Feb 28, 2016

काबा के बारे में गलत , भ्रमकारी बयान विशुद्ध एकेश्वरवाद का केंद्र है काबा

काबा के बारे में गलत , भ्रमकारी बयान विशुद्ध एकेश्वरवाद का केंद्र है काबा
द्वारिका शारदा पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने हाल में ही यह भ्रामक और गलत बयान दिया है कि मक्का में मक्केश्वर महादेव मंदिर है। इनसे पूर्व कुछ इसी तरह के इतिहासविरोधी गलत बयान जान - बूझकर दिए जाते रहे हैं , जिनका उद्देश्य समाज में अशांति और नफ़रत पैदा करना है | पी एन ओक ने यह मिथ्या दुष्प्रचार किया था कि मक्केश्वर शिवलिंग हज्रे असवद है। ‘वैदिक विश्व राष्ट्र का इतिहास’ नामक पुस्तक में उन्होंने यह गलत और तथ्य विरोधी बात लिखी है कि काबा में शिव का ज्योतिर्लिंग है। ' आर्ट ऑफ़ लिविंग ' के स्वामी श्री रवि शंकर ने भी अपनी अंग्रेज़ी पुस्तक ' हिदुइज्म एंड इस्लाम ' में इस अफ़वाह और दुष्प्रचार को हवा दी है | अब सोशल मीडिया - यू ट्यूब , ट्यूटर , फ़ेसबुक , ब्लाग्स और कुछ वेबसाइटों पर इस तरह की मिलती - जुलती अफ़वाहों पर आधारित मनगढ़ंत बातें फैलाई जा रही हैं | यह कहा जाता है कि काबा एक शिव मंदिर हैं या फिर उसमे शिवलिंग हैं या यशोदा और कृष्ण की तस्वीरे काबा के अन्दर हैं या कोई दीपक हमेशा जलता रहता हैं और मुसलमान हज के दौरान वहा शिव या कृष्ण उपासना करते हैं | यह भी कहा जाता है की वेंकटेश पण्डित ग्रन्थ 'रामावतारचरित' के युद्धकांड प्रकरण में एक अजीब प्रसंग 'मक्केश्वर लिंग' का हैं। यह प्रसंग आम तौर पर अन्य रामायणों में नहीं मिलता है। कहा जाता है कि रावण ने शिव से उसे युद्ध में विजयी होने की प्रार्थना की। शिव ने प्रार्थना स्वीकार कर रावण को एक लिंग (मक्केश्वर महादेव) दिया और कहा कि यह तेरी रक्षा करेगा, मगर ले जाते समय इसे मार्ग में कहीं भी धरती पर नहीं रखना | रावण आकाशमार्ग से लंका रवाना होता है , लेकिन रास्ते में कुछ ऐसी परिस्थितियां बनती हैं कि रावण को शिवलिंग धरती पर रखना पड़ता है। वह दोबारा शिवलिंग को उठाने की कोशिश करता है पर लाख कोशिश के बावजूद लिंग उस स्थान से हिलता नहीं। वेंकटेश पण्डित के अनुसर यह स्थान वर्तमान में सऊदी अरब के मक्का नामक स्थान पर स्थित है। कहा जाता है कि इस्लाम के प्रसार से पहले यहूदी इसकी पूजा करते थे। इनमें से किसी भी बात का सच्चाई से कोई संबंध नहीं है | इस्लाम की विशुद्ध एकेश्वरवादी धर्म है | क़ुरआन में है - '' तुम्हारा पूज्य प्रभु एक ही पूज्य प्रभु है , उस करुणामय और दयावान के सिवा कोई और पूज्य प्रभु नहीं है '' [ 2 - 163 ] इस्लाम में निराकार ईश्वर की ही पूजा - इबादत होती है | काबा की ओर रुख करके नमाज़ पढ़ने का आदेश है | वहां न ही किसी देवी - देवता की मूर्ति है , न ही कोई प्रतीक - प्रतिमा | अलबत्ता काबा के ढांचे के एक कोने पर एक काला पत्थर लगाया हुआ है। इस पत्थर को इस्लाम के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ]  ने चूमा था । चूमने की इस क्रिया में कोई ईश-भावना न थी। अतः आप [ सल्ल . ] की पैरवी में आपके अनुयायी भी इसे चूमने लगे और यह क्रम आज तक जारी है। उस समय किसी के हृदय व मस्तिष्क में यह विचार किंचित भी न था कि इस पत्थर में कोई ईश्वरीय गुण या शक्ति है और यह कोई लाभ या हानि पहुंचा सकता है अतः पूजा रूप में इसे चूमा जाए। 
इस्लाम के अंतिम पैगंबर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल.] के बाद दूसरे खलीफ़ा हज़रत उमर (रज़ि॰) के शासनकाल (634-645 ई॰) में इस ख़्याल से कि कहीं आगे चलकर लोग अज्ञानतावश या भावुक होकर इस काले पत्थर को पत्थर से ‘कुछ अधिक’ न समझने लगें; एक अवसर पर जनता के बीच, पत्थर के सामने खड़े होकर हज़रत उमर [ रज़ि .] ने कहा: ‘‘तू एक पत्थर है, सिर्फ़ पत्थर; हम तुझे बस इस वजह से चूमते हैं कि हमने पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) को तुझे चूमते हुए देखा था। इससे ज़्यादा तेरी कोई हैसियत, कोई महत्व हमारे निकट नहीं है। हमारा विश्वास है कि तू एक निर्जीव वस्तु, हमें न कोई फ़ायदा पहुंचा सकता है, न नुक़्सान’’ | दरअस्ल काबा का इतिहास एकेश्वरवाद के केंद्र का है | लगभग चार हज़ार वर्ष पूर्व जब अज्ञानता के घोर अंधकार में मानव-जाति निराकार एकेश्वरवाद की सीधी राह से भटक कर साकार अनेकेश्वरवाद , बहुदेववाद की मिथ्या धारणा में फंसी हुर्इ थी; सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्रों, तारो, पत्थरो, प्रेतात्माओं, पूर्वजों और शक्तिशाली शासकों की उपासना , मूर्ति-पूजा एवं नाना प्रकार के अंधविश्वासों व आडम्बरों से ग्रस्त थी। अपने से तुच्छ पदार्थो के सामने एवं अपने ही जैसे मनुष्यों के चरणों में सिर झुकाने से मनुष्य की गरिमा धूल = धूसरित हो चुकी थी | तत्कालीन पूरी मानव-जाति मे एकेश्वरोपासक एक भी व्यक्ति बाकी न रह गया था। इन विषम परिस्थितियों मे इराक के उर नामक नगर के वासी ‘महंत-महापुजारी’ आजर के घर मे, उसी के बेटे इबराहीम को अल्लाह ने तौहीद( विशुद्ध एकेश्वरवाद) की ज्योति जलाने के लिए चुन लिया और उन्हे अपना पैगम्बर (र्इशदूत) नियुक्त किया। अल्लाह ने पैग़म्बर इब्राहीम (अलैहि॰) को आदेश दिया कि वर्तमान काबा के स्थान पर एक ढांचा बनाओ। उन्होंने अपने बेटे इस्माईल (अलैहि॰) के साथ मिलकर पत्थरों का ढांचा बना लिया। ईश्वर ने इसे ‘अपना घर’ कहा और आदेश दिया कि यहां नमाज़ पढ़ो और इसकी परिक्रमा (तवाफ़) करो। इसे एकेश्वरवाद का प्रतीक क़रार दिया गया। लगभग ढाई हज़ार वर्ष तक यह क्रम चलता रहा, लेकिन अज्ञानता के अंधेरे आए तो काबा में मूर्तियां रख दी गईं | वह अनेकेश्वरवाद का केन्द्र बन गया। इस्लाम के अंतिम पैगंबर हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ] ने अपनी पैग़म्बरी के लगभग 21वें वर्ष इसे मूर्तियों से पाक कर दिया और इसकी ‘एकेश्वरवाद का केन्द्र’ होने की हैसियत को बहाल कर दिया। मक्का में विश्व भर के मुसलमान आम दिनों में प्रतिदिन और विशेषकर हज के दिनों में विशेष आयोजन के साथ काबा की परिक्रमा करते, इसकी दिशा में मुख करके अल्लाह की इबादत करते हैं। इसके साथ ही वे विश्व में कहीं भी हों काबा की ओर रुख़ करके ही नमाज़ पढ़ते हैं, इसी के अनुकूल दुनिया भर में हर जगह हर मस्जिद का निर्धारित दिशानुसार निर्माण होता है। इतिहास के किसी चरण में मक्का के निवासियों को नगर के आसपास कहीं एक काला चमकदार पत्थर मिला। ऐसे पत्थर उस पहाड़ी क्षेत्र के पहाड़ों में कहीं भी नहीं पाए जाते थे। उन्होंने समझा कि यह स्वर्ग लोक से नीचे आया है। संभवतः यह किसी उल्कापिण्ड का टुकड़ा रहा होगा। लोगों ने उसे धन्य और पवित्र समझ कर काबा के एक कोने पर लगा दिया और चूमने लगे। उस समय से पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) के समय तक उन मूर्तिपूजकों और अनेकेश्वरवादियों ने भी उस पत्थर की पूजा कभी नहीं की। इस्लाम का आह्वान करने के साथ मूर्तिपूजा तथा अनेकेश्वरवाद (शिर्क, अर्थात् ईश्वर के साथ किसी को साझी, शरीक, समकक्ष बनाने) का खंडन किया जाने लगा। काले पत्थर को पूजने की परम्परा नहीं थी, लोग इसे केवल चूमते ही रहे थे इसलिए हज़रत मुहम्मद [ सल्ल . ] ने लोगों की भावनाओं को अकारण छेड़ना उचित न समझा बल्कि परम्परागत आप (सल्ल॰) भी उसे चूम लिया करते। आप ही के अनुसरण में मुसलमान उस काले पत्थर को डेढ़ हज़ार वर्ष से आज तक चूमते आ रहे हैं; इस धारणा और विश्वास के साथ कि ‘‘यह मात्र एक पत्थर है, इसमें कोई ईश्वरीय गुण या शक्ति नहीं; यह किसी को न कुछ फ़ायदा पहुंचा सकता है न नुकसान।’’ ऐसे में यह कहना कि यह पत्थर किसी देवी - देवता से संबंधित है या मुसलमानों की इससे किसी प्रकार की श्रद्धा है , बिलकुल गलत , तथ्यहीन और भ्रामक है |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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