Apr 2, 2016

मुस्लिम पर्सनल लॉ की समीक्षा सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार में नहीं

मुस्लिम पर्सनल लॉ की समीक्षा सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार में नहीं

सुप्रीमकोर्ट ने पिछले दिनों मुस्लिम पर्सनल लॉ पर स्वतः संज्ञान लिया , जिस पर आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की आपत्ति एकदम उचित है | बोर्ड ने साफ़ तौर पर कहा है कि देश की सर्वोच्च अदालत के क्षेत्राधिकार में यह नहीं आता कि वह मुस्लिम पर्सनल लॉ जो कि क़ुरआन पर आधारित है , उसकी समीक्षा करे | मुस्लिम पर्सनल लॉ संसद से पारित क़ानून नहीं है | वास्तव में मुस्लिम पर्सनल लॉ की सबसे बड़ी विशेषता उसका ईश्वरीय क़ानून होना है | सुप्रीमकोर्ट में दाख़िल किये गये शपथपत्र में बोर्ड ने कहा है कि '' मुस्लिम पर्सनल लॉ एक सांस्कृतिक मामला है , जिसे इस्लाम धर्म से अलग नहीं किया जा सकता |इसलिए इसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 क्र तहत अंतःकरण की स्वतंत्रता के मुद्दे को संविधान के अनुच्छेद 29 के साथ पढ़ा जाना चाहिए | '' उल्लेखनीय है कि सुप्रीमकोर्ट स्वतः संज्ञान के आधार पर मुस्लिम पर्सनल को संविधान के मौलिक अधिकारों से जोड़कर उसकी समीक्षा कर रहा है | आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपने वकील एजाज़ मक़बूल के द्वारा सुप्रीमकोर्ट में बताया कि '' विधायिका द्वारा पारित क़ानून और धर्म से निर्देशित सामाजिक मानदंडों के बीच ई स्पष्ट रेखा होनी चाहिए | देश में ' मोहम्मडन लॉ ' कि स्थापना पवित्र क़ुरआन और इस्लाम के पैगंबर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ] की हदीसों से की गई है और इसे संविधान के अनुच्छेद 13 के अनुसार अभिव्यक्ति के दायरे में लाकर लागू नहीं किया जा सकता | '' सुप्रीमकोर्ट ने याचिकाकर्ता सायरा बानो द्वारा तीन तलाक के
मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए विगत 28 मार्च 16 को कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश जारी किया है कि वह मुस्लिम महिलाओं को लेकर बनाई गई उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट 6 सप्ताह के भीतर कोर्ट के समक्ष दायर करे। सुप्रीम के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह निर्देश उस समय जारी किए जब याचिकाकर्ता मुस्लिम महिला ने कोर्ट को बताया कि यूपीए सरकार के वक्त मुस्लिम महिलाओं को लेकर केंद्र सरकार द्वारा एक एक उच्च स्तरीय समिति बनाई गई थी। गौरतलब है कि यूपीए सरकार ने Women and the law : an assessment of family laws with focus on laws relating to marriage, divorce, custody, inheritance and succession नाम से रिपोर्ट तैयार की थी। समिति ने 2015 में महिला कल्याण मंत्रालय को यह रिपोर्ट सौंपी थी, लेकिन यह रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है | इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि यह रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल की जाए। कोर्ट ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भी पक्षकार बनाया है। कोर्ट तीन तलाक और पुरुषों की चार शादियों का मामले में सुनवाई कर रही है। इससे पूर्व सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने इस मामले को महिलाओं के समान अधिकार का उल्लंघन करार देते हुए स्वत: संज्ञान लेकर चीफ जस्टिस के पास भेजा था और फिर उतराखंड की एक पीड़ित मुस्लिम महिला सायरा ने अपने तलाक को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसके पति ने तीन बार तलाक कह के तलाक दे दिया था। 
पिछली सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अब समय आ गया है उचित कदम उठाने का। तीन तलाक और एक पत्नी के रहते दूसरी शादी देश की महिलाओं के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन है। समय के साथ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में बदलाव ज़रूरी है। सरकार, विधायिका इस बारे में विचार करें। कोर्ट ने टिप्पणी कि थी कि यह संविधान में वर्णित मुस्लिम महिलाओं के मूल अधिकार, सुरक्षा का मुद्दा सार्वजनिक नैतिकता के लिए घातक है। सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व के फैसलों का उदाहरण देते हुए जजों ने कहा था कि बहुविवाह की प्रथा सार्वजनिक नैतिकता के लिए घातक है। इसे भी सती प्रथा की तरह प्रतिबंधित किया जा सकता है। कोर्ट का कहना था कि इस तरह की प्रथाएं महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। ये प्रथाएं संविधान द्वारा दिए गए समानता और जीने के अधिकार का उल्लंघन करती हैं। बेंच ने कहा था कि यह ध्यान देने की बात है कि संविधान में पूरी गारंटी दिए जाने के बाद भी मुस्लिम महिलाएं भेदभाव की शिकार हैं। मनमाने तलाक और पहली शादी जारी रहने के बावजूद पति द्वारा दूसरा विवाह करने जैसे मामलों में महिलाओं के हक में कोई नियम नहीं है। यह महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के मसले को खारिज करने जैसा है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को इस टिप्पणी पर पहले से ही आपत्ति थी | बोर्ड ने कहा है कि यह कोर्ट के क्षेत्राधि‍कार में नहीं है | उसने समान सिविल कोड की परिकल्पना को भी चुनौती देते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय अखंडता और एकता की कोई गारंटी नहीं है | यह ऐतिहासिक तथ्य है कि एक साझी आस्था ईसाई देशों को दो विश्व युद्धों से अलग रखने में नाकाम रही | बोर्ड का मानना है कि इसी तरह हिन्दू कोड बिल जातीय भेदभाव को नहीं मिटा सका | बोर्ड ने पूछा है, 'क्या समान सिविल कोड राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए जरूरी है? यदि जरूरी है तो ईसाई देशों की आर्मी के बीच दो विश्व युद्ध नहीं होने चाहिए थे.' समान सिविल कोड के विचार को काउंटर करते हुए बोर्ड ने तर्क दिया कि 1956 में हिन्दू कोड बिल लाया गया था, लेकिन इससे हिन्दुओं में विभिन्न जातियों को बीच दीवार खत्म नहीं हुई. यह विचार एक लिहाज से नाकाम हो गया. बोर्ड ने पूछा है, 'क्या हिन्दुओं में जाति खत्म हो गई? क्या यहां छुआछूत नहीं है? क्या दलितों के साथ यहां भेदभाव बंद हो गया?' बोर्ड ने कोर्ट के सम्मुख प्रस्तुत शपथपत्र में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का भी हवाला दिया गया है, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि पर्सनल लॉ को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को लेकर चुनौती नहीं दी सकती |इन तथ्यों के बावजूद मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर मीडिया और अन्य संचार माध्यमों के साथ ही बयानों में थोथे , निरर्थक और मनगढ़ंत आधारों पर जो बातें आती रहती हैं , वे बेहद निंदनीय और देश कि एकता व अखंडता के लिए घातक हैं |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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