी रही है | इसने हमेशा देश से इन बुराइयों को दूर करने की संजीदा कोशिश की है | जमाअत ने इस समय हालात की संगीनी को महसूस करते हुए एक मुहिम की शक्ल में यह काम करने और देशवासियों को अम्न व इन्सानियत का संदेश पहुँचाने का फ़ैसला किया है , जो बहुत ही स्वागतयोग्य क़दम है |


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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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