Dec 12, 2015

समान सिविल कोड और सुप्रीम कोर्ट

समान सिविल कोड
और सुप्रीम कोर्ट

समान सिविल कोड के मुद्दे पर दायर की गई जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने विगत सात दिसंबर 15 को सुनवाई करने से इन्कार करके बड़ा ही बुद्धिमत्तापूर्ण क़दम उठाया है | इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई थी कि वह सरकार को समान सिविल कोड तैयार करने का निर्देश दे। याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्वनी उपाध्याय की ओर से दाखिल की गई थी , जिसमें कहा गया था कि समान सिविल कोड प्रगतिशील आधुनिक राष्ट्र का प्रतीक है। इसके लागू होने से पता चलेगा कि देश में धर्म, जाति, वर्ण के आधार पर भेदभाव समाप्त हुआ है और राष्ट्र आगे बढ़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में संसद ही कोई फैसला कर सकती है। बता दें कि एक जनहित याचिका दाखिल कर देश भर के नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग की गई है ताकि विभिन्न धर्मो में व्याप्त भेदभाव समाप्त हो। इस याचिका की अस्ल मंशा जो भी रही हो , लेकिन इसमें यह बात भी कही गई है कि '' हिन्दू विधि को चार कानूनों में संहिताबद्ध किया गया है लेकिन परंपरा और रीतिरिवाज को स्वीकार करके भ्रम की स्थिति पैदा कर दी गई , अतः समान सिविल कोड आवश्यक है | ''
ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी के बाद समान सिविल कोड पर अवांछित बहस छिड़ गयी है | उसने इस पर केंद्र सरकार से रुख साफ करने को कहा था । कोर्ट ने गत 13 अक्तूबर 2015 को सरकार से पूछा, “समान सिविल कोड पर आपको (सरकार) हो क्या गया? अगर इसे लागू करना चाहते हैं तो लाइए। आप इसे फौरन लागू क्यों नहीं करते? देश में कई पर्सनल लॉ हैं। इससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है।” 
कोर्ट ने यह बात क्रिश्चियन डायवोर्स एक्ट की धारा 10ए(1) को चुनौती देने वाली अर्जी की सुनवाई के दौरान कही। दिल्ली के अलबर्ट एंथोनी द्वारा दायर याचिका में दलील दी गई थी कि “ईसाई दंपत्ति को तलाक के लिए कम से कम दो साल अलग रहना जरूरी है। जबकि हिंदू मैरिज एक्ट में एक साल अलग रहने पर तलाक दे दिया जाता है। एक ही मामले में दो व्यवस्थाएं गलत हैं।” 
पिछली सुनवाई में सरकार धारा 10ए(1) को बदलने पर राजी थी। कहा था कि काम शुरू भी हो चुका है। 12 अक्तूबर 15 की सुनवाई में जस्टिस विक्रमजीत सेन और जस्टिस शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने नाराजगी जताई कि 3 महीने बाद भी इसे बदला नहीं गया है। जब सरकारी वकील ने और समय मांगा तो बेंच ने कहा, “क्या हुआ? किस वजह से ऐसा नहीं हो सका? अगर आप ऐसा करना चाहते हैं तो आपको बताना चाहिए।”
वकील के जवाब से नाखुश होने पर कोर्ट ने किसी और काम के लिए वहां मौजूद सॉलीसिटर जनरल रंजीत कुमार से मदद करने को कहा। उनसे सभी धर्मों के लिए तलाक के एक जैसे नियम पर सरकार की स्थिति के बारे में पूछा। साथ ही जवाब देने के लिए तीन हफ्ते का वक्त दे दिया , लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं दिया गया है |
केन्द्रीय कानून मंत्री डी.वी. सदानंद गौड़ा ने सुप्रीमकोर्ट की टिप्पणी के बाद राष्ट्र की अखंडता के लिए समान सिविल कोड की जरूरत पर बल देते हुए कहा था कि इस मुद्दे पर सभी पक्षों से राय हासिल करने एवं व्यापक चर्चा के बाद ही कोई फैसला किया जा सकता है।गौड़ा ने कहा था कि इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में सरकार द्वारा हलफनामा दाखिल करने से पहले वह प्रधानमंत्री, कैबिनेट के सहयोगियों, अटार्नी जनरल और सालीसीटर जनरल के साथ विचार करेंगे। उन्होंने कहा कि समान सिविल कोड पर सहमति बनाने के लिए विभिन्न पर्सनल लॉ बोर्डों और संबंधित पक्षों के साथ व्यापक चर्चा की जाएगी। कानून मंत्री के अनुसार , देश के संविधान की प्रस्तावना और अनुच्छेद 44 में भी समान सिविल कोड की बात कही गई है। लेकिन यह संवेदनशील मुद्दा है, इसलिए बड़े पैमाने पर चर्चा जरूरी है।
अब सुप्रीमकोर्ट ने जनहित याचिका ख़ारिज करके अनावश्यक बहसा - बहसी पर रोक लगा दी है और गेंद केंद्र के पाले में डाल दी है | वास्तव में समान सिविल कोड संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों के सर्वथा विपरीत है | संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अंतःकरण और धर्मानुसार अमल करने की आज़ादी देता है | ऐसी ही बात संविधान की प्रस्तावना में कही गई है | संविधान में धाराओं 25 (1) और 26 के अंतर्गत जो बातें कही गई है उनका सार यह है कि हर धार्मिक समुदाय को इसका अधिकार प्राप्त होगा कि अपने धर्म पर चले, तथा अपने तौर पर अपने धार्मिक क्रिया-कलाप अंजाम दे। 
अतः यह सिर्फ़ मुसलमानों (या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों) का मामला ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधान का भी तक़ाज़ा है कि उसके अंतर्गत देश में समान सिविल कोड लागू न हो। मुसलमानों ने भी समान सिविल कोड को लागू नहीं किया | जब वे लगभग नौ सौ वर्ष देश के शासक रहे , कभी भी उन्होंने हिन्दू या अन्य धर्मानुयायी जनता पर अपना क़ानून नहीं थोपा | अंग्रेज़ों ने लार्ड मैकाले की अध्यक्षता में समिति बनकर भारतीय दंड संहिता , भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता , भारतीय व्यवहार प्रक्रिया संहिता , भारतीय साक्ष्य अधिनियम आदि बहुत - से क़ानून लागू कर दिए , लेकिन समान सिविल कोड की ओर नहीं बढ़े , क्योंकि वे यह जानते थे कि यह किसी भी क़ीमत पर लागू नहीं हो सकता | उन्होंने मुसलमानों के लिए पारिवारिक क़ानून 1937 और अलग से मुस्लिम मैरिज डिज़ुलेशन एक्ट 1939 बनाया | देश के किसी भी हितैषी व स्कालर ने समान सिविल कोड का समर्थन नहीं किया है |
डॉ. अंबेडकर जो संविधान निर्मात्री सभा के प्रमुख नेता थे सभा में नीति निर्देशक तत्व की धारा 44 में इस बाबत रखे गये प्रावधान पर दक्षिण के कुछ मुस्लिम सदस्यों की आपत्ति का जवाब देते हुए कहा था कि जब तक सब देशवासी इसके लिए राज़ी नहीं होंगे , इसे कदापि लागू नहीं किया जाएगा | देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं . जवाहरलाल नेहरू ने भी कई बार इसी आशय का मत प्रकट किया था | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को लंबे समय तक नेतृत्व देनेवाले गुरु गोलवलकर जी भी इसके समर्थक है कि देश समान सिविल कोड लागू न हो | 20 अगस्त 1972 को दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने साफ़ कहा था कि देश में समान सिविल कोड अवांछित है | उन्होंने कहा था कि जो लोग समान सिविल कोड की बात करते हैं , वे भारत की ज़रूरत समझते ही नहीं हैं | गुरु जी ने इसी आशय के उद्गार एक इंटरव्यू में व्यक्त किए थे , जो 26 अगस्त 1972 को ' मदरलैंड ' में छपा था | 
आश्चर्य की बात है कि आज संघ परिवार के लोग अपने गुरु जी की बात का बार - बार अनादर करते हैं | भाजपा नेताओं द्वारा इसकी ज़रूरत बार - बार बताकर गुरु जी की आत्मा को ठेस पहुंचाई जाती है , यहाँ तक कि भाजपा इसे अपने घोषणापत्र तक में शामिल कर चुकी है | देश की अदालतें भी मुस्लिम पर्सनल लॉ को समुचित महत्व नहीं देतीं , जिसके कारण बार - बार समस्या पैदा होती है | एक ओर देश में मौजूद मुस्लिम पर्सनल ला में बहुत - सी ख़ामियां हैं , जिन्हें दूर करने की ज़रूरत है और इस मामले को स्थाई रूप से हल किया जाना चाहिए , ताकि भविष्य में मुस्लिम पर्सनल लॉ का अतिक्रमण न किया जा सके |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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