Nov 28, 2015

इन्हें किसने दिए पैसे ?

इन्हें किसने दिए पैसे ? 


देश में जानबूझकर सुनियोजित तरीक़े से फैलाई जा रही वैमनस्यता और असहिष्णुता के विरोध में लेखकों, साहित्यकारों, इतिहासकारों, कलाकारों व वैज्ञानिकों के बाद अब आईआईटी कानपुर के 100 से अधिक पूर्व व वर्तमान विद्यार्थियों, कर्मचारी और शिक्षक समुदाय ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को गत 16 नवंबर को पत्र लिखकर नफ़रत और असहिष्णुता फैलाने वाली शक्तियों पर लगाम लगाने की माँग की है। आईआईटी ,कानपुर एल्युमनी के सदस्य डॉ.विजयानंनद शर्मा ने राष्ट्रपति को 105 हस्ताक्षरों वाला ज्ञापन भेजा है , जिस पर सभी के मोबाइल नंबर दर्ज हैं | इस ज्ञापन में आईआईटी कानपुर से सम्बंधित पूर्व और वर्तमान विद्यार्थी, कर्मचारी और शिक्षक समुदाय की ओर से भारत में व्याप्त असहिष्णुता के विरोध में राष्ट्रपति से अपील की गयी है कि वे प्रधानमंत्री और भारत सरकार को समुचित कदम उठवा कर असहिष्णुता फैलानेवाली शक्तियों को नियंत्रित करें , जो कि उनकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेवारी भी है | ज्ञापन में देश में बढ़ती असहिष्णुता की मिसालों में नरेंद्र दाभोलकर , गोविन्द पनसरे , मल्लेशप्पा कलबुर्गी और दादरी के मुहम्मद अखलाक़ की नृशंस हत्याओं का उल्लेख किया गया है | ये वारदातें नागरिकों के मौलिक अधिकारों को चैलेंज करती हैं |
यह कितनी हास्यस्पद बात है कि इस गंभीर परिस्थिति में कुछ को मज़ाक़ सूझ रहा है |
मोदी सरकार में विदेश राज्यमंत्री जनरल वी. के. सिंह ने इन्टॉलरेंस (असहिष्णुता) के मुद्दे पर जो बयान दिया है , वह कुछ ऐसा ही है । उन्होंने कहा है कि ''इन्टॉलरेंस पर बहस गैरजरूरी है। खूब सारे पैसे देकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाया गया। यह सिर्फ कुछ राजनीतिक पार्टियों के जरिए बिहार इलेक्शन में वोट पाने के लिए उठाया एक मुद्दा था।'' इस दौरान उन्होंने एक बार फिर भारतीय मीडिया के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर इस विकट स्थिति से राष्ट्रपति तक हैरान - परेशान हैं | देश में असहिष्णुता की बढ़ती घटनाओं पर सरकार को तीन बार नसीहत दे चुके राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अब पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों और बुद्धिजीवियों को नसीहत दी है।
पुरस्कार वापसी को गलत बताते हुए राष्ट्रपति ने कहा है कि बुद्धिजीवियों को भावनाओं में बहने के बदले अपने मतभेद बहस और चर्चा के जरिये जाहिर करना चाहिए। राष्ट्रपति ने बुद्धिजीवियों को सम्मान का कद्र करने की नसीहत देते हुए यह भी कहा कि हमें भारत की विचारधारा और संविधान में निहित मूल्यों और सिद्धांतों पर भरोसा रखना चाहिए। राष्ट्रपति महोदय की यह नसीहत एक दृष्टि से उचित है , लेकिन जब सिर से पानी गुज़र जाए और अस्तित्व का संकट पैदा हो जाए तो विरोध का यह तरीक़ा सवालिया निशान के दायरे में नहीं रह जाता | अतः इस परिप्रेक्ष्य में सरकार को ही नसीहत करना चाहिए कि वह अपनी पदेन ज़िम्मेदारी का अनुपालन करते हुए देश के विषाक्त माहौल को ठीक करे |


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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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