Oct 20, 2015

पवार ने सच कहा

पवार ने सच कहा

गोमांस रखने की अफ़वाह पर 50 वर्षीय मुहम्मद अख्लाक की दादरी में पीट-पीट कर हत्या करने की घटना की पृष्ठभूमि में राकांपा प्रमुख शरद पवार ने गत 18 अक्तूबर को कहा कि हिंदुत्व के प्रखर नेता एवं विचारक विनायक दामोदर सावरकर गाय को पवित्र पशु नहीं मानते थे। उन्होंने कहा, ‘‘ हिंदुत्व पर सावरकर के विचारों को कुछ ऐसे लोगों ने अपनी सुविधा के अनुसार अपना लिया है जिन्होंने अपने सोचने के दायरे को संकुचित कर लिया है। सावरकर ने कहा था कि गाय उपयोगी पशु है, उसका उपयोग ना रहने पर उसे मारा और उसका मांस खाया जा सकता है। उनके इस विचार का स्वागत नहीं किया गया।’’ डॉक्टर दीपक कोर्डे की पुस्तक ‘‘जातिवादी राजकर्नाचा अनिवार्यता’’ के विमोचन के अवसर पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री शरद पवार ने यह बात कही। पवार ने दादरी घटना, जहां गोमांस खाने की अफवाह के कारण एक व्यक्ति की भीड़ ने हत्या कर दी थी, और इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र ' पांचजन्य ' में प्रकाशित लेख की आलोचना की। 
शरद पवार ने कहा, ‘‘यह बहुत चिंताजनक है कि एक ऐसा तबका उभर आया है जो लोगों के खाने की पसंद तय करता है। यह तबका उनके आदेश को न मानने वालों को सजा देने का अधिकार भी अपने पास रखता है।’’ उन्होंने कहा कि चरमपंथी संगठनों द्वारा युवाओं को दिग्भ्रमित किया जाना बंद होना चाहिए। सावरकर ने गाय को अति सम्मान और श्रद्धा का पात्र बनाने का विरोध किया था। उनका कहना था कि गाय एक पशु है, हमें उसके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और हिन्दुओं को उसकी रक्षा करनी चाहिए। सावरकर के लिए गाय किसी भी अन्य पशु के समान थी.| उनकी दृष्टि में अन्य पशुओं के मुक़ाबले में न गाय का महत्व कम था , न ज्यादा।
वे लिखते हैं 'गाय और भैंस जैसे पशु और पीपल व बरगद जैसे वृक्ष, मानव के लिए उपयोगी हैं इसलिए हम उन्हें पसंद करते हैं और यहां तक कि हम उन्हें पूजा करने के काबिल मानते हैं और उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है , परंतु केवल इसी अर्थ में। क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि अगर किन्हीं परिस्थितियों में वह जानवर या वृक्ष मानवता के लिए समस्या का स्रोत बन जाए तब वह संरक्षण के काबिल नहीं रहेगा और उसे नष्ट करना,मानव व राष्ट्र हित में होगा और तब वह मानवीय व राष्ट्र धर्म बन जाएगा ' [ ' समाज चित्र, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 678 ] । सावरकर आगे लिखते हैं 'कोई भी खाद्य पदार्थ इसलिए खाने योग्य होता है क्योंकि वह हमारे लिए लाभदायक होता है , परंतु किसी खाद्य पदार्थ को धर्म से जोड़ना, उसे ईश्वरीय दर्जा देना है। इस तरह की अंधविश्वासी मानसिकता से देश की बौद्धिकता नष्ट होती है' [ 1935, सावरकरांच्या गोष्ठी, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 559 ] 'जब गाय से मानवीय हितों की पूर्ति न होती हो या उससे मानवता शर्मसार होती हो,तब अतिवादी गो संरक्षण को खारिज कर दिया जाना चाहिए' [ समग्र सावरकर वांग्मय,खण्ड 3, पृष्ठ 341 ] खिलाफत आंदोलन के दौरान जब मुसलमानों ने गोमांस भक्षण बंद कर दिया और गोवध का विरोध करने लगे तब सावरकर और हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए गाय वह मुद्दा न रही जिसका इस्तेमाल हिन्दुओं को एक करने और मुसलमानों को 'दूसरा' या 'अलग' बताने के लिए किया जा सके। परंतु सावरकर हिन्दुओं द्वारा गाय की पूजा करने का विरोध एक अन्य कारण से भी कर रहे थे। सावरकर लिखते हैं 'जिस वस्तु की हम पूजा करें, वह हमसे बेहतर व महान होनी चाहिए। उसी तरह राष्ट्र का प्रतीक, राष्ट्र की वीरता, मेधा और महत्वाकांक्षा को जागृत करने वाला होना चाहिए और उसमें देश के निवासियों को महामानव बनाने की क्षमता होनी चाहिए। परंतु गाय, जिसका मनमाना शोषण होता है और जिसे लोग जब चाहे मारकर खा लेते हैं, वह तो हमारी वर्तमान कमजोर स्थिति का एकदम उपयुक्त प्रतीक है। पर कम से कम कल के हिन्दू राष्ट्र के निवासियों का तो ऐसा शर्मनाक प्रतीक नहीं होना चाहिए' [ समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 3 पृष्ठ 237 ]  
सावरकर जी लिखते हैं , 'हिन्दुत्व का प्रतीक गाय नहीं बल्कि नृसिंह है। ईश्वर के गुण उसके आराधक में आ जाते हैं। गाय को ईश्वरीय मानकर उसकी पूजा करने से संपूर्ण हिन्दू राष्ट्र गाय जैसा दब्बू बन जाएगाए वह घास खाने लगेगा। अगर हमें अपने राष्ट्र से किसी पशु को जोड़ना ही है तो वह पशु सिंह होना चाहिए। एक लंबी छलांग लगाकर सिंह अपने पैने पंजों से जंगली हाथियों के सिर को चीर डालता है। हमें ऐसे नृसिंह की पूजा करनी चाहिए। नृसिंह के पैने पंजे न कि गाय के खुर, हिन्दुत्व की निशानी हैं ' [ सावरकर वांग्मय खण्ड 3,पृष्ठ 167 ]
भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माताओं में से एक डॉ . अंबेडकर अच्छे अध्येता और शोधकर्ता भी थे | उन्होंने गोमांस खाने के संबंध में एक निबंध लिखा था, 'क्या हिंदुओं ने कभी गोमांस नहीं खाया?' यह निबंध उनकी किताब, 'अछूतः कौन थे और वे अछूत क्यों बने?' में है | अंबेडकर ने प्राचीन काल में हिंदुओं के गोमांस खाने की बात को साबित करने के लिए हिन्दू और बौद्ध धर्मग्रंथों का सहारा लिया | वे लिखते हैं , "गाय को पवित्र माने जाने से पहले गाय को मारा जाता था | उन्होंने हिन्दू धर्मशास्त्रों के विख्यात विद्वान पी.वी. काणे का हवाला दिया | काणे ने लिखा है, ' ऐसा नहीं है कि वैदिक काल में गाय पवित्र नहीं थी, लेकिन उसकी पवित्रता के कारण ही वाजसनेई संहिता में कहा गया कि गोमांस को खाया जाना चाहिए " (मराठी में धर्म शास्त्र विचार, पृ .180) |
डॉ .अंबेडकर ने लिखा है, " ऋग्वेद काल के आर्य खाने के लिए गाय को मारा करते थे, जो खुद ऋगवेद से ही स्पष्ट है |" ऋग्वेद में (10. 86.14) में इंद्र कहते हैं, "उन्होंने एक बार 5 से ज़्यादा बैल पकाए ' | ऋग्वेद (10. 91.14) कहता है कि अग्नि के लिए घोड़े, बैल, सांड, बांझ गायों और भेड़ों की बलि दी गई | ऋग्वेद (10. 72.6) से ऐसा लगता है कि गाय को तलवार या कुल्हाड़ी से मारा जाता था | " डॉ .अंबेडकर ने बौद्ध ग्रंथ संयुक्त निकाय(111. .1-9) के उस अंश का हवाला भी दिया है जिसमें कौशल के राजा पसेंडी के यज्ञ का विवरण मिलता है संयुक्त निकाय में लिखा है, "पांच सौ सांड, पांच सौ बछड़े और कई बछियों, बकरियों और भेड़ों को बलि के लिए खंभे की ओर ले जाया गया |" लेख के अंत में  डॉ . अंबेडकर लिखते हैं, "इस सुबूत के साथ कोई संदेह नहीं कर सकता कि एक समय ऐसा था जब हिंदू, जिनमें ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मण दोनों थे, न सिर्फ़ मांस बल्कि गोमांस भी खाते थे |"


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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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