Mar 22, 2016

क्या यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन नहीं ?

हमारा संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रदान करता है | संविधान के अनुच्छेद 19 [ 1 ] में सभी को अभिव्यक्ति की आज़ादी प्रदान की गई है | किसी सूचना या विचार को बोलकर , लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोक - टोक के अभिव्यक्ति की आज़ादी ही यह आज़ादी है | भारतीय संविधान में यह प्रावधान भी है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में यह आज़ादी सीमित हो सकती है , लेकिन इस परिस्थिति से अवगत कराए बिना इस आज़ादी को सीमित नहीं किया जा सकता |इसके वावजूद सरकार ने उर्दू लेखकों और पत्रकारों पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया , जो सही मायने में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कुठाराघात है | सरकार ने उर्दू लेखकों से कहा गया है कि वे साल में एक बार इस बात को सुनिश्चित करें कि वे देश और सरकार के खिलाफ कोई भी 'आपत्तिजनक' सामग्री प्रकाशित नहीं करेंगे, मानो वे पहले ऐसा करते थे और पहले से उन्हें गुनाहगार मान लिया गया है |  नेशनल काउंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज (एनसीपीयूएल) ने उर्दू लेखकों के लिए उर्दू में एक डिक्लेरेशन फॉर्म भी जारी किया है , जो आपत्तिजनक है | गौरतलब है, एनसीपीयूएल मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तहत आने वाला संस्थान है। अंग्रेजी दैनिक 'द इंडियन एक्सप्रेस' [ 19 मार्च 2016 ]की रिपोर्ट के मुताबिक, कई उर्दू लेखकों और संपादकों को पिछले कुछ महीनों के दौरान उक्त फार्म प्राप्त हुआ है। जिसमें लेखकों को दो गवाहों के दस्तखत करवाने के लिए भी कहा गया है। फॉर्म की रुपरेखा इस प्रकार है: "मैं...... पुत्र/पुत्री... यह पुष्टि करता हूं कि मेरी किताब/मैगजीन शीर्षक... जिसे एनसीपीयूएल के मॉनीटरी असिस्टेंस स्कीम के तहत बड़ी तादाद में खरीददारी के लिए मंजूरी मिली है। इसमें कोई भी सामग्री भारत सरकार की नीतियों और राष्ट्र के हितों के खिलाफ नहीं है। यह देश के विभिन्न वर्गों और तबक़ों के बीच किसी प्रकार के नफ़रत पैदा करने की ओर संकेत नहीं करती | साथ ही यह आर्थिक तौर पर किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी संस्था से समर्थित नहीं है।" मतलब यह कि ' संकेत ' भी दंडात्मक कार्रवाई में शामिल है | यह भी चेतावनी दी गई है कि इसका उल्लंघन करने पर एनसीपीयूएल लेखक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकता है और आर्थिक सहयोग भी वापस ले सकता है। एनसीपीयूएल के डायरेक्टर इर्तिजा करीम ने बताया, "अगर एक लेखक सरकार की तरफ से आर्थिक मदद चाहता है। तो बिल्कुल ही सामग्री सरकार के विरुद्ध नहीं हो सकती। एनसीपीयूएल एक सरकारी संस्थान है और हम सरकारी कर्मचारी हैं। हम यक़ीनन सरकार के हितों की रक्षा करेंगे।" उनके अनुसार , "डिक्लेरेशन फॉर्म को शामिल करने का फैसला करीब एक साल पहले काउंसिल के सदस्यों के बीच हुई बैठक में लिया गया , जिसमें एचआरडी मंत्रालय भी शामिल है। गृह मंत्रालय को भी इस विषय में जानकारी है।" उन्होंने बताया, "काउंसिल को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई बार एक लेखक की लिखी गई किताब दूसरे के नाम से सबमिट की जाती है। इससे हम कानूनी मामलों में फंस जाते हैं , क्योंकि हमारे पास इतनी मैनपॉवर नहीं है कि हर किताब की हर एक लाइन की जांच करें। इसके लिए यह फॉर्म हमें लेखकों पर जवाबदेही डालने में मदद करेगा।" जनाब करीम ने कहा कि यह कदम पिछले साल हुई एक घटना के बाद उठाया गया , जब अब्दुल कलाम आज़ाद पर आधारित एक किताब में गलत सूचना दी गई। आप जानते ही हैं कि वे एक राष्ट्रीय हस्ती हैं और उनके संबंध में गलत जानकारी एक राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता है। हम हर चीज की जिम्मेदारी नहीं ले सकते।" सरकार के इस क़दम की आलोचना स्वाभाविक बात है | कई प्रबुद्धजनों ने इसकी आलोचना करते हुए इसे लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध और अभिव्यक्ति - हनन का प्रयास बताया है | कोलकाता यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर और लेखक शानाज़ नबी कहते हैं कि यह मुस्लिम लेखकों को डराने - धमकाने की कोशिश है | उन्हें पिछले हफ्ते एक फॉर्म प्राप्त हुआ है , जिसके लेखन - कार्य के विवरण मांगे गए हैं | उनके साहित्यिक निबंधों- ' तन्कीदी मुतालियात' के बारे में एक चिट्ठी भी थी। इन आलोचनात्मक निबन्धों को एनसीपीयूएल ने अपने संकलन के लिए 2016 में चयनित किया गया। नबी ने कहा, "एक लेखक से डिक्लेरेशन पर दो गवाहों को दस्तखत करवाने के लिए कहना अपमान है और लेखकों की अभिव्यक्ति के अधिकार पर सीधा हमला है। उर्दू के एक मशहूर लेखक एवं शायर जनाब इन्तिज़ार नईम का कहना है कि पहले से ही गुनाहगार मानकर लेखकों के ज़मीर का सौदा करना हर तरह से निंदनीय है | जमशेदपुर से प्रकाशित एक छमाही पत्रिका 'रावी ' के संपादक,अबरार मुजीब ने कहा, साहित्य का बिंदु है- सरकार की आलोचना करना और समाज की कमियों को उजागर करना ...... लेकिन इस तरह के अनुचित शब्दों में लिखा गया घोषणा पत्र हर किसी को कमजोर करता है और इससे सरकार को काफी ताकत मिलेगी | अब तो लेखक असहमत होने पर बड़ी आसानी से सरकार के हाथों दबा दिया जाएगा !"

About the Author

मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

0 comments:

Post a Comment