May 20, 2016

ये इश्क़ नहीं आसां ..

पांच राज्यों की विधानसभाओं के नतीजे
देश के पांच राज्यों - असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी की विधानसभाओं के चुनाव नतीजे आ चुके हैं | इन चुनावों पर सभी की नज़रें टिकी हुई थीं | अब यह बहुत साफ़ हो गया है कि देश में किसी भी पार्टी की न तो लहर है और न ही राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी पार्टी ऐसी है , जो सही मायने में अपने को राष्ट्रीय पार्टी कहने का दमखम रखती हो | इन चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों का प्रभाव ठीक से दिखा है , जो राष्ट्रीय राजनीति में गठबंधन की राजनीति का फैलाव करके लोकतंत्र को मजबूत करता दिखेगा | इसी गठबंधन की बदौलत भाजपा ने असम में अपनी सरकार बना ली है और इस प्रकार वहां की 15 वर्ष पुरानी कांग्रेस सरकार का अंत हो गया है | उसके गठबंधन को 126 सदस्यीय विधानसभा में 86 सीटें मिली हैं , जो बहुमत से अधिक हैं | सर्बानंद सोनोवाल असम के नए मुख्यमंत्री होंगे | इन्हें पहले से ही भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया जा रहा था | सर्बानंद भाजपा में आने से पहले असम गण परिषद के छात्र नेता थे | उन्होंने कथित बंगलादेशी घुसपैठ के मामले में सुप्रीमकोर्ट जाकर उसे एक सियासी मुद्दा बनाया | देखना है कि सत्ता में आने के बाद वे इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं | इसे लेकर तरह - तरह की आशंकाएं बनी हुई हैं | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एन डी ए को समर्थन देने पर मतदाताओं का शुक्रिया अदा किया है | भाजपा ने असम में असम गण परिषद [ ए जी पी ] से सीटों का तालमेल किया था | उसने बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के साथ भी गठबंधन किया था | इन गठबंधनों का उसे भरपूर फ़ायदा मिला | इस स्थिति को कुछ चुनावी प्रेक्षक समझ नहीं सके | एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के नतीजों में दावा किया गया है कि असम विधानसभा चुनाव के परिणाम आने पर किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा और राज्य में भाजपा और सत्ताधारी कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है , जबकि ऐसा सिरे से नहीं था | सर्वेक्षण के नतीजों में कहा गया है कि विधानसभा की 126 सीटों वाले असम में बीजेपी की अगुआई वाला गठबंधन 55 सीटें जीत सकता है जबकि मुख्यमंत्री तरूण गोगोई की अगुआई में कांग्रेस 53 सीटें जीत सकती है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 78 सीटें मिली थीं। गौरतलब है कि असम में सरकार बनाने के लिए 64 सीटों की जरूरत होती है। जनाब बदरूद्दीन अजमल के ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) को 13 सीटें मिली हैं। इस बार उन्होंने राजद और जदयू के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाया था , जो अधिक कारगर नहीं हो सका | पिछली बार एआईयूडीएफ को 18 सीटें मिली थीं। अन्य को छह सीटें मिल सकती हैं। असम की 126 सीटों के लिए अप्रैल 2011 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने 78 सीटों पर जीत दर्ज कर सरकार बनाई थी | इन चुनावों में भाजपा ने 120 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और महज पांच सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार जीत दर्ज करने में सफल हुए थे | कहा जाता है कि भाजपा ने सांप्रदायिक आधार पर अपने मतों का जुगाड़ किया है , जिसे लोकतांत्रिक नहीं माना जा सकता | वहीं दूसरी ओर अलगाववादी बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट से भाजपा का गठबंधन और अपनी नैमित्तिक मांग रखनेवाले छात्र आन्दोलन से उपजे असम गण परिषद के साथ भाजपा का गठबंधन राज्य में क़ानून - व्यवस्था की नई समस्या खड़ीं कर सकता है |
पश्चिम बंगाल के मतदाता अधिक बौद्धिक हैं | उन्होंने अपनी बौद्धिकता का परिचय देते हुए एक बार फिर ममता बनर्जी को सरकार बनाने का मौक़ा दिया है | 294 सदस्यीय विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस को 211 सीटें मिली हैं , जो ऐतिहसिक है | इस बौद्धिक प्रदेश में भाजपा गठबंधन को सिर्फ़ 6 सीटें ही मिल पायीं , जो पिछले चुनाव से तीन अधिक है | कांग्रेस को पिछले चुनाव के मुक़ाबले दो सीटों का फ़ायदा हुआ है | उसे 44 सीटें मिली हैं | सबसे अधिक नुकसान कम्युनिस्ट पार्टियों को हुआ है | उनकी सीटें घटकर 33 हो गई हैं , जो पहले से 28 कम हैं | इसका मतलब यह हुआ कि ममता बनर्जी की कम्युनिस्ट पार्टियों के गढ को ध्वस्त करने की टेक्निक बहुत कारगर है | 294 सदस्यों की पश्चिम बंगाल विधानसभा में ममता को पिछले चुनाव में 184 सीटें ही मिली थीं और कांग्रेस को 42 सीट मिली थी | वहीं कम्युनिस्ट पार्टियों के गठबंधन को महज 62 सीट मिल पाई थी | अब ये सीटें काफ़ी सिमट गई हैं | कम्युनिस्ट पार्टियों के संयुक्त रूप से बनाये गये मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सूर्यकान्त मिश्र कुछ खास नहीं कर सके , बल्कि सही मायने में वे ममता के दांव को समझ ही नहीं पाए | पहली भी भाजपा ने सभी सीटों पर अपनी किस्मत को आज़माया था , लेकिन वह अपना खाता खोलने में भी सफल नहीं हो पाई थी | इस बार भी उसे कुछ खास नहीं मिल सका | केंद्र सरकार की योजनाओं की बारिश मतदाताओं को नहीं रिझा सकी | दूसरी ओर केरल के विधानसभा चुनाव कम्युनिस्ट पार्टियों के खुशियों की झोली लेकर आए | वहां की 140 सदस्यीय विधानसभा में एलडीएफ गठबंधन को 91 सीटें मिली हैं | इस प्रकार वहां एलडीएफ गठबंधन को सरकार बनाने का मौक़ा मिल गया है | इसे पहले के मुक़ाबले 24 सीटें अधिक मिली हैं , लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर माकपा में खींचतान इस कैडर बेस पार्टी को अन्य पार्टियों से अलग नहीं करती | केरल में पिछला चुनाव 2011 में हुआ था , जिसमें कांग्रेस नेतृत्व के यूडीएफ गठबंधन को 140 में से 72 सीटों पर जीत मिली थी | कम्युनिस्ट पार्टी [ भाकपा ] के नेतृत्व वाले एलडीएफ गठबंधन को 68 सीटों पर जीत मिली थी , जिसने उसे सत्ता से बाहर कर दिया था और कांग्रेस नीत यू डी एफ को सरकार बनाने का मौक़ा मिला था | इस बार यू डी एफ को मात्र 47 सीटें प्राप्त हुई हैं | भाजपा ने पिछले चुनाव में एन डी ए के बैनर तले सभी 140 सीटों पर चुनाव लड़ा था और बिना कोई सीट जीते महज 6 फीसदी मत पाप्त किया था , जबकि. ज्यादातर पोल सर्वेक्षणों ने 2011 में भाजपा के लिए 2-6 सीटों की उम्मीद जताई थी | इस बार भाजपा के लिए केरल के द्वार खुले और उसे एक सीट मिल गई | भाजपा के पूर्व केन्द्रीय मंत्री ओ . राजागोपाल ने नेमम सीट जीत ली | तमिलनाडु में जयललिता की पुनः वापसी हो गई है | उनकी कल्याणकारी योजनाओं के साथ ही प्रदेश की जनता का व्यक्तिवाद उन्हें सत्ता से दूर नहीं कर सका | एआईएडीएमके को 134 सीटें मिलीं ,जो पिछले चुनाव के मुक़ाबले 15 कम हैं | इस बार डी एम के को 67 सीटों का फ़ायदा हुआ है | कांग्रेस के साथ बने उसके गठबंधन को कुल 98 सीटें प्राप्त हुई हैं | इससे पहले तमिलनाडु विधानसभा की 234 सीटों के लिए अप्रैल 2011 में चुनाव हुए थे | इन चुनावों में एक तरफ जयललिता की एआईएडीएमके और कम्युनिस्ट पार्टियों का गठबंधन था और दूसरी तरफ डीएमके के साथ कांग्रेस का गठबंधन बना था , जो इस बार भी बना रहा | हालांकि इस राज्य में भाजपा का अस्तित्व न के बराबर है लेकिन राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते उसने पिछले चुनाव में सभी सीटों पर अकेले उम्मीदवार उतारा था , लेकिन उसे कोई सीट नहीं मिल सकी थी | इस बार भी भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों का प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा | केवल पुडुचेरी ही ऐसा राज्य है , जहाँ कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर मिला है | कांग्रेस - डी एम के गठबंधन को 17 सीटें मिली हैं | विधानसाभा की 30 सीटों के लिए हुए चुनाव में ए आई एन आर सी को मात्र 8 सीटें मिलीं , जो विगत चुनाव से 7 कम हैं | इसे पिछली बार सरकार बनाने का मौक़ा मिला था | विधानसभाओं के इन चुनावों का राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव पड़ना तय है | असम को छोड़ दें , तो अन्य राज्यों में भाजपा की उपलब्धि नगण्य रही | केंद्र सरकार के दो वर्ष के कार्यकाल को जनता ने कुछ खास नहीं माना | असम की बात अलग है | अगर वहां सांप्रदायिक कार्ड न खेला जाता और इसके लिए सोनोवाल को न लाया जाता , तो भाजपा के लिए ख़ुशी का कोई मौक़ा न होता | जो लोग यह समझते थे कि नरेंद्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा के पर लग जाएंगे , वे खामखयाली में पहले भी थे और चुनाव नतीजों ने साफ़ कर दिया है कि आज भी इससे नहीं उबर पाए हैं |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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