Apr 26, 2016

सोहेलवा जंगल जलाकर किसानों पर क़हर बढ़ाया

सोहेलवा जंगल में आग वन विभाग ने ख़ुद लगाई , सूखे की मार झेल रहे किसानों पर दोहरी मुसीबत
धन - उगाही का टारगेट पूरा करने के लिए अंजाम दिया गया यह काला कारनामा
इस बार गर्मी के आते ही देश के कई वन्य क्षेत्रों ख़ासकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के जंगलों में आग लग गई | इसके कारणों में अन्य स्थानों पर अन्य कारण चाहे जो हों , लेकिन उत्तर प्रदेश में इसका एकमात्र कारण जंगलों की अवैध रूप से अंधाधुंध कटान है | वैसे तो सबूत [ बूट ] मिटाने के हर बार जंगल में आग लगाई जाती है , लेकिन इस बार जिस बड़े पैमाने पर आग लगाई गई , पिछले कुछ वर्षों के रिकार्ड को तोड़ दिया | लगभग 100 हेक्टेअर वन संपदा नष्ट कर दी गई | इस ' भीषण अग्निकांड ' की सबसे बड़ी वजह बड़ी संख्या में शीशम , सागौन , साखू - साल आदि कीमती लकड़ी के पेड़ों की अवैध कटान है | बताया जाता है कि प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र वन विभाग को भी धन - उगाही का टारगेट दिया गया है , जिसे पूरा करने के लिए सोहेलवा वन्य जीव प्रभाग पूरे जी - जान से जुटा हुआ है | इस ' प्रयास ' में न तो पर्यावरण सुरक्षा की चिंता की जा रही है और न ही पारिस्थितिकी संतुलन की | इस दुष्प्रयास के चलते जंगली सीमा के आसपास का बड़ा इलाक़ा बियाबान बन चुका है | सूखे की मार झेल रहे किसानों पर वन विभाग ने दोहरी मुसीबत डाल दी है | जंगली आग की गर्मी से आसपास की किसानों की फ़सल प्रभावित हुई ही है , हरे - भरे पेड़ बुरी तरह झुलस गये हैं | वन्य जीव - जन्तु और जानवर तो प्रभावित हैं ही , आस - पास की इंसानी आबादी भी वहां से पलायन को मजबूर है | आश्चर्य की बात यह है कि जंगल का कोई अधिकारी व कर्मचारी मौक़े पर आग बुझाने आया और न ही इनमें से कोई प्रयासरत दिखा !
सोहेलवा जंगल लंबे समय से भ्रष्ट राजनेताओं और अधिकारियों की ऐशगाह रहा है | इसकी बेशकीमती लकड़ियाँ अनेकों को मालामाल कर चुकी हैं और आज भी कर रही हैं | इस मामले में बनकटवा वन रेंज सबसे बदनाम है | चर्चा है कि यहाँ पिछले दिनों जंगल के ही अधिकारियों ने अवैध रूप से बेशकीमती लकड़ियाँ कटवाकर सबूत नष्ट करने के लिए जंगल में आग लगवा दी | उन्होंने न तो जंगली जीव - जन्तुओं की परवाह की , न ही इंसानों की ! वन सीमा से लगी एक बड़ी आबादी इससे प्रभावित हुई है | सभी को पता है कि सोहेलवा जंगल के पहाड़ी नाले सूख चुके हैं और वन विभाग द्वारा सरकारी धन की लूट करके नियम - विरुद्ध जो ताल - पोखरे बनवाए गये थे , सभी पहले दिन से निष्प्रयोजनीय साबित हुए ! इसलिए भी जंगल में आग लगाने से पहली विपदा जंगली जीव - जन्तुओं पर आई | पिछले दिनों बनकटवा वन रेंज में पानी की तलाश में एक हाथी की मौत हो गई , जिसके बारे में जंगल विभाग के लोगों ने अपने बचाव में यह झूठी बात फैला दी कि यहाँ निर्माणाधीन राप्ती नहर में बिजली के हाई टेंशन तार से छू जाने से हाथी की मौत हुई | पिछले दिनों 29 मार्च को श्रावस्ती ज़िले के पश्चिमी सोहेलवा के बिल्ली विश्वंभरपुर और भचकाही के बीच जंगलों में आग लगाई गई , जिसके चलते करीब 35 हेक्टेअर वन संपदा जल गई | आसपास के किसानों गेहूं की फ़सल भी इसकी चपेट में आई | इन्हीं दिनों भिनगा जंगल में भी आग लगी , जिससे लगभग 20 हेक्टेअर क्षेत्र में लगे सागौन के पेड़ जल गए |
हमारे देश में लगभग 7 लाख, 65 हजार 210 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जंगल फैला है। इसमें से लगभग 6 लाख, 39 हजार छह सौ किलोमीटर क्षेत्र में किसी न किसी तरह के जंगल हैं।इन जंगलों में कई तरह की जैव विविधता मिलती है ,लेकिन ईंधन, चारे, लकड़ी की बढ़ती हुई माँग, जंगलों के संरक्षण के अपर्याप्त उपाय और वन भूमि के गैर-वन भूमि में परिवर्तित होने से वे खत्म होते जा रहे हैं। जंगल की आग पर नियन्त्रण सहित वन प्रबन्ध का ज़िम्मेदारी राज्यों के वन विभागों की है | इसको देखते हुए ‘वन-आग’ प्रबन्ध के लिए एक राष्ट्रीय योजना तैयार करनी जरूरी है ताकि इस सम्बन्ध में राज्यों को स्पष्ट दिशा-निर्देश मिल सकें | 1988 की राष्ट्रीय वननीति में भी जंगलों में लगने वाली आग पर नियन्त्रण के लिए खास मौसम में विशेष सावधानी बरतने और इसके लिए आधुनिक तरीके अपनाने की बात साफतौर पर कही गई है लेकिन अभी तक वन आयोजना और व्यवस्था को वह प्राथमिकता नहीं मिली है जो मिलनी चाहिए थी। वन विभाग आग लगने के जो कारण बताता है , वे गलत और अतार्किक अधिक हैं |
वह विभाग भ्रष्टाचार की अनदेखी करते हुए आग लगने का कसूरवार आसपास के लोगों को ठहरा देता है , जो हर दृष्टि से निंदनीय है | उसका कहना है कि आसपास के गाँव के लोग दुर्भावना से आग लगा देते हैं | मगर सवाल यह है कि वह कौन - सी दुर्भावना है ? अगर ऐसी कोई बात है , तो उसको दूर किया जाना चाहिए | वन विभाग यह भी कहता है कि मजदूरों द्वारा शहद और कुछ जंगली उत्पादों को इकट्ठा करने के लिए जान - बूझकर आग लगा दी जाती है | साथ ही उसका आरोप है कि जानवरों के लिए ताज़ा घास उपलब्ध कराने के लिए आग लगाई जाती है | अगर ये बातें सच होतीं तो वन विभाग द्वारा इन पर कार्रवाई होती , मगर ऐसी बात नहीं है | हकीक़त यह है कि वन विभाग द्वारा गिनाये गये कारण अपवाद ज़रूर हो सकते हैं , लेकिन आग लगने का ज़िम्मेदार ख़ुद वन विभाग के भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारी हैं , जो धन - उगाही के लिए यह जीव - संहार जैसा घृणित कुकर्म करते हैं |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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