Jan 31, 2016

भ्रष्टाचार पर क़ाबू न पाने का निहितार्थ


 '' कम हुआ नहीं लगता देश का भ्रष्टाचार '' शीर्षक से प्रकाशित ' कान्ति ' के पिछले 10 जनवरी के अंक के संपादकीय में चिंता जताई गई थी कि लगता है भ्रष्टाचारी किसी सरकार से नहीं डरते | इसलिए भ्रष्टाचार की घटनाएं बार - बार सामने आ रही हैं | अब एक सर्वे में यह तथ्य उजागर हुआ है कि मोदी सरकार के दौरान भी भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है , जबकि भ्रष्टाचार से परेशान जनता सुशासन की चाह में सत्ता - परिवर्तन किया था | ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) की ताज़ा रिपोर्ट में है कि सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार का वही हाल है, जो एक साल पहले था। जनता की भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लगातार लड़ाई के बावजूद उक्त संगठन के सर्वेक्षण में देश को महज़ 38 अंक मिले हैं। पिछले वर्ष भी भारत के इतने ही अंक थे। 168 देशों की सूची में भारत का स्थान 76वां है। यह इंडेक्स 168 देशों में सरकारी क्षेत्र की कंपनियों में भ्रष्टाचार की स्थिति पर आधारित है | इंडेक्स में जितने अधिक नंबर होते हैं, भ्रष्टाचार उतना ही कम होता है। इस हिसाब से भारत की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। वहीं पिछले साल रैंकिंग में 174 देश शामिल थे और उनमें भारत 85वें नंबर पर था। ऐसे में इस बार देशों की संख्या कम होने से रैंकिंग भी कम हुई है। पड़ोसी देशों की बात करें तो भूटान के हालात सबसे बेहतर हैं। 65 अंकों के साथ यह देश 27वें नंबर पर हैं। भारत के सभी पड़ोसी सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार की समस्या से बुरी तरह जूझ रहे हैं। इस रैंकिंग में चीन 83 तो बांग्लादेश 139वें पायदान पर है। पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल के अंकों में मामूली इज़ाफ़ा हुआ है। वहीं दुनिया में डेनमार्क सबसे कम भ्रष्ट देश है। उसे 91 प्वाइंट्स के साथ लगातार दूसरे साल यह तमगा मिला है। दूसरे नंबर पर स्थित फिनलैंड के 90 और स्वीडन के 89 नंबर हैं। उत्तर कोरिया और सोमालिया सूची में सबसे नीचे हैं। दोनों देशों का स्कोर आठ है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के एशिया पैसेफि‌क क्षेत्र के डायरेक्टर श्रीरक प्लीपट के मुताबिक़ , भारत में भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए किए वादों को तोड़ने के मामले बहुत अधिक है। ऐसे मामले मई 2014 में हुए आम चुनाव से फरवरी 2015 दिल्‍ली विधानसभा के बीच ज्यादा देखे गए हैं। उन्होंने कहा कि इस वर्ष जारी सीपीआई इंडेक्स से जनता और नेताओं को कड़ा संदेश मिलेगा। जनता अब सरकार से भ्रष्टाचार के ऊपर सवाल पूछ सकेगी और चुनावी वादों को निभाने के लिए दबाव बना सकेगी। साथ ही उन्होंने वर्तमान मोदी सरकार के कामकाज पर कहा कि यह सरकार वादा करने में सबसे आगे है और निभाने में सबसे पीछे।
सभी जानते हैं कि केन्द्रीय सत्ता में आने से पहले से ही भ्रष्टाचार और काले धन को जिस तरह नरेंद्र मोदी ने अपना बड़ा मुद्दा बनाया था , उससे इस सोच को बल मिला था कि नई सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी , लेकिन लगभग डेढ़ वर्ष से अधिक गुज़र जाने के बाद भी अमलन कुछ ख़ास नहीं हो सका | यह बात अलग है कि सरकार बनते प्रधानमंत्री मोदी ने न्यायालयों में भ्रष्ट नेताओं पर चल रहे मामलों की फास्ट ट्रैक सुनवाई करने की अपील की , मगर अभी तक कुछ हो न सका ! दूसरी ओर इस पर भी गौर किया जाना चाहिए कि वर्तमान कैबिनेट में तमाम आपराधिक मामलों में आरोपित लोगों की तादाद पुरानी कांग्रेस सरकार के दागी मंत्रियों से करीब दोगुनी है | 66 सदस्यीय वर्तमान कैबिनेट के करीब एक तिहाई मंत्री आपराधिक धमकी, धोखाधड़ी , तो कुछ दंगा भड़काने और बलात्कार जैसे गंभीर आरोपों में घिरे हैं | लोकपाल भी अभी तक हवा में हैं | आप के लोकपाल को भी मोदी सरकार ने रोककर क़ानूनी दांव - पेंच के हवाले कर दिया है और केजरीवाल सरकार को निबटाने पर पूरा ज़ोर लगा रखा है | भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून में उचित संशोधन करने के साथ ही लोकपाल जैसी व्यवस्था को लागू करने से भ्रष्टाचार पर रोकथाम में काफी मदद मिल सकती है | आर्थिक विकास से ही भ्रष्टाचार उन्मूलन - संभव नहीं | फिर देश का अपेक्षित आर्थिक विकास भी तो नहीं हो पा रहा !1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भ्रष्टाचार को वैश्विक चलन कहा था | इस वक्तव्य के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री के ऐसी बात करने पर खेद जताया था | 1989 के लोकसभा चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा छाया रहा | तबसे लेकर आज तक चुनावी अभियानों में भ्रष्टाचार मिटाने के दावे बढ़चढ़ कर उछाले जाना आम बात हो गई है | ऐसे में इन दावों की कलई तब खुलती है , जब भारत सूची में बुर्किना फासो, जमैका, पेरु और जाम्बिया जैसे गरीब देशों के पायदान जैसा पाया जाता है | वस्तुस्थिति यह है कि आज हमारा देश भ्रष्टाचार और नैतिक पतन से गंभीर रूप से जूझ रहा है | भ्रष्टाचार पूरी व्यवस्था को तबाह और बर्बाद कर रहा है | जब तक इन्सान के नैतिक अस्तित्व को सबल नहीं बनाया जाएगा और उसके अंदर ईशपरायणता एवं ईशभय नहीं पैदा होगा , तब तक भ्रष्टाचार - उन्मूलन असंभव है | पूरी सृष्टि में केवल इन्सान ही ऐसा प्राणी है , जिसे कर्म और इरादे का अधिकार प्राप्त है | वह ईश्वर द्वारा स्रष्ट सभी जीवों और चीजों में सर्वश्रेष्ठ है , अतः सृष्टि की बहुत - सी चीज़ें उसके वशीभूत की गई हैं , जिनका वह अधिकारपूर्वक उपभोग करता है और कर सकता है | उहाँ यह तथ्य भी स्पष्ट रहे कि इन्सान के न तो अधिकार असीमित हैं और न ही उपभोग | उसके लिए भी एक सीमा - रेखा है , जिसे मर्यादा कहते हैं | यह चीज़ ही इन्सान को नैतिक अस्तित्व प्रदान करती है | मर्यादा और नैतिक अस्तित्व को बनाये रखने के लिए ही सदाचरण के द्वारा इन्हें परिमार्जित करने एवं जीवन को उच्चता की ओर ले जाने के लिए इन्सान को आध्यात्मिकता की ज़रूरत होती है , जो उसके जीवन की नैसर्गिक , बुनियादी और अपरिहार्य आवश्यकता है | अतः भ्रष्टाचार - निवारण के लिए अनिवार्य है कि इन्सान अपने स्रष्टा - पालनहार की ओर पलटे और उसका आज्ञाकारी और ईशपरायण बने |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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