Feb 14, 2016

देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव

देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव
विभिन्न देशी - विदेशी संस्थाएं व संगठन बहुत ही उत्सुकता के साथ मोदी सरकार के अंतरिम बजट समेत तीसरे केन्द्रीय बजट की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस बजट से मोदी सरकार की आर्थिक सुधारों के प्रति प्रतिबद्धता का भलीभांति पता लगेगा तथा मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिये सरकार के प्रयासों की जानकारी भी प्राप्त होगी। इसके साथ ही सरकार के निवेश वातावरण में सुधार हेतु किए जाने वाले प्रयासों की भी जानकारी मिलेगी। आशा की जाती है कि वित्तमंत्री आम परिवारों पर पडऩे वाले वित्तीय बोझ को कम करने का बजट में प्रयास करेंगे। सकल घरेलू बचत को प्रोत्साहित करने का कार्य करेंगे। इसके साथ ही भारत को पुन: एक आकर्षक निवेश केन्द्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कुछ घोषणाएं अवश्य करेंगे। जेटली ने कहा है कि सरकार आर्थिक सुधार और वित्तीय पुर्नगठन को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है। अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाना और निवेश वातावरण को सुधारना उनकी प्राथमिकता है। इसके साथ ही देश में औद्योगिक विनिर्माण लागत को कम करना भी उनकी प्राथमिकता होगी | वित्तमंत्री अरुण जेटली बजट को बेहतर और जनोन्मुखी बनाने के लिए जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से ताल्लुक रखनेवाले संगठनों से सलाह - मशविरा कर रहे हैं | जमाअत इस्लामी हिंद (जेआईएच) ने भी आगामी आम बजट के लिए सरकार को सामाजिक क्षेत्र, ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण मशविरों के साथ ही कृषि क्षेत्र को ब्याज मुक्त ऋण प्रदान करने से संबंधित कुछ सुझाव दिए है | सामाजिक विकास की योजनाओं के लिए आवंटन बढ़ाने की मांग की गई है। मुंबई में पिछले दिनों जेआईएच के केन्द्रीय पदाधिकारियों और अर्थशास्त्रियों की एक बैठक में आम बजट से जुड़े मुद्दों पर गहन विचार - विमर्श किया गया और 2016-17 के बजट के लिए चार सुझावों को बढ़ाने का एक प्रस्ताव किया गया । ये सुझाव सामाजिक क्षेत्रों, ग्रामीण विकास, संसाधन सृजन, ब्याज मुक्त ऋण आदि पर आधारित हैं। जमाअत ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से सामाजिक क्षेत्रों को अधिक धनराशि आवंटित करने की मांग की है । उसके मुताबिक़ , शिक्षा और स्वास्थ्य में निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका से इन सेवाओं का खर्च तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ये सेवाएं आम लोगों की पहुंच से बाहर हो रही हैं। जमाअत ने देश की जीडीपी का छह प्रतिशत शिक्षा पर और तीन प्रतिशत स्वास्थ्य पर आवंटित करने का सुझाव दिया है। उसके अनुसार , किसान आत्महत्याओं के बहुत से मामलों को कृषि कर्ज से जोड़ा जाता है। सरकारें वसूल न होने लायक कर्ज और उस पर ब्याज को माफ करती रही है। ऐसे में जमाअत का सुझाव है कि किसानों को ब्याज मुक्त कर्ज की उपलब्धता एक अच्छा समाधान हो सकता है। जमाअत के प्रस्तावों में सरकार द्वारा शहरी विकास के लिए किये गए फ़ैसलों को सुखद बताते हुए कहा गया है कि इस विकास से ग्रामीण विकास प्रभावित नहीं होना चाहिए | ग्रामीण क्षेत्रों से मेट्रों और शहरों की ओर जन -विस्थापन को रोकने के लिए प्रस्तावों में कहा गया है कि बिजली , स्वास्थ्य रक्षा से जुड़ी सेवाओं और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित संभव सीमा तक विस्थापन रोका जा सकता है | यह कटु सच्चाई है कि हमारे देश में कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पा रही है | हालत यह है कि इन क्षेत्रों में उत्पादन के ताजा आंकड़ों को शामिल किये जाने के बाद वर्ष 2014-15 के लिए आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान मामूली रूप से घटकर 7.2 प्रतिशत रह गया है। इससे पहले वर्ष के दौरान 7.3 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया था। केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा राष्ट्रीय लेखा गणना के संशोधित अनुमान हाल में ही जारी किए गए हैं , जिनमें कहा गया है कि ‘वर्ष 2014-15 और 2013-14 के लिए (वर्ष 2011-12 के स्थिर मूल्यों पर) वास्तविक जीडीपी या जीडीपी क्रमश: 105.52 लाख करोड़ रुपये और 98.39 लाख करोड़ रुपये रही , जिससे 2014-15 के दौरान 7.2 प्रतिशत और 2013-14 के दौरान 6.6 प्रतिशत की वृद्धि का पता चलता है।’ वर्ष 2013-14 के लिए भी जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान पूर्व के 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया गया है। पिछले वर्ष सीएसओ ने वर्ष 2014-15 के लिए 7.3 प्रतिशत और 2013-14 के लिए 6.9 प्रतिशत की वृद्धि दर का अनुमान व्यक्त किया था।आम बजट से आम आदमी को अगर गरीबी और महंगाई से किसी हद तक राहत मिल जाती है , तो निस्संदेह यह सरकार की बड़ी उपलब्धि होती है , लेकिन लगता है कि इस दिशा में कुछ ख़ास करने नहीं जा रही है | विकास के जिस रास्ते पर चलने का दावा सरकार द्वारा बार - बार किया जाता है , वह ऐसा रास्ता है , जहाँ बड़े पैमाने पर किसानों को बेदखल करके खेती की जमीनें हड़पी जा रही हैं | अब हरित - क्रांति की बात आई - गई हो गयी | ऊपर से कृषि कार्यों की लागत में लगातार वृद्धि और अनुदानों को कम करने के कदमों तथा मुक्त व्यापार वाले आर्थिक सुधारों ने खेती को तेज़ी से घाटे का पेशा बना दिया है !.वास्तव में खेती - किसानी का संकट बहुत गहराता जा रहा है | 
यह अनगिनत किसानों की आत्महत्याओं में भी दिखाई देता है | ब्याज पर आधारित क़र्ज़ ने किसानों को बहुत तबाह कर डाला है | कृषि उत्पादों की मुनासिब क़ीमत का न मिलना किसानों की बड़ी समस्या रही है | इसे एक मिसाल से यूँ समझ सकते हैं | गन्ना किसानों को उचित भुगतान न मिलने की पुरानी शिकायत है | इस पर भी कथित आर्थिक सुधारों के प्रबल हिमायती सी. रंगराजन की अध्यक्षता में बनी छह सदस्यीय समिति ने पिछले साल चीनी उद्योग को पूरी तरह नियन्त्रणमुक्त करने की सिफ़ारिश की है | अगर ये सिफ़ारिशें मान ली गयीं , तो देश के किसानों की मुसीबतें बेइंतिहा बढ़ जायेंगी | समिति ने सिफ़ारिश की है कि राज्य सरकारों द्वारा गन्ने का समर्थन मूल्य घोषित करने की व्यवस्था समाप्त कर देनी चाहिए और गन्ने की कीमतें मिलों और किसानों के बीच तय होनी चाहिए | अगर ऐसा हुआ , तो बहुत आशंका है कि गन्ने की कीमतें बहुत घट जायेंगी | वास्तव में हमें खेती को बदलने के लिए एक क्रांति की जरूरत है | प्रख्यात अर्थशास्त्री डी .के . जोशी कहते हैं, 'सुधारों की प्रक्रिया ने कृषि क्षेत्र की उपेक्षा की है | बढ़ती महंगाई बता रही है कि यह क्षेत्र अपनी क्षमता के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर रहा | बजट दर बजट इसके हल के लिए सिर्फ छोटे कदम ही उठाए गए | हमें हरित क्रांति जैसे किसी बदलाव की जरूरत है | ' मगर यहाँ तो चिंता अमीर वर्ग के हितों की ही होती है ! देश के बुनियादी ढांचे में सुधार का सवाल भी बड़ा अहम है . यह क्षेत्र भी भयानक संकट का सामना कर रहा है | सड़क, बिजली, पानी का बुरा हाल है | नौकरशाही की लापरवाही और भ्रष्टाचार ने इस बुनियादी क्षेत्र को बहुत बिगाड़ दिया है | अक्सर यही होता है कि पैसा आता भी है , तो उसमें का अधिकांश बिना इस्तेमाल हुए ही वापस चला जाता है | चाहे वह सड़क बनाने वाला लोकनिर्माण विभाग हो या अलग-अलग राज्यों के बिजली और जल बोर्ड, सभी प्रक्रियाओं की जटिलता में फंसे हैं | ये सभी संस्थाएं बुनियादी सुविधाओं को विकसित करने के लिए बनाई गई थीं, लेकिन इनका अच्छा प्रदर्शन सुनिश्चित करने की कोई व्यवस्था नहीं है ! आम बजट में अक्सर इस हकीक़त से जुझने की किसी रणनीति का साफ़ अभाव दिखता है | नये बजट में इस ओर ध्यान देना चाहिए | भारतीय अर्थव्यवथा राजकोषीय घाटे की वजह से ही खस्ताहाली की शिकार है . इस घाटे को कम करने का जो दावा किया जा रहा है , उस पर यकीन करना बहुत मुश्किल है .ज़रूरत है पूरी अर्थव्यवस्था पर विहंगम निगाह डालकर उसके सारे सूराखों को बंद करने की | कुछ वर्ष पहले पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने एक यथार्थपरक बात यह कही थी , मगर न तो वे खुद उस पर अमल कर सके और न ही किसी और न उनकी बात पर ध्यान दिया | उन्होंने देश की बदहाली को दूर करने की खातिर अतिसंपन्न लोगों से ज्यादा कर वसूलने की वकालत की थी | उन्होंने कहा था कि कुछ खास मौकों पर सरकार को अमीरों पर ज्यादा कर लगाने पर विचार करना चाहिए ., हालांकि, विप्रो के अजीम प्रेमजी इस सुझाव को राजनीतिक रूप से सही ठहरा चुके थे |. वहीं, औद्योगिक संगठनों ने सरकार से इस पर विचार नहीं करने का आग्रह किया था | अमीरों से ज्यादा वसूली का सुझाव सबसे पहले प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार सी. रंगराजन ने दिया था | मोदी सरकार को इस सुझाव पर भी विचार करना चाहिए |


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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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