Feb 28, 2016

ए एम यू को जान - बूझकर बदनाम करने की कोशिश

ए एम यू को जान - बूझकर बदनाम करने की कोशिश 
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे पर सवाल उठाने का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि जान - बूझकर नया विवाद खड़ा कर दिया गया | सोशल मीडिया पर गत 20 फरवरी 2016 को बीफ़ - मुद्दा उछाला गया । व्हाट्स ऐप के एक पोस्ट में आरोप लगाया गया कि एएमयू मेडिकल कॉलेज की कैन्टीन में बीफ बिरयानी परोसी जा रही है। साथ ही कैन्टीन के मेन्यू कार्डकी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर डाली गई
इस पर कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने आवाज उठाई और कैन्टीन के ठेकेदार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। शहर की भाजपा मेयर शकुन्तला भारती ने भाजपा और विहिप के लोगों के स्थानीय लोगों के साथ मांग की कि जिला प्रशासन मामला दर्ज कर जांच का आदेश दे और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करें। यह गलत और भ्रामक बात फैलाने की कोशिश की गई मानो गाय का गोश्त परोसा जा रहा हो , जबकि भैंस के गोश्त की बिरयानी की बात थी
अलीगढ़ के वरीय पुलिस अधीक्षक जे रवीन्द्र गौड़ के अनुसार , पुलिस को इस बाबत शिकायत मिली , जिसकी पूरी तरह जाँच की गई , लेकिन भाजपा नेता हमारे रिस्पांस से ख़ुश नहीं हैं | पुलिस इसे औचित्यहीन आरोप मानती है | पुलिस का कहना है कि मामले की आरंभिक जाँच में गाय के गोश्त की बिरयानी नहीं पाई गई है | विश्वविद्यालय प्राक्टर एम मोहसिन खान के नेतृत्व में एएमयू के वरिष्ठ अधिकारियों ने मेडिकल कॉलेज की कैन्टीन पहुंचकर औचक निरीक्षण किया और कुछ भी आपत्तिजनक - प्रतिबंधित सामग्री नहीं पाई
एएमयू प्रवक्ता राहत अबरार ने कहा कि यह संस्था को बदनाम करने के लिए दुष्प्रचार है। मैं भरोसे से कह सकता हूं कि जिस बीफ बिरयानी का जिक्र हो रहा है, वह भैंस का गोश्त है।उन्होंने कहा कि प्रारंभिक जांच से पता चला है कि कैन्टीन का ठेका 23 फरवरी को समाप्त हो रहा है। ठेका पाने की चाह रखने वाले कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने ये अफवाह उड़ाई है कि गाय का गोश्त परोसा जा रहा है। जनाब अबरार ने कुछ दक्षिणपंथी संगठनों और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा वरीय पुलिस अधीक्षक के कार्यालय पर प्रदर्शन पर चिंता जताई
उन्होंने इन आरापों को हास्यस्पद बताते हुए कहा कि एएमयू वह पहला संस्थान है जिसने एक सदी पहले ही अपने परिसर में गाय के गोश्त के सेवन पर प्रतिबंध लगाया था। उन्होंने बताया कि मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज, जो बाद में चलकर 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना, के संस्थापक सर सैयद अहमद खान ने 1884 में एक स्पष्ट आदेश जारी किया था कि न सिर्फ किसी भी डाइनिंग रूम में बीफ नहीं परोसा जाएगा , बल्कि बक़रीद के अवसर पर संस्थान के कर्मचारी गाय की कुर्बानी भी नहीं करेंगे। सर सैयद अहमद ने यह कदम इसलिए उठाया क्योंकि वह हिन्दू भाइयों की भावनाओं को ठेस नहीं पंहुचाना चाहते थे और इस आदेश का उल्लंघन करने वाले संस्थान के एक कर्मचारी को 1884 में बर्ख़ास्त भी कर दिया गया था।

वास्तव में बहुत लंबे समय से यह एक अति संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है | मोदी सरकार के आने के बाद इसे मुस्लिम विरोध के नाम पर कुछ अधिक ही अपना लिया गया है और अख्लाक हत्याकांड जैसी निंदनीय घटनाएं अंजाम दी गई हैं | मुसलमानों को बदनाम करने और उन्हें प्रताड़ित करने के लिए इसका बार - बार इस्तेमाल किया जा रहा है , जो अति निंदनीय और अफ़सोसनाक है | इस कुप्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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