Nov 3, 2015

तेलंगाना की अनुकरणीय पहल

तेलंगाना की अनुकरणीय पहल

बिगड़ी हुई सामाजिक सोच ने महिलाओं के लिए भी हमेशा परेशानियाँ पैदा की हैं | इसका एक विकृत रूप दहेज की शक्ल में लंबे अरसे से हमारे सामने है | एक सर्वेक्षण के अनुसार , देश में औसतन हर घंटे एक महिला दहेज या दहेज संबंधी वजहों से मार दी जाती है। इन्हीं अशुभ और क्षोभकारी समाचारों के बीच देश के एक नवोदित राज्य तेलंगाना से जो स्वस्थ जागरूकता का प्रमाण मिला है , वह बड़ा सुखद और स्वागतयोग्य है | वहां के नवाबपेट गांव के लोग इन दिनों दहेज में बरसों पहले मिली रकम वापस लौटा रहे हैं। निश्चय ही ग्रामीणों के इस क़दम का ठीक ढंग से प्रचार - प्रसार हो तो यह देशव्यापी अभियान का शक्ल ले सकता है | ऐसा इसलिए कहा जा सकता है , क्योंकि देश के अधिकांश युवा इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ हैं | फरवरी 2015 में कराए गए एक सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि देश के 72 फीसदी युवक शादी में दहेज लेने के खिलाफ हैं , जबकि 75 फीसदी युवा मानते हैं कि दहेज प्रथा का अंत करना संभव है | सर्वेक्षण के अनुसार , 59.8 फीसदी युवकों का कहना है कि दहेज मांगने वाले लोगों को तुरंत जेल भेज दिया जाना चाहिए। वहीं दूसरी ओर 40.2 प्रतिशत युवक दहेज लोभी ससुरालवालों का सामाजिक बहिष्कार करने को सही ठहराते हैं। इस सर्वेक्षण की उल्लेखनीय बात यह भी रही कि 51.4 फीसदी लड़कियों ने कहा कि दहेज की मांग होने पर वे अपनी शादी तोड़ देंगी। 48.6 फीसदी लड़कियों ने कहा कि अगर उनके ससुरालवाले दहेज मांगेंगे तो वे सार्वजनिक तौर पर उनकी बदनामी कर देंगी। वास्तव में हमारे देश मे महिलाओं की दशा इतनी दयनीय और शोचनीय होने के पीछे एक बड़ा कारण है दहेज नामक कुप्रथा | इस कुप्रथा के चलते भी देश में कन्या भ्रूणहत्या की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं | दहेज की कुप्रथा के कारण भी लड़कियों को हर क्षेत्र मे दबाया जाता है | विडंबना देखिए कि वधू पक्ष ही वर को भरपूर दहेज भी दे, अपनी बेटी को अघोषित रूप से 24 घण्टे की सेविका बनाकर वर पक्ष को दे दे , फिर भी रौब और अकड़ वर पक्ष दिखाए, और कन्या पक्ष उसके आगे झुका रहे | शादी से पहले मां बाप के कंधो का बोझ होने की हीनता लड़कियों के मन बैठा दी जाती है | सच है कि आज यह कुप्रथा एक बड़ी राष्ट्रीय और सामाजिक समस्या के साथ बेटियों के माता-पिता के लिए आर्थिक समस्या भी है | दहेज विरोधी क़ानून की मौजूदगी के बावजूद समाज में दहेज के लेन-देन चलन और दायरा बढ़ता ही जा रहा है ! गौरतलब है कि 2012 में भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में बेटी की शादी पर हर परिवार औसतन 1 लाख 26 हजार 724 रुपये खर्च करता है। साथ ही अध्ययन में यह बात भी सामने आई थी कि देश में हर परिवार बेटी की शादी पर औसतन 30 हजार रुपये का दहेज देता है। आज की परिस्थिति में यह कहने में संकोच नहीं कि दहेज विरोधी क़ानून पूरी तर्ज निष्प्रभावी हो चुका है | आज भी कहीं - कहीं विज्ञापन के ये शब्द नारे के रूप में लिखे दिख जाते हैं कि '' दहेज लेना या देना अपराध है '' और '' दुल्हन ही दहेज है | '' लेकिन यह बात एकदम सच है कि 1961 से लागू दहेज निरोधक कानून सिर्फ़ दिखावा बना हुआ है | इस कानून तोड़ने पर पांच साल की सज़ा और 15 हजार रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। 1985 में दहेज रोकने के कुछ कड़े नियम बनाये गए , लेकिन इन पर अमल नहीं हो पाया | नये नियमों के मुताबिक , शादी के समय दिए गए उपहारों की एक लिस्ट बनाकर रखी जानी चाहिए। लिस्ट में हर उपहार, उस उपहार की अनुमानित कीमत, उपहार देने वाले का नाम-पता और दुल्हन से उसके रिश्ते का विवरण मौज़ूद होना चाहिए। मगर कभी नियमानुसार नहीं किया जाता ! इस्लाम में दहेज को मान्यता नही दी गई है | इसकी शिक्षाएं दहेज के खिलाफ हैं | इस्लाम ने लड़कियो से दहेज मिलने के लालच या फिर उनकी सुन्दरता के लोभ मे विवाह करने की अनुमति मुस्लिम को बिल्कुल नहीं है | इसी तरह एक हदीस में है कि जो कोई व्यक्ति किसी औरत से केवल उसकी ताकत और उच्चस्तर पाने के लिए विवाह करता है तो अल्लाह उस व्यक्ति के केवल अपमान मे ही बढ़ोत्तरी करता है । जो व्यक्ति केवल किसी स्त्री की जायदाद मिलने के लालच मे उससे विवाह करता है, तो अल्लाह उसे केवल निर्धनता मे परिणित करता है, और जो व्यक्ति किसी केवल स्त्री की सुन्दरता के कारण विवाह करता है तो अल्लाह केवल उसमें कुरूपता की ही बढ़ोत्तरी करता है लेकिन जो व्यक्ति अपनी आंखों को सुरक्षित रखने के लिए ( अपनी यौन शुचिता को बनाए रखने के लिए ) विवाह करता है, और अपनी पत्नी के साथ दयालुता और भलाई का व्यवहार करता है तो अल्लाह उस वधू को वर के लिए शुभकारी बना देता है, और उस वर को वधू के लिए शुभकारी बना देता है | स्पष्ट है कि दहेज या अन्य किसी लोभ मे किसी स्त्री से विवाह करने को इस्लाम मे एक अप्रिय और निषेध कर्म ठहराया गया है और केवल भलाई और सदाचार पर कायम रहने के लिए विवाह किए जाने को प्रोत्साहित किया गया है, जिससे दहेज अपराध जैसी, भ्रूण हत्या जैसी कोई चीज समाज मे पनप ही न पाए | बस ज़रूरत है , इन शिक्षाओं पर अमल करने की |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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