Jan 31, 2016

कम क्यों घटे पेट्रोल , डीज़ल के दाम ?

कम क्यों घटे पेट्रोल , डीज़ल के दाम ?

अतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत में लगातार जारी गिरावट और रूपए-डॉलर की एक्सचेंज रेट में ठहराव के मद्देनजर हमारे देश में इसकी कीमत एक लीटर मिनरल वाटर से भी नीचे आ सकता था, लेकिन सरकार के उत्पाद शुल्क में बढ़ोतरी के कारण इसका फायदा आम लोगों को नहीं मिल पा रहा है। जबकि सच्चाई यह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में जितनी गिरावट हुई है , उतनी गिरावट भारत में नहीं हुई है | बताया जाता है कि अमेरिका में पिछले 13 माह में पेट्रोल के दाम 22 प्रतिशत घटे हैं , जबकि भारत में 8 . 8 प्रतिशत ही घटे हैं | इसका मुख्य कारण है कि सरकार ज्यादा राजस्व पाने के लिए पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में लगातार इजाफा कर रही है | अभी साल की शुरुआत में ही उत्पाद शुल्क फिर से बढ़ा दिया गया | विगत 16 जनवरी को पेट्रोल पर 75 पैसे और डीज़ल पर दो रूपये प्रति लीटर उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया गया | अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की घटी हुई कीमतों के कारण इस समय देश में एक लीटर कच्चे तेल की कीमत 12 रूपए हो गई है, जबकि मिनरल वाटर की एक बोतल 15 रूपए से अधिक की आती है | अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जहां 70 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है, वहीं भारत में पेट्रोल कीमतों में सिर्फ 20 प्रतिशत ही कमी लाई गई है | वित्तवर्ष 2015-16 में पेट्रोल पर आधारभूत उत्पाद शुल्क 7.72 रुपये प्रति लीटर तक पहुंचा है, वहीं डीज़ल में यह 7.83 रुपये प्रति लीटर है | सरकार ने पिछले एक साल में कई बार उत्पाद शुल्क बढ़ाया है | आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारतीय बास्केट में कच्चा तेल 2001.28 (30.02 डॉलर प्रति बैरल) रुपए प्रति बैरल पर आ गया। तेल की कीमतें मांग और आपूर्ति में संतुलन न होने के कारण गिरती जा रही हैं। एक बैरल में 158 लीटर तोल होता है। अगर लीटर के संदर्भ में इसकी गणना की जाए तो यह 12.67 रुपए प्रति लीटर का पड़ेगा जो एक लीटर पानी के मूल्य 15 रुपए से भी कम है, लेकिन सरकार के नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच उत्पाद शुल्क में सात बार वृद्धि करने से दिल्ली में पेट्रोल 59.35 रुपए और डीजल 45.03 रुपए प्रति लीटर बिक रहा है।अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ उठाते हुए राजस्व घाटा कम करने के लिए सरकार ने गत 7 नवंबर से अब तक चार बार पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाया है। 7 नवंबर को पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 1.60 रुपए तथा डीजल पर 30 पैसे प्रति लीटर बढ़ाया गया था, जबकि 16 दिसंबर को इनमें क्रमश: 30 पैसे तथा 1.17 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी की गई थी। सरकार ने इससे पहले नवंबर 2014 से जनवरी 2015 के बीच भी चार बार में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 7.75 रुपए तथा डीजल पर 6.50 रुपए प्रति लीटर बढ़ाया था।
इस प्रकार मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से सात बार में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 11.77 रुपए तथा डीजल पर 11 .97 रुपए प्रति लीटर बढ़ चुका है | इससे सरकार के राजस्व घाटे को कम करने में अवश्य मदद मिलेगी | लेकिन तेल की कीमतों में लगातार कमी के चलते भारतीयों पर पड़नेवाले नुक़सान भी कम नहीं ! इसका तेल निर्यातक खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव भी पड़ रहा है | खाड़ी के देशों में लाखों भारतीय काम कर रहे हैं | बहुतों की नौकरी या तो ख़त्म की जा रही है या ख़तरे में है | नयी भर्तियों को यथासम्भव टाला जा रहा है | सऊदी अरब ने मजबूरन पांच साल में भारी कायापलट की योजना बनायी है | सऊदी सरकार की 90 फ़ीसदी आमदनी तेलों पर निर्भर है | अर्थव्यवस्था का दूसरा बड़ा क्षेत्र वहां धार्मिक यात्राओं से होने वाली आमदनी है , लेकिन कच्चे तेल के गिरते भाव की वजह से वहां बजट घाटा 15 फ़ीसदी से ऊपर चला गया है | बजट घाटे का मतलब है कि सरकारी की आमदनी के मुक़ाबले ख़र्चों का ज़्यादा होना | सऊदी अरब का विदेशी मुद्दा भंडार भी साल भर में 14 फ़ीसदी (100 अरब डॉलर) गिर चुका है | पिछले महीने सऊदी अरब में पेट्रोलियम पदार्थों पर 40 फ़ीसदी टैक्स लगा दिया गया , जो पहले बिल्कुल नहीं था | वहां बिजली और पानी को भी महंगा बनाया जा रहा है | मुफ़्त शिक्षा, स्वास्थ्य और मकान की योजना भी बदली जा रहा है |कच्चे तेल के गिरते भाव का असर भारतीय तेल कम्पनियों पर भी पड़ा है | नये निवेश के लिए उनकी हिम्मत पस्त पड़ रही है | कई जगह तो मौजूदा उत्पादन को इसलिए घटा लिया गया , क्योंकि उसकी लागत आयातित कच्चे तेल के मुक़ाबले महंगी पड़ रही थी | क़रीब डेढ़ साल से कच्चे तेल का गिरता दाम भारत जैसे आयातित ईंधन पर निर्भर देशों के लिए वरदान साबित हो रहा है | दूसरी ओर, तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था पर भारी संकट के बादल मंडरा रहे हैं | इस कारण से खाड़ी का सबसे बड़ा देश सऊदी अरब भी अपनी अर्थनीति में भारी बदलाव के लिए मज़बूर हुआ है. वहां हालात लगभग वैसे ही हैं , जैसे 1991 में भारत में थे, जिसने देश को आर्थिक सुधारों के लिए मज़बूर किया था | अब तेल उत्पादक देशों की खस्ताहाली से देश के विदेशी मुद्रा भंडार भारतीय मुद्रा के मूल्य पर दबाव आया है , लेकिन अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के गिरते भाव ने संकट में फंसी भारतीय अर्थव्यवस्था की मुसीबतों को काफ़ी कम कर दिया है | सरकार दो लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की कमाई पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद शुल्क और करों को बढ़ाकर इसलिए हासिल कर पायी है, क्योंकि कच्चे तेल के भाव लगातार गिर रहे हैं | यह पहला अवसर है कि भारत सरकार पेट्रोलियम पदार्थों पर लागत से भी काफ़ी ज़्यादा टैक्स वसूल रही है | इससे सरकार ने सामाजिक कल्याण की कई योजनाओं पर होने वाले कुल ख़र्च से भी ज़्यादा रक़म जुटा ली है | अतिरिक्त राजस्व से सरकार को ढांचागत निवेश के लिए भी ख़ासी रक़म मिल रही है |




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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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