Mar 20, 2016

जस्टिस पाशा का अजीबोगरीब बयान

बहुपतिवाद ग़ैरइन्सानी और असभ्य सोच

केरल हाईकोर्ट के जज जस्टिस बी कमाल पाशा ने पिछले दिनों मुस्लिम धर्मगुरुओं की मंशा पर सवाल उठाते हुए कुछ अजीबो गरीब बातें कही हैं | उन्होंने मुस्लिम धर्मगुरुओं से पूछा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ को आधार मानकर अगर मुस्लिम पुरुष चार बीवियां रख सकते हैं तो मुस्लिम महिलाएं चार पति क्यों नहीं रख सकती हैं ? विगत 6 मार्च 16 को कोझीकोड [ केरल ] में महिला वकीलों के एनजीओ की ओर से आयोजित एक सेमीनार में जस्टिस पाशा ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ महिलाओं के खिलाफ कई नियमों से भरा पड़ा है। जस्टिस पाशा ने बहुविवाह के लिए मुस्लिम धार्मिक नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि नाजुक मुद्दों पर आत्ममंथन की जरूरत है। उन्होंने कहा, मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक , एक आदमी एक साथ चार तक शादी कर सकता है , हालांकि कई मुस्लिम देशों में बहुविवाह पर पाबंदी लग चुकी है , लेकिन भारत में यह जारी है। उन्होंने कहा कि कुरआन में अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या के बावजूद महिलाओं के अधिकारों से वंचित रखा जाता है। धार्मिक नेताओं को आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वे एकतरफ़ा फैसला देने की योग्यता रखते हैं | लोगों को भी ऐसे लोगों की योग्यता को ध्यान में रखना चाहिए जो इस तरह के फ़ैसले देते हैं | उन्होंने कहा कि संविधान में महिलाओं और पुरुषों को बराबरी की गारंटी दी गई है | जस्टिस पाशा ने यह भी कहा कि देश के सभी क़ानून अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के दायरे में आते हैं जो क्रमश: समानता के अधिकार और जीवन के अधिकार की गारंटी देते हैं | ऐसा लगता है कि जस्टिस पाशा को न तो नैसर्गिक क़ानूनों का कुछ ज्ञान है और न ही इस्लामी क़ानूनों का ! वे ऐसी बातें कह रहे हैं , जो शालीन सभ्यता से ख़ारिज हैं | सभी जानते हैं कि सभ्यता ने कभी महिला को एक से अधिक शादी की आज़ादी दी | केवल महाभारत में एक कथा के अनुसार , द्रोपदी की शादी पांच पतियों [ पांडवों ] से हुई थी , जबकि स्वयंवर में द्रोपदी ने एक ही पति अर्जुन को चुना था | लेकिन यह अपवाद समाज की मान्यता नहीं प्राप्त कर सका | रही इस्लाम की बात , तो यह शालीन , सभ्यता और शिष्टाचार को शिखर तक पहुँचाने का धर्म है , किसकी नज़र में दुनिया की सारी दौलत से ज्यादा कीमती चीज पाक दामन बीबी हैं। जस्टिस पाशा फ़रमाते हैं कि मुसलमान मर्दों को चार तक पत्नियाँ रखने का अधिकार है , तो महिलाओं को क्यों नहीं बहुपति रखने का अधिकार है ? पहले भी इस तरह के सवाल उठाये जाते रहे हैं | यह भी कहा गया कि इस्लाम में बहुपत्नीवाद की अनुमति क्यों हैं? क्या यह महिलाओं पर खुला जुल्म नहीं हैं ? पहली बात तो यह है कि इस्लाम एक से अधिक शादी करने की सशर्त अनुमति देता है | जो पत्नियों में न्याय की शर्त को पूरा नहीं कर सकते , एक से अधिक शादी भी नहीं कर सकते |इस्लाम के अंतिम पैगंबर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ] के आगमन से पहले अरब मे पत्नियों की संख्या पर कोर्इ हदबन्दी नही थी। इस्लाम ने पुरुष के स्वभाव और अमली जरूरतों का ध्यान रख कर इस असीमित संख्या को चार तक सीमित रखा। 
उस समय अरब दुनिया में शादी - विवाह का कोर्इ विशेष नियम और सिद्धान्त न था। गिरोहों और कबीलों में पत्नियां और दासियां रखने की कोई सीमा न थी | जब चाहा तलाक दे दी और जब चाहा शादी कर ली | इस्लाम ने पत्नियों की संख्या को सीमित कर दिया और तलाक के सम्बन्ध में उचित नियमों और शिष्टाचार की पाबन्दी का हुक्म दिया | कुरआन में है - '' और अगर तुमको अंदेशा हो कि यतीमों के साथ इन्साफ़ न कर सकोगे , तो जो औरतें तुम्हें पसंद आएं उनमें से दो - दो , तीन - तीन , चार - चार से निकाह कर लो | लेकिन अगर तुम्हें अंदेशा हो कि उनके साथ इन्साफ़ न कर सकोगे , तो फिर एक ही पत्नी रखो या उन औरतों को अपने दाम्पत्य जीवन में लाओ , जो तुम्हारे क़ब्ज़े में आई हैं , बेइन्साफी से बचने के लिए यह अधिक अच्छा है '' [ 4 - 3 ] | इस्लाम हो या दुनिया का कोई भी धर्म महिला को एक से अधिक पति रखने का अधिकार नहीं देते , क्योंकि इसके नुक़सान ही नुक़सान हैं | अगर एक पुरुष के पास एक से अधिक पत्नियाँ हों तो ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे के माता - पिता का पता आसानी से लग सकता है , लेकिन वहीँ अगर एक महिला के पास एक से ज़्यादा पति हों तो केवल माँ का पता चलेगा, बाप का नहीं | इस्लाम माता - पिता की पहचान को बहुत ज़्यादा महत्त्व देता है | मनोचिकित्सक कहते है कि ऐसे बच्चे मानसिक आघात , उन्माद और पागलपन के शिकार हो जाते है , जो अपने माता - पिता विशेष कर अपने पिता का नाम नहीं जानते | अक्सर उनका बचपन खुशियों से रिक्त होता है| इसी कारण वेश्याओं के बच्चो का बचपन अक्सर स्वस्थ नहीं होता | यदि ऐसे विवाह से जन्मे बच्चों का किसी स्कूल में दाख़िला कराया जाए और उसकी माता से उस बच्चे के पिता का नाम पूछा जाए , तो माता को एक से अधिक पतियों के नाम बताने पड़ सकते हैं |.सक्षमता की दृष्टि से भी बहुपत्नीवाद ही अधिक व्यावहारिक है | समाज विज्ञान के अनुसार एक से ज़्यादा पत्नी रखने वाले पुरुष को एक पति के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना आसान होता है , जबकि अनेक पति रखने वाली महिला के लिए एक पत्नी के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना संभव नहीं है, विशेषकर मासिकधर्म के समय जबकि एक स्त्री तीव्र मानसिक और व्यावहारिक परिवर्तन से गुज़रती है | एक से ज़्यादा पति वाली महिला के एक ही समय में कई यौन साझी होंगे , जिसकी वजह से उनमे यौन सम्बन्धी रोगों में ग्रस्त होने की आशंका अधिक होंगी और यह रोग उसके पतियों को भी लग सकता है चाहे उसके सभी पति उस महिला के अन्य किसी स्त्री के साथ यौन समंध से मुक्त हों | यह स्थिति कई पत्नियाँ रखने वाले पुरुष के साथ घटित नहीं होती है | इस्लामी प्रावधान से निश्चित रूप से समाज में शान्ति की स्थापना होती है | अतः जस्टिस पाशा का उक्त बयान न सिर्फ़ समाज में अशांति को बढ़ावा देनेवाला है , बल्कि हर दृष्टि से निंदनीय और अवांछित है | 

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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