Dec 9, 2015

मानव - प्रकृति का हरहाल में करें लिहाज़

मानव - प्रकृति का हरहाल में करें लिहाज़ 

पूरी दुनिया में महान पैगम्बर हज़रत इबराहीम [ अलैहि .] द्वारा अल्लाह के हुक्म पर अपने पुत्र हज़रत इस्माईल की क़ुरबानी की याद में ईदुल अज़हा मनायी जाती है | यह वास्तव में अल्लाह द्वारा हज़रत इबराहीम [ अलैहि .] की ईशपरायणता की परीक्षा थी , जिस पर वे पूर्णतः खरे उतरे | इस अवसर पर मुस्लिम समाज के सभी व्यक्ति, प्रतीकात्मक रूप से ईश्वर से अपने संबंध, वफ़ादारी और संकल्प को हर वर्ष ताज़ा करते हैं कि ‘‘ ऐ अल्लाह ! तेरा आदेश होगा, आवश्यकता होगी, तक़ाज़ा होगा तो हम तेरे लिए अपनी हर चीज़ क़ुरबान करने के लिए तैयार व तत्पर हैं।’’ यही ईशपरायणता का चरम-बिन्दु है। कुछ लोग अक्सर यह आपत्ति करते हैं कि क़ुरबानी मांसाहार को बढ़ावा और जीवहत्या है , जबकि वे इसका मर्म - मन्तव्य नहीं समझते | अन्य धर्मों और समुदायों में भी क़ुरबानी किसी न किसी रूप में प्रचलित है
भारत के कई राज्यों जैसे तमिलनाडु, पश्चिमी बंगाल व उत्तराखण्ड आदि में गैर-मुस्लिम समाज में बलि की प्रथा प्रचलित है जो बड़ी निर्दयता व निर्भयता से की जाती है। नेपाल में वीरगंज के समीप गढ़ी माई मंदिर में विशेष पूजा के अवसर पर लाखों पशुओं की बलि दी जाती है। नाहन (सिरमौर) गिरिपार में माघी के दिन हर वर्ष हजारों बकरों की बलि दी जाती है और इसे धार्मिक तौर पर विहित व जायज़ माना जाता है | वास्तव में क़ुरबानी और मांसाहार दोनों धर्म के प्रतिकूल नहीं हैं | इनके पक्ष में कुछ वैदिक मंत्रों को भी पेश किया जाता है - 
उक्ष्णो   हि    मे   पंचदश   साकं   पचन्ति   विंशमित्।
उताहमद्मि पवि इदुभा कुक्षी पृणन्ति में विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः।।
(ऋग्वेद, 10-86-14) भावार्थ - मेरे लिए इंद्राणी द्वारा प्रेरित यज्ञकर्ता लोग 15-20 बैल मार कर पकाते हैं, जिन्हें खाकर मैं मोटा होता हूँ। वे मेरी कुक्षियों को भी सोम रस से भरते हैं।
 यजुर्वेद के एक मंत्र में पुरुषमेध का प्राचीन इतिहास इस तरह प्रस्तुत किया गया है।
देवा यद्यज्ञं तन्वानाऽ अवध्नन् पुरुषं पशुम।
     (यजुर्वेद, 31-15)
भावार्थ - इंद्र आदि देवताओं ने पुरुषमेध किया और पुरुष नामक पशु का वध किया।
 अथर्ववेद में स्पष्ट शब्दों में पांच प्राणियों को देवता के लिए बलि दिए जाने योग्य कहा है -
 तवेमे पंच पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः।
     (अथर्ववेद, 11-29-2)
 भावार्थ - हे पशुपति देवता, तेरे लिए गाय, घोड़ा, पुरुष, बकरी और भेड़ ये पांच पशु नियत हैं।
मनुस्मृति में न केवल मांस भक्षण का उल्लेख और संकेत है, बल्कि मांस भक्षण की स्पष्ट अनुमति दी गई है। मनुस्मृति में मांस भक्षण की अनुमति के साथ मांस भक्षण की उपयोगिता और महत्व भी बताया गया है -
यज्ञे वधोऽवधः| (मनु0, 5-39) भावार्थ - यज्ञ में किया गया वध, वध नहीं होता।
अब देखिए एक दूसरा पक्ष - इन मान्यताओं के बीच यह भी सच है कि देश में पशु वध निषेध की संजीदा कोशिशें हो रही हैं | इस विषय में कई क़ानून भी बने हैं | अभी पिछले दिनों कुछ पशु कारोबारियों को दिल्ली की एक अदालत ने उम्रकैद की सज़ा भी सुना दी है इन पर आरोप है कि इन्होंने पशुओं के कारोबार के सिलसिले में आपराधिक साज़िश रची और हत्या की कोशिश की
 अतिरिक्त सेशन जज कामिनी लॉ ने 12 अक्तूबर 2014 को अपने फ़ैसले में कहा कि बचाए गए पशुओं को डील करने के मामले में कानूनी प्रावधान नहीं है। ऐसे कानूनी प्रावधान की जरुरत है ताकि बचाए गए पशुओं का संरक्षण और देखभाल हो सके। मौजूदा कानून के तहत इस बात का प्रावधान नहीं है कि बचाए गए पशुओं को कैसे डील किया जाए ताकि उन्हें दोबारा शिकार न होना पड़े। कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें बचाए गए पशुओं को सुपुर्ददारी पर छोड़ा जाता है और उनका दोबारा वही हाल होता है। कानून इस बारे में चुप है। कानून बनाने वालों को इसे देखना होगा। देश के पशु धन को राष्ट्रीय स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रोटेक्ट करना जरूरी है |

अदालत ने सरकार से कहा है कि संवैधानिक दायित्व का पालन करने के लिए यह जरूरी है कि वह इसके लिए राष्ट्रीय नीति बनाए । बचाए गए जानवर को किसान के हवाले किया जाए ताकि उनका सही देखभाल हो सके। इन्हें दिल्ली एग्रीकल्चर कैटल प्रिवेंशन एक्ट के तहत दोषी करार दिया है। यह मामला 18 जनवरी, 2013 का है। आवश्यकता इस बात की है कि जनता से जुड़े सभी मामलों को मानव के सहज स्वभाव और प्रकृति के अनरूप ही हल किया जाए और अवांछित पाबंदियों से बचा जाए

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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