Nov 3, 2015

खालिद मुजाहिद हत्याकांड की सी आई डी जाँच से क्या इन्साफ मिल पाएगा ?

खालिद मुजाहिद हत्याकांड की सी आई डी जाँच से क्या इन्साफ मिल पाएगा ?

खालिद मुजाहिद की पुलिस हिरासत में हत्या के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने नये सिरे से जाँच का हुक्म दिया है और बाराबंकी के मुख्य दंडाधिकारी को इस मामले के सारे द्स्यावेज़ सीआईडी की अपराध शाखा के सुपुर्द करने को कहा है | राज्य सरकार के अतिरिक्त एडवोकेट जनरल जनाब जफरयाब जीलानी ने कहा था कि राज्य सरकार इसकी एस आई टी या सीबी सी आई डी से करने को तैयार है | अतः अब खालिद मुजाहिद हत्याकांड की मुकम्मल जाँच होगी , जिसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े होंगे , ऐसा पहले से ही माना जा चूका है | सीबीआई पहले ही जाँच के उत्तर प्रदेश सरकार के अनुरोध को ठुकरा चुकी है | सीबीआई के इन्कार की वजह अखिलेश सरकार के संभावित हस्तक्षेप को बताया जाता है | उल्लेखनीय है कि खालिद मुजाहिद हत्याकांड में पूर्व डीजीपी और अन्य अधिकारियों समेत 42 लोगों पर मुकदमा है , जिनमें से कइयों को अखिलेश सरकार बचाना चाहती है | अखिलेश सरकार ने इस हत्याकांड में शामिल जिन अधिकारियों को बचाने की कोशिश की थी , वे सभी हाईकोर्ट के ताज़ा आदेश के बाद एक बार फिर क़ानून की जद में आ गये हैं | ज्ञातव्य है कि विवेचना अधिकारी मोहन वर्मा द्वारा लगाई गई फाइनल रिपोर्ट को बाराबंकी मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी बृजेन्द्र त्रिपाठी द्वारा पिछले वर्ष सात नवंबर14 को खारिज कर दी गई थी और दोबारा जाँच का आदेश दिया था , जिसे राज्य सरकार जानबुझकर लटकाती रही थी | अब हाईकोर्ट के आदेश से निश्चय ही कराने के आदेश से समाजवादी पार्टी सरकार को तगड़ा झटका लगा है। जमाअत इस्लामी हिन्द ,रिहाई मंच सहित कई मुस्लिम एवं अन्य संगठनों ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है। इस मामले खालिद मुजाहिद के चचा ज़हीर आलम फलाही ने 19 मई 2013 को 42 पुलिसवालों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज कराई थी , जिनमें पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह, पूर्व एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल, मनोज झा समेत कई आला पुलिस अधिकारियों समेत आईबी के अधिकारी भी शामिल थे। उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की थी , जिसे राज्य सरकार ने मान भी ली थी | खालिद मुजाहिद हत्या कांड की जांच में वादी जहीर आलम फलाही के अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब और रणधीर सिंह सुमन के अनुसार , खालिद की हत्या जो 18 मई 2013 को हुई थी, लेकिन विवेचना अधिकारी ने पूरे मामले बिना आरोपियों से पूछताछ किए ही 12 जून 2014 को फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी, जिसे खारिज करने की मांग को लेकर जहीर आलम फलाही ने 20 अक्टूबर 2014 को बाराबंकी कोर्ट में मुक़दमा दायर किया था और 42 पुलिसवालों को नामज़द किया था । याचिका में उन्होंने कहा था कि विवेचना अधिकारी द्वारा वादी का 161 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज नहीं किया गया, अभियुक्तगणों का नाम मामले में होने के बावजूद विवेचना अधिकारी द्वारा उन्हें अज्ञात लिखा गया। इसके साथ ही विवेचनाधिकारी मोहन वर्मा [ कोतवाल, बाराबंकी ] ने खालिद के कथित तौर पर गिरफ्तारी के समय उनके अपहरण, अवैध हिरासत के आरोप की जांच नहीं की जिससे बाद में उनकी हत्या का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है। वहीं विसरा की जांच भी उचित तरीके से नहीं की गई क्योंकि प्रभावशाली आरोपियों विक्रम सिंह और बृजलाल के प्रभावक्षेत्र में ही विधि विज्ञान प्रयोगशाला भी आती है। याचिका में जहीर आलम फलाही ने सवाल उठाया था कि चूंकि ऐसा प्रतीत होता है कि विवेचनाधिकारी ने अपने उच्च अधिकारियों को बचाने के लिए साक्ष्य एकत्र करने के बजाय उन्हें नष्ट करने का कार्य किया और हत्या के उद्देश्य के संबन्ध में कोई जांच करने की कोशिश ही नहीं की, इसलिए पूरे मामले की फिर से जांच कराई जाए। तत्कालीन मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी बृजेन्द्र त्रिपाठी ने वादी से सहमत होते हुए कहा कि सभी साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि सही ढंग से मामले की विवेचना नहीं की गई है। सही बयान भी अंकित नहीं किए गए हैं। जिसके समर्थन में वादी ने शपथ पत्र भी लगाया है। दण्डाधिकारी ने आगे कहा था कि पत्रावली के परिसीलन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि प्रकरण में विवेचक का आचरण जल्दबाजी का प्रतीत हो रहा है। इसलिए उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मामले की अग्रिम विवेचना कराया जाना न्यायोचित है। 
इस मामले में दण्डाधिकारी ने थाना प्रभारी , कोतवाली बाराबंकी को निर्देशित किया था कि इस पूरे मामले की विवेचना के प्रति सभी तथ्य संज्ञान में लेकर पुलिस अधीक्षक बाराबंकी के निर्देशानुसार इसकी जांच सुनिश्चित करें तथा दो महीने के अंदर परिणाम से अवगत कराएं। इस मामले में भी लीपापोती को देखते हुए हाईकोर्ट का द्र्र्वाज़ा खटखटाया गया था | साथ ही बीस लाख रूपये मुआवज़ा देने की मांग की गई थी | कोर्ट ने गत 2 नवम्बर 15 को इस हत्याकांड की नये सिरे से सीबी - सीआईडी जाँच का आदेश दिया | जस्टिस अजय लांबा और जस्टिस बृजेश कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने यह फ़ैसला सुनाया |उल्लेखनीय है कि सपा के चुनाव घोषणापत्र और सपा नेताओं के बयानों में बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों की रिहाई के लाख दावे किये गये हों , पर अमलन कुछ नहीं हो सका | पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने ज़बानी तौर पर चार सौ बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों को रिहाई की घोषणा की थी , किन्तु अमलन एक की भी रिहाई नहीं हो पाई है ! . दरअसल बात इच्छाशक्ति की है | अखिलेश सरकार चाहती तो निमेष आयोग की रिपोर्ट का हवाला देकर तारिक और खालिद को रिपोर्ट के आने फ़ौरन बाद रिहा कर सकती थी , लेकिन उसने ऐसा न करके रिपोर्ट को ही दबा दिया ! मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पन्द्रह मार्च 2012 को पदभार ग्रहण करने के बाद ही तारिक और खालिद के मामले की फ़ाइलें मंगाई थीं और रिहाई के सिलसिले में गौर किया था | मगर भाजपा जैसी कुछ पार्टियों द्वारा विरोध जताने के बाद रिहाई की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाई , यहाँ तक कि निमेष आयोग की रिपोर्ट को ही दबा दिया गया ! निमेष जाँच आयोग पुलिस और सरकार दोनों की पक्षपाती भूमिका को उजागर करने में सक्षम है | यह दोनों को कटघरे में खड़ा करती है | आरोपियों के मोबाइल नंबरों की जांच में लापरवाहियों और दोनों आरोपियों के अपहरण की सूचना परिजनों और स्थानीय नेताओं द्वारा दर्ज कराये जाने के बावजूद जांच का न होना भी आंतकवाद के कथित आरोपियों को फंसाये जाने की ओर इशारा करता है | जांच आयोग ने गिरफ्तारी के अनियमितता और झोल को कुल 14 बिंदुओं में समेटा | रिपोर्ट के 14वें हिस्से में कहा गया कि ‘कथित आरोपी तारिक कासिमी और खालिद मुजाहिद की 22 दिसंबर 2007 को सुबह 6.20 बजे आपत्तिजनक वस्तुओं के साथ गिरफ्तारी संदेहजनक प्रतीत होती है और अभियोजन के गवाहों पर पूर्णरूप से विश्वास नहीं किया जा सकता | ’ जांच आयोग ने अपने 12 सूत्रीय सुझावों में कई महत्वपूर्ण सुझाव आतंकवाद मामलों में होने वाली गिरफ्तारियों को लेकर दिये थे , जिनमें सुझाव संख्या 8 और 11 बेहद महत्वपूर्ण हैं | सुझाव आठ में कहा गया है कि ‘ऐसे मुकदमों के निर्धारण की सीमा अधिकतम 2 साल होनी चाहिए | केस समय पर निस्तारण न होने पर समीक्षा होनी चाहिए और संबंधित व्यक्ति के विरूद्ध कार्रवाई होनी चाहिए | ’ वहीं सुझाव संख्या 11 में ‘झूठे मामलों में फंसाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई ’ और सुझाव 9 में गिरफ्तार बेक़सूर लोगों को मुआवज़ा देने की बात कही गयी |.हाईकोर्ट के ताज़ा जाँच - आदेश के बाद यह आशा की जानी चाहिए कि अस्ली मुजरिम पकड़े जाएंगे और उन्हें सज़ा मिलेगी एवं सरकार प्रायोजित आतंकवाद पर रोक लगेगी |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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