Nov 25, 2015

बलात्कार के मामलों में बेतहाशा वृद्धि , प्रभावी रोक की ज़रूरत

बलात्कार के मामलों में बेतहाशा वृद्धि , प्रभावी रोक की ज़रूरत

यह बड़ी चिंता और अफ़सोस की बात है कि आज देश में बलात्कार के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। नये आंकड़े बताते हैं कि भारत में बलात्कार संबंधी मामलों में कई गुना वृद्धि हो गई है। पिछले 13 जून को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2001 से 2014 के बीच बलात्कार के मामलों में दोगुनी वृद्धि हुई है। यह रिपोर्ट कोवलम [ केरल ] में लैंगिक समानता पर हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में जारी किए गए बहुप्रतिक्षित रिपोर्ट का हिस्सा है। भारत में महिलाओं की स्थितिविषय पर आई इस रिपोर्ट के अनुसार, देश में बलात्कार के मामले 16075 से बढकर 36735 तक पहुंच गए हैं। विवाहित महिलाओं के साथ क्रूरता के मामले 49170 से बढकर 122877 तक पहुंच गए। वास्तव में देश में बलात्कार के आंकड़े बड़े भयावह हैं | देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में आए दिन बलात्कार के एक से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं और कई मामलों में तो हैवायित भी सामने आ रही हैं। छोटी - छोटी बच्चियां भी इस दरिंदगी की चपेट में आ रही हैं | 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में दामिनी बलात्कार कांड के बाद जो जन - जागरूकता पैदा हुई थी , उसे देखकर ऐसा लगता था कि बलात्कार की घटनाओं पर रोक लगेगी चाहे वह सीमित रोक क्यों न हो | मगर हुआ कुछ नहीं ! हाँ , इस जागरूकता का राजनीतिक लाभ ज़रूर उठाया गया | वही यह भी लगता है कि बलात्कार की यह घटना इतनी प्रचारित की गई और बलात्कारियों का दमन भी नहीं हुआ और दिल्ली में शराब और नेट - कल्चर को काफ़ी विस्तार दे दिया गया, इसलिए भी बलात्कार की घटनाएं किसी हद तक थम नहीं सकीं | इतना ही नहीं , अब बलात्कार विरोधी प्रदर्शनों का कोई असर होता नहीं दीखता ! दिल्ली में पिछले दिनों बलात्कार को लेकर लोगों ने सड़कों पर उतरकर आंदोलन भी किए , किन्तु कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। इसके विपरीत ये मामले कम होने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में यह सोचना होगा कि बलात्कार के बढ़ते मामलों के पीछे कौन दोषी है और इसे रोकने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए। आजकल बलात्कार की जितनी घटनाएं घट रही है हैं , उनके मूल कारणों में एक बड़ा कारण शराब का सेवन है . वास्तव में शराब बीमारियों की जननी है । मेडिकल साइंस ने इधर जाकर इसकी पुष्टि की है कि इसके शरीर पर बहुत घातक प्रभाव पड़ते हैं । सम्राट जार्ज के पारिवारिक डॉक्टर सर फ्रेडरिक स्टीक्स वार्ट का कहना है, ‘‘शराब शरीर की पची हुई शक्तियों को भी उत्तेजित करके काम में लगा देती है, फिर उसके ख़र्च हो जाने पर शरीर काम के लायक़ नहीं रहता ।’’ इसी प्रकार सर एंड्रू क्लार्क वार्ट [ एम॰डी॰] का कथन है, ‘‘शरीर को अल्कोहल से कभी लाभ नहीं हो सकता ।’’

गांधी जी ने कहा था कि स्वतंत्र भारत में एक बूंद शराब नहीं होगी , किन्तु आज गांधी के आदर्शों पर चलने वाले नेता ही शराब को बढ़ावा दे रहे हैं ! सरकार को भी यह मालूम है कि शराब की वजह से औरतों की जिंदगी सबसे अधिक प्रभावित होती है। अतः यह अनिवार्य है कि बलात्कार की रोकथाम के लिए शराब समेत सभी प्रकार के नशों को बंद कर दिया जाए । आज जगह-जगह बने नशामुक्ति केन्द्रों के होने का तो यही मतलब है कि सरकार चाहती है कि देश में ज्यादा से ज्यादा शराब की बिक्री हो और लोग वहां इलाज कराने आएं | वह राजस्व का बहाना बनाकर शराबबंदी नहीं चाहती | पुलिस भी इसमें सहायक है | वह शराब के दुष्प्रभावों के मामलों को भी नजरअंदाज कर देती है | उस पर यह आरोप भी लगता रहा है कि वह अपराध कम दिखाने के चक्कर में एफआईआर दर्ज नहीं करती या झूठे केस दर्ज करती है | पूर्व कमिश्नर टी आर कक्कड़ ने भी बोला था कि अपराध को बढ़ावा गृहमंत्री से मिलता है जो सच लगता है ,क्योंकि गृहमंत्री चाहता है कि उसके कार्यकाल में कम से कम अपराध दर रहे। इसका फायदा पुलिस और गृह मंत्रालय दोनों को पहुंचता है। पुलिस अपराधियों से रिश्वत लेती हैं और यह गृह मंत्रालय तक पहुंचती है। दूसरा फायदा यह है कि मामले कम दर्ज होते हैं और गृह मंत्री बदनामी से बचता है। बलात्कार जैसी घटनाएं रोकने के लिए महिला को प्रताड़ित करनेवालों को अमलन कड़ी सज़ा देने के साथ कामुक - अश्लील साहित्य के साथ ब्लू व अश्लील फिल्मों एवं टीवी चैनलों द्वारा फैलाई जा रही अश्लीलता पर भी प्रभावी रोक आवश्यक है | अब तक किसी भी सरकार ने इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है , मानो अश्लीलता को खुली छूट मिली हुई हो | आजकल टीआरपी बढ़ाने के लिए सब कुछ दिखाया जाता है , जिसका समाज पर बुरा प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है | सामाजिक संगठनों को चाहिए कि लोगों में महिला - सम्मान की मानसिकता विकसित करने हेतु ज़ोरदार अभियान चलायें , जिसमें धार्मिक साहित्य का भी इस्तेमाल करें | इस सिलसिले में इस्लाम की शिक्षाएं बड़ी कारगर भूमिका निभा सकती हैं

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

1 comments:

Diwakar Rege said...

कुछ समय पहले मैंने भी ऐसे ही विचार प्रकट किये थे, बलात्कार जैसे घटनाओं के लिए नशाखोरी ही जिम्मेदार हैI आज नशे की लत ने अच्छे अच्छे लोगों को चोरी डाका की प्रवृति में धकेल दिया हैI ऐसे लोग मानसिक रूप से कमजोर हो जाते है, उनके सोचने समझने की शक्ति कमजोर हो जाती है, वे ये नहीं महसूस करते की उनकी हरकतों से दूसरों को क्या तकलीफ हो सकती हैI

सरकार समझती है की सभी नशे के उत्पादों पर चेतावनी लिखना आवश्यक कर उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है जबकि सांख्यिकी पर जाये तो इन सबसे किसी प्रकार के उपभोग में कमी नहीं आई हैI आश्चर्य है की विज्ञापन भी ऐसे दिखाए जाते हैं की ऐसे उत्पादों का उपभोग सम्मान, गर्व एवं उच्च वर्ग की निशानी हैI फर्क केवल इतना है की शराब की जगह सोडा और तम्बाखू की जगह मीठी सुपारी के विज्ञापन होते है जबकि ब्रांडिंग तो शराब एवं गुटका की ही होती हैI

जब सरकार ही आम जनता को बेवकूफ बनाने लगे तो जिम्मेदार तो सरकार हुई नाI

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