Nov 24, 2015

भ्रष्टाचार के चलते गरीबी पर अंकुश नहीं !

भ्रष्टाचार के चलते गरीबी पर अंकुश नहीं !

हमारे देश में कितनी गरीबी है इसे लेकर हमेशा विवाद रहा है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि गरीबी के आकलन का पैमाना कैसा है ? इसके आकलन में कितनी ईमानदारी और निष्पक्षता बरती गई है | आम तौर पर देखा गया है कि सत्ता पक्ष देश की गरीबी को घटता हुआ दिखाता है और अपनी नीतियों की सफलता की बात फैलाकर वाहवाही लूटता है | यही कारण है कि आंकड़ों में गरीबी वास्तविकता से कम दिखती या दिखाई जाती रही है। जबकि सच्चाई यह है कि देश में एक तिहाई परिवार गरीब हैं और ऐसा हर पांचवां परिवार अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग से ताल्लुक रखता है। आज ग्रामीण भारत के सवा तेरह फीसद परिवार ऐसे हैं जो सिर्फ एक कमरे के कच्चे मकान में रहते हैं। अगर राज्यवार देखें तो ग्रामीण आबादी में गरीबों का अनुपात सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश में है। दूसरे नंबर पर छत्तीसगढ़ है। फिर बिहार और उत्तर प्रदेश का स्थान आता है। आकलन में रोजगार, शिक्षा, आमदनी और आमदनी का स्रोत, अनुसूचित जाति-जनजाति के वर्ग से संबंध, मकान, संपत्ति आदि कई पैमाने शामिल किए गए थे। इस आकलन में आए निष्कर्षों को सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं खासकर बीपीएल परिवारों के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं का आधार बनाने की बात कही गई है , मगर यह कोई अजूबी बात नहीं है। पहले भी जनगणना से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग होता रहा है और ' उपयोग में ' भ्रष्टाचार ' का व्यापक घालमेल कर उन्हें गरीब बनाये रखा जाता है | इसके चलते गरीबी पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है | सवाल यह भी पैदा होता रहा है कि गरीब कौन है ? रंगराजन समिति ने तय किया था कि अगर कोई ग्रामीण व्यक्ति 32 रुपए रोजाना से अधिक खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं है। इस पहले बनी तेंदुलकर समिति ने गरीबी की रेखा प्रति ग्रामीण व्यक्ति के लिए 27 रुपए रोजाना तय की थी। ज़ाहिर है , ये दोनों पैमाने पूरी तरह असन्तोषजनक हैं | असंगठित क्षेत्र की रोजगार-असुरक्षा और कृषि क्षेत्र के व्यापक संकट ने गरीबी को मापने के अब तक अपनाए जाते रहे पैमानों पर सवालिया निशान लगा दिया है।
वास्तव में देश की बहुत बड़ी आबादी भूखे पेट जीवन गुज़ारने के लिए अभिशप्त है |वैश्विक स्तर पर हल में आई एक रिपोर्ट का कहना है कि भारत भूखे लोगों का घर है | विश्व की सबसे अधिक भूख से पीड़ित आबादी यहां निवास करती है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स को पूरा करने में नाकाम रहा। रिपोर्ट के अनुसार 27 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे निवास करते हैं | इनकी कमाई 1.25 डॉलर प्रतिदिन से कम है। यहां की एक चौथाई जनसंख्या कुपोषण का शिकार है और लगभग एक तिहाई जनसंख्या भूख से पीड़ित है। विश्व में सामाजिक सुरक्षा के तहत रोजगार प्रदान करने में विश्व बैंक ने मनरेगा को पहले स्थान पर माना है। कहा गया है कि मनरेगा भारत के पंद्रह करोड़ लोगों को रोजगार देता है, हालाँकि यहाँ भी भ्रष्टाचार की प्रचुरता है। मिड डे मील के लिए भी विश्व बैंक ने भारत की तारीफ़ की और कहा की यह विश्व में चलाई जाने वाली इस तरह की सबसे बड़ा विद्यालयी योजना है, इससे भारत में 10.5 करोड़ बच्चे लाभान्वित होते हैं। सच्चाई यह है कि मनरेगा और मिड डे मील भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। देश में एक तरफ स्मार्ट सिटी और डिजिटल इंडिया की बात हो रही है तो दूसरी ओर करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं। गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण किसी भी देश के विकास के मार्ग की बाधाएं हैं। एनएसएसओ की ओर से जुलाई 2009 से जून 2010 के बीच कराए गए सर्वे के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में एक व्यक्ति का औसत मासिक खर्च 1,054 रुपए था। वहीं शहरी इलाकों में यह आंकड़ा 1,984 रुपए मासिक था। इस हिसाब से शहरवासी औसतन 66 रुपए रोजाना खर्च करने में सक्षम था। वैसे दस फीसद शहरी आबादी भी मात्र बीस रुपए में गुजारा कर रही थी। यह राशि ग्रामीण इलाकों से थोड़ी ही ज्यादा थी। इसी सर्वे की मानें तो महीने के इस खर्च के मामले में बिहार और छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों की की हालत सबसे ज्यादा खराब थी, जहां लोग करीब 780 रुपए महीने पर अपना भरण पोषण कर पाते थे। यह रकम महज छब्बीस रुपए रोजाना बैठती थी। इसके बाद ओडिशा और झारखंड का स्थान था, जहां प्रति व्यक्ति 820 रुपए महीने का खर्च था। खर्च के मामले में केरल अव्वल था। यहाँ के ग्रामीण 1,835 रुपए मासिक खर्च करते थे। शहरी आबादी के मासिक खर्च में महाराष्ट्र सबसे ऊपर था। यहां प्रति व्यक्ति खर्च 2,437 रुपए था। बिहार इस मामले में भी सबसे पिछड़ा हुआ था। यहां की शहरी आबादी मात्र 1,238 रुपए महीने पर पेट पालती थी। यूपीए-दो सरकार के समय 2013 में एनएसएसओ के अनुमान पर ही योजना आयोग ने शहरी इलाकों में 28.65 रुपए और ग्रामीण इलाकों में 22.42 रुपए रोजाना कमाने वालों को गरीबी रेखा से नीचे रखा था। खर्च के इस स्तर को लेकर खूब हंगामा मचाया गया था। लेकिन 2014 में भाजपा नीत राजग के सत्ता में आने के कुछ महीने बाद योजना आयोग ने 32 रुपया ग्रामीण और 47 रुपया शहरी इलाकों में दैनिक खर्च तय किया। यह भी किसी मजाक से कम नहीं था। वर्तमान में दाल, सब्जी, खाद्य तेल और अब चावल आदि के दाम आसमान छू रहे हैं। देश का समावेशी विकास कब होगा और कौन करेगा ? यह तो आनेवाला समय ही बताएगा | अब भी गल्ला व्यापारियों की आशंका है कि आने वाले दिनों में दाल , चावल आदि की क़ीमतें और बढ़ेंगी | अगर ऐसा हुआ और सरकार कारगर क़दम उठाने में नाकाम रही , तो आम जन का जीवन और दूभर हो जाएगा और एक कटोरी दाल के लिए ही नहीं एक मुट्ठी चावल के लिए भी उसे दूसरों के आगे बार - बार हाथ पसारने के लिए बाध्य होना पड़ेगा एवं ख़ाली पड़े जनधन खाते उसकी भूख नहीं मिटा पायेंगे | इन खातों में जो रक़म है , वह भी तो मध्य वर्ग की है , गरीबों का कोई पुरसानेहाल नहीं है !

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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