Oct 24, 2015

पीड़ितों को जल्द से जल्द इन्साफ मिले

नफ़रत की चौतरफ़ा आग में क्यों झुलस रहा है हमारा प्यारा देश ?

हरियाणा के फरीदाबाद जिले के सुनपेड़ गांव में अगड़ी राजपूत जाति के दबंगों द्वारा एक दलित परिवार को पेट्रोल डालकर जिंदा जलाने की दिल दहलाने वाली गत 20 अक्तूबर की स्तब्धकारी घटना को लेकर विपक्ष तथा सहयोगी लोजपा के निशाने पर आने के बाद राज्य सरकार ने इसकी सी.बी.आई. जांच कराने की सिफारिश कर दी। इस घटना में दो मासूम बच्चों की बुरी तरह जल जाने से मौत हो गई। 28 वर्षीया माँ रेखा 70 प्रतिशत जली अवस्था में अस्पताल में भर्ती है | पिता जितेन्द्र भी घायल है , जिसका भी उपचार किया जा रहा है | सुनपेड में गांव के लोगों ने ढाई साल के वैभव और 11 महीने की दिव्या के शवों को लेकर प्रदर्शन किया। बाद में प्रशासन ने उन्हें सड़क से जाम खत्म करने और शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए मनाया। केन्द्रीय मंत्री एवं स्थानीय सांसद कृष्णपाल गुर्जर ने फरीदाबाद में घोषणा की कि प्रदेश सरकार ने पीड़ित पक्ष की मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग को मंजूर कर लिया है। उनकी इस घोषणा के बाद पीडित पक्ष बच्चों के अंतिम संस्कार के लिए राजी हो गया | भाजपा ने इसे पैसे के लेन - देन की बात कहकर मामले को हल्का करने की कोशिश की है | साथ ही राज्य सरकार ने दस लाख रूपये का मुआवजा देने का ऐलान किया है
पुलिस ने इस घटना के संबंध में 11 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर इनमें से सात लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस के अनुसार घटना फरीदाबाद के सुनपेड़ गांव में 20 अक्तूबर को तड़के दो बजे हुई। हमलावरों द्वारा घर पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगाए जाने के बाद ढाई साल के वैभव और उसकी 11 महीने की बहन दिव्या की घटनास्थल पर ही मौत हो गयी। उनकी मां रेखा 70 फीसदी जल गयी जिसे इलाज के लिए दिल्ली ले जाया गया है |जबकि उनके पिता जितेन्द्र भी परिवार को बचाने के कोशिश में झुलस गए। जितेन्द्र सिंह ने आरोप लगाया कि हमलावर राजपूत जाति के थे और अक्तूबर में उनके साथ उसका झगड़ा हुआ था जिसके बाद एक मामला दर्ज कराया गया था। रोते हुए जितेन्द्र ने बताया, ‘‘जिस समय उन्होंने खिड़की में से पेट्रोल डाला हम सो रहे थे। मुझे पेट्रोल की बदबू आयी और मैंने अपनी पत्नी को जगाने का प्रयास किया , लेकिन तब तक आग भड़क गयी। मेरे बच्चे आग में जल गए।’’ अभी कुछ ही दिन पहले दादरी में मुहम्मद अख्लाक गोमांस रखने की अफ़वाह फैलाकर पीट - पीटकर हत्या किए जाने की घटना के बाद हरियाणा में दलित परिवार पर हमले की घटना के बाद राजनीतिक दलों के बीच पहले से चल रही बयानबाजी तेज़ हो गई है , जबकि इन सब घटनाओं के मूल में राजनीतिक फ़ायदा और उकसावा ही अधिक होता है । इसलिए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि धर्म या संप्रदाय के नाम पर राजनीति अस्वीकार्य है और किसी के साथ आस्था, जाति या पंथ के नाम पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हाल में दादरी, फरीदाबाद और पंजाब की घटनाओं से पैदा हुए तनाव के बीच वह दशहरा के अवसर पर यह अपील कर रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि ‘‘प्रधानमंत्री, राज्य के मुख्यमंत्री और पूरी भाजपा और संघ का एक ही रुख है। उनका रुख है कि यदि कोई कमजोर है तो उसे दबाया जा सकता है। आपने जो देखा है वह इसी रुख का परिणाम है।’’ उन्होंने सुनपेड़ गाँव में ग्रामीणों और पीड़ितों के परिवार से मुलाकात की। राहुल गाँधी ने कहा, ‘‘हरियाणा में गरीबों के लिए कोई सरकार नहीं है और गरीब लोगों को यहां निशाना बनाया जा रहा है जो पूरी तरह से गलत है। मैंने पीड़ितों के परिवार को भरोसा दिलाया है कि सरकार पर दबाव बनाने के लिये वे जो कुछ भी मुझसे चाहते हैं, मैं उनके लिए वह करूंगा।’’ एक संवाददाता के इस सवाल पर कि क्या वह इस मामले पर राजनीति कर रहे हैं, राहुल ने आक्रोशित स्वर में कहा, ‘‘किसी के यहां आने पर जब कोई ऐसा कहता है, तो यह अपमानजनक है। यह मेरे लिए अपमानजनक नहीं है। यह इन लोगों के लिए अपमानजनक है। फोटो खिंचवाने का मौका क्या होता है? आपका क्या मतलब है?.. लोग मर रहे हैं। मैं ऐसे स्थानों पर आता रहूंगा। 
इस हत्याकांड पर केंद्रीय मंत्री वी के सिंह का बेतुका बयान सामने आया है। वी के सिंह ने खट्टर सरकार के समर्थन में बयान देते हुए कहा है कि क्या कोई कुत्ते को भी पत्थर मार दे तो सरकार जिम्मेदार होगी। यहां यह उल्लेखनीय है कि भाजपा के सहयोगी और केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने दलित परिवार के दो बच्चों की मौत के लिए हरियाणा सरकार को जिम्मेदार ठहराए जाने की मांग की। बिहार के महागठबंधन के नेताओं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद ने इस हमले को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधा और उनसे पूछा कि वे लोग कहां हैं जो यह दावा किया करते थे कि उनकी पार्टी को सत्ता मिल गई तो सब कुछ ठीक हो जाएगा | नीतीश और लालू की आलोचना का जवाब देते हुए भाजपा नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने दोनो नेताओं पर घटना को लेकर नकली आंसू बहाने का आरोप लगाया, जिसके पीछे उनकी नजर बिहार विधानसभा चुनाव में दलितों के बड़े वोट बैंक पर है। 
ध्यान रहे कि बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान का कुछ दौर और बाक़ी है। लालू प्रसाद यादव ने एक ट्वीट में कहा, ‘‘मैंने मांग की थी कि मोदी और गुरू गोलवरकर की दलित विरोधी किताबों को जला दिया जाए, लेकिन उनके शासन में तो दलितों को ही जलाया जा रहा है।’’ उन्होंने एक अन्य ट्वीट में कहा, ‘‘भाजपा और आरएसएस शासन में आरक्षण खत्म करने के साथ ही आरक्षण का लाभ लेने वालों को आग के हवाले किया जा रहा है।’’ नीतीश ने भी इस घटना पर राजग सरकार को आड़े हाथों लिया। नीतीश ने ट्वीट किया, ‘‘इस वीभत्स घटना से स्तब्ध हूं। अब कहां है वो लोग जिन्होंने दावा किया था हमारी सरकार बना दो सब ठीक हो जाएगा |'' वास्तव में यह दिल हिला देने वाली यह एक ऐसी घटना है, जो हमारे सामाजिक ढांचे , प्रशासनिक व्यवस्था और क़ानून को लागू करनेवाली एजेंसियों से भी ताल्लुक़ रखती है । पुलिस ने इस मामले को किस अन्दाज़ और मानसिकता के साथ लिया , उस पर भी एक निगाह डाल लेने की ज़रूरत है | एक पुलिस अफ़सर ने अपने प्राथमिक बयान में कहा कि पीड़ितों के घर पर हमले का कोई निशान नहीं मिला, आग केवल उस बिस्तर पर लगी थी जिस पर पीड़ित सोए हुए थे। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि बिस्तर में आग कैसे लगी। हमले का कोई निशान न देखने की बात कहने के पीछे क्या इरादा हो सकता है इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। बच्चों के पिता जितेन्द्र का कहना है कि पेट्रोल डाल कर आग लगाई गई। कुछ दिन पहले आपसी झगड़े के बाद आरोपियों से उन्हें लगातार धमकियां मिल रही थीं , जिसकी सूचना जितेन्द्र ने पुलिस को दे रखी थी | इसके बावजूद पुलिस का यह बयान क्या पुलिस की अन्यायी मानसिकता को नहीं दर्शाता ? यह सच है कि दबंग लोग ही राजनीतिक वर्चस्व रखते हैं | पुलिसवाले अमलन इन्हीं के दबाव में काम करते हैं , जिसका परिणाम यह होता है कि दलितों के खिलाफ संगीन अपराध और जुल्म के बहुत-से मामलों में पूरी जांच नहीं होती। खानापूर्ति अधिक होती है | पुलिस द्वारा सबूत मिटाने की हर कोशिश होती है |आरोपी अक्सर रसूख वाले या दबंग होते हैं। इसी कारण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन्हें बचाने का दबाव पुलिस पर रहता है। अतः इस सिलसिले के आंकड़े बहुत निराशाजनक हैं | दलितों और आदिवासियों के खिलाफ गंभीर से गंभीर अपराध के मामलों में सजा मिलने की दर बहुत कम रही है। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून, 1989 में दंड प्रक्रिया संहिता के मुकाबले ज्यादा सजा के प्रावधान किए गए थे । ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित की गर्इं। लेकिन हुआ कुछ संतोषजनक नहीं ! देश के अल्पसंख्यक समाज भी जुल्म - ज़्यादती के शिकार होते रहते हैं और अक्सर न्याय से वंचित रहते हैं | दलितों का भी यही हाल है | अतः सुनपेड़ कांड का भी पुराने हत्याकांडों की तरह हश्र न होने पाए और इस बात की पूरी कोशिश होनी चाहिए कि पीड़ितों को जल्द से जल्द एक समय - सीमा के भीतर न्याय मिले |


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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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