Sep 17, 2015

राजनीति का जातीय आधार कितना नुकसानदेह ?

राजनीति का जातीय आधार कितना नुकसानदेह ?

देश की आज़ादी के बाद से ही राजनीति को जिस जातीय आधार पर चलाना शुरू किया गया था , आज उसका उत्कर्ष काल चल रहा है और राजनीतिक मान्यताओं का पतन हो रहा है | यह सच है कि जातीय आरक्षण ने इसे ठोस आधार प्रदान किया है | दूसरी ओर कुछ संसदीय सीटों के जातीय आधार पर संवैधानिक आरक्षण ने जातीय राजनीति को बढ़ावा दिया है | नतीजतन आज ऐसी ख़तरनाक स्थिति बन गई है कि संसद , विधानसभाओं से लेकर पंचायतों के सदस्यों तक के चुनाव में जातीयता ही काम करती है , योग्यता का महत्व नहीं रह जाता ! साथ ही आपराधिक प्रवृत्ति मानो योग्यता को बढ़ा देती है ! यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र के लिए कितनी खतरनाक और नुकसानदेह है , बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है | हाल में बिहार विधानसभा के लिए सीटों पर उम्मीदवारों की तैनाती में जातीय आधारों ने ही सक्रिय भूमिका निभाई | यह बात और है कि बिहार के राजनेताओं की पुरज़ोर मांग के बावजूद केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना के आंकड़ों को जारी नहीं किया | ऐसा इसलिए हुआ कि ये आंकड़े बिहार चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बन सकते थे और गुजरात के पटेल आन्दोलन की भांति भाजपा के लिए आफ़त की पुड़िया बन सकते थे | फिर भी जातिगत आधार पर चलाई जा राजनीति के ज़िम्मेदार राजनेता ही हैं , जो जातीय मुद्दों को हवा देते और आरक्षण की बात करते नहीं थकते , जबकि यह एक खुली हुई सच्चाई है कि सभी जातियों में गरीब लोग मौजूद हैं | वे भी आरक्षण के उतने ही हक़दार होने चाहिए , जितने अन्य हैं | मगर कुछ पार्टियों के ही नेता इसे तथ्य को स्वीकार करते हैं , वह भी दबी ज़ुबान से ! उन्हें डर है कि इस मामले में जहाँ उनकी ज़ुबान कुछ साफ़ हुई , उनकी राजनीति बंद हो सकती है और वे हाशिए पर जा सकते हैं | इसके बावजूद आरक्षण की बात चलाये रखना कई बड़े राजनेताओं का शगल बन गया है | मिसाल के तौर पर हाल में राजद प्रमुख लालूप्रसाद यादव ने पटना में कायस्थों को आरक्षण दिलाने की बात कही | इसे अच्छा संकेत कहेंगे कि उनकी इस बात का कायस्थ समाज ने स्वागत नहीं किया | इसी प्रकार मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की जगह सभी वर्ग और जाति के आर्थिक रूप से विपन्न लोगों को आरक्षण देने की मांग अब उठ रही है और कुछ लोग इसे आन्दोलन की शक्ल देने की कोशिश कर रहे हैं |

कुछ लोगों द्वारा मौजूदा आरक्षण को ख़ारिज करने के तर्क बार - बार सामने आ रहे हैं | कहा जा रहा है कि 65 साल से आरक्षण पा रही जातियाँ पहले के मुक़ाबले काफ़ी सक्षम और सशक्त हो चुकी हैं | ओबीसी भी पच्चीस साल तक आरक्षण पा चुके? यह मांग ध्यान देने योग्य है कि आरक्षण अगर अब हो तो केवल आर्थिक आधार पर ही हो | जातीय आरक्षण तो बिलकुल होना ही नहीं चाहिए | जातिगत आरक्षण का तो वोट बैंकके लिए बहुत दुरुपयोग हुआ | इससे जातियों में विद्वेष और दूरियाँ ही बढ़ी हैं | समाज में खाइयाँ और चौड़ी हो गयी हैं , अतः इसे बन्द तत्काल बंद करना चाहिए | राजनीति के जातीय चेहरे ने भारतीय जनमानस को बहुत उद्वेलित और परेशान किया है | योग्यता और प्रतिभा पर काफ़ी आघात पहुंचाया है | उत्तर प्रदेश से अक्सर जातीय पक्षपात की खबरे आती रहती हैं | वहां पी सी एस परीक्षा में जातीयता का खुलासा हो चूका है | पीसीएस 2011 परीक्षा का इंटरव्यू अखिलेश यादव सरकार के समय पिछले साल हुआ था |चौंकाने वाली बात यह है कि पिछड़े वर्ग में 86 उम्मीदवारों को चुना गया, जिसमें से 50 यादव थे | एकाध उम्मीदवारों को छोड़कर यादव जाति में सभी उम्मीदवारों को 135 से 140 के बीच इंटरव्यू में नंबर मिले | खास बात यह रही कि यादव जाति के जिन उम्मीदवारों के नंबर मेंस में दूसरे उम्मीदवारों से कम रहे, वे भी इंटरव्यू में सबसे ज्यादा नंबर पा गए | इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष मुश्ताक अली साहब लोक सेवा आयोग के इम्तिहानों में उम्मीदवारों का इंटरव्यू लेते रहे हैं | मुश्ताक साहब ने खुलासा किया कि भले ही सरकार इंटरव्यू बोर्ड को जितना भी गोपनीय रखे, फिर भी कहीं ना कहीं सिफारिश अपना काम कर जाती है | इसी प्रदेश में अब अधिकांश पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति जातीय आधार पर करने के आरोप राज्य सरकार पर लगे हैं | ज़ाहिर है , जब स्थिति इतनी गंभीर हो जनता का समावेशी विकास कैसे हो सकता है | इससे तो पारस्परिक वैमनस्यता ही बढ़ेगी , जो विकास में बड़ी बाधक होगी |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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