Sep 10, 2015

समावेशी विकास के लिए सरकार ठोस क़दम उठाए

निजी क्षेत्र में भी मुसलमानों को समुचित भागीदारी नहीं

देश के निजी क्षेत्र में भी मुसलमानों की सहभागिता की स्थिति अच्छी नहीं है | उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने पिछले दिनों देश के मुसलमानों की बुरी स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हुए सरकार और समाज के विभिन्न क्षेत्रों से उनकी हालत सुधारने के लिए दखल देने की अपील की थी। उन्होंने मोदी सरकार से मुस्लिम समाज से भेदभाव की गलती सुधारने की मांग की थी और कहा था कि देश के मुसलमानों को अपनी पहचान, सुरक्षा, शिक्षा एवं सशक्तीकरण बरकरार रखने में समस्या आ रही है। मुसलमानों को आ रही समस्याओं पर सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए और इसे दूर करने के लिए सकारात्मक कदम उठाने चाहिए। उपराष्ट्रपति ने मोदी सरकार के सबका साथ सबका विकास की तर्ज पर मुस्लिमों की पहचान एवं सुरक्षा को मजबूत करने की मांग की थी | उपराष्ट्रपति के इस बयान की सांप्रदायिक सोच वालों ने अपने अंदाज़ में आलोचना की , लेकिन सच्चाई पर पर्दा नहीं डाल सके | मोदी सरकार ने 'सबका साथ - सबका विकास 'का नारा दिया था , लेकिन वह इस पर अपने अब तक के डेढ़ वर्ष के शासनकाल में अमल नहीं कर सकी | विश्‍व आर्थिक मंच (WEF) ने भारत के 'विकास रथ' की चाल को सुस्‍त माना है। उसने समावेशी विकास अर्थात सभी नागरिकों के विकास के मामले में भारत को फिसड्डी घोषित किया है | मंच ने भारत को समावेशी वृद्धि और विकास के लिहाज से ग्‍लोबल रैंकिंग में निचले पायदान पर रखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के समावेशी विकास में वृद्धि की सुस्‍त चाल को देखते हुए इस निचले पायदान पर रखा गया है। जबकि कारोबारी और राजनीतिक आचार-नीति के लिहाज से इंटरनेशनल लेवल पर काफी बेहतर स्‍थिति में है। यहां प्रतिव्‍यक्‍ित आय के लिहाज से विभिन्‍न देशों के समूहों में अपनी तरह की पहली वैश्‍विक रैंकिंग में विश्‍व आर्थिक मंच ने पाया कि ज्‍यादातर देशों में आय की असमानता घटाने के बड़े मौके खो रहे हैं और इसमें भारत भी शामिल है। पिछले दो वर्षों में किए गए अध्‍ययन में ऐसे विभिन्‍न तरीकों की पहचान करने की कोशिश की गई है, जिससे नीति-निर्माता आर्थिक वृद्धि तथा समानता दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ा सकते हैं। यही नहीं भारत को कम और मध्‍यम आय वाले 38 देशों में निचले स्‍थान पर रखा है। खास तौर पर वित्त स्थानांतरण के मामले में भारत का प्रदर्शन काफी निराशाजनक है। इस सूची में शामिल 38 देशों में भारत का 37वां स्थान है |
यह एक खुली हुई सच्चाई है कि देश का समावेशी विकास ख़ासकर पक्षपाती मानसिकता के चलते संभव नही हो पा रहा है | सरकारी क्षेत्र में दशकों से असन्तोषजनक स्थिति है | निजी क्षेत्र जिसके बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि वहां मुसलमानों को समाविष्ट किया जाता है , में भी मुसलमानों की अच्छी भागीदारी नहीं है | हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार , निजी क्षेत्र की अच्छी कंपनियों में मुस्लिम कर्मचारियों का डाटा उपलब्ध नहीं है। वहीं इन कंपनियों में डायरेक्टर और सीनियर एग्जिक्यूटिव्स स्तर पर मुसलमानों की संख्या सिर्फ 2.67 पर्सेंट है। यह डाटा बीएसई 500 में शामिल कंपनियों का है। इनमें डायरेक्टर और सीनियर एग्जिक्यूटिव्स स्तर के कुल 2,324 लोग हैं, जिनमें से सिर्फ 62 मुसलमान हैं। 2,324 टॉप एग्जिक्यूटिव्स को जो सैलरी मिलती है, उसका 3.14 फ़ीसद हिस्सा मुसलमान एग्जिक्यूटिव्स के हाथ लगता है। वहीं, देश की कुल आबादी में मुसलमानों की संख्या 14.2 फ़ीसद है। शेयर बाजार के कुल बाज़ार पूंजी में 93 फ़ीसद बीएसई 500 इंडेक्स में शामिल कंपनियों का है। वहीं, बीएसई 100 इंडेक्स में शामिल कंपनियों के सीनियर मैनेजमेंट में 4.60 फ़ीसद मुसलमान हैं। इनमें डायरेक्टर्स और सीनियर एग्जिक्यूटिव्स लेवल पर कुल 587 लोग हैं, जिनमें से 27 मुसलमान हैं। हालांकि, कुल सैलरी पैकेज में से 2.56 फीसद ही इन लोगों को मिलता है। इसका मतलब यह है कि कॉर्पोरेट इंडिया के राडार पर मुसलमान नहीं हैं। हालांकि, पिछले एक दशक में प्राइवेट सेक्टर ने दलितों को ज्यादा नौकरी देने की कोशिश की है। मुसलमानों के लिए इस तरह की कोई पहल नहीं हुई है, जबकि भा रोजगार की दृष्टि से उनकी हालत बहुत खराब है। सरकारी नौकरियों में भी उनकी संख्या अधिक नहीं है। सरकारी नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व 7 फ़ीसद से भी कम है | सच्चर समिति की सिफ़ारिशों के क्रियान्वयन की हकीक़त को जानने के लिए बनी कमेटी के अध्यक्ष एवं नई दिल्ली स्थित इन्सिटीटयूट ऑफ ह्यूमन डिवेलपमेंट (आई.एच.डी.) के विजिटिंग प्रोफेसर अमिताभ कुंडू के अनुसार , ‘जॉब मार्केट में सबसे बुरी हालत मुसलमानों की है। शहरी क्षेत्रों में उनकी हालत अनुसूचित जनजाति से भी बुरी है।’ इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 2014 में सौंपी थी। इसमें कहा गया था कि एससी और एसटी रिजर्वेशन के चलते शहरी क्षेत्रों में पढ़ाई और रोजगार के लिए आते हैं। मुसलमानों के लिए यह सुविधा नहीं है। इस वजह से उन्हें शहरीकरण का भी फायदा नहीं मिल रहा है। कुंडू ने कहा, "हमने सिफ़ारिश की थी कि डाइवर्सिटी इंडेक्स के आधार पर अगर हम कुछ इंसेटिव दे सकें और इस इंसेंटिव सिस्टम में निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों को शामिल कर सकें तो उसका असर ज़्यादा कारगर साबित हो सकेगा | उन्होंने कहा कि , "हमने सिफ़ारिश की थी कि एक डाइवर्सिटी कमीशन बनाना चाहिए | जिन संस्थाओं ने डाइवर्सिटी को बनाकर रखा है, जिन्होंने अपनी नियुक्तियों में, फ़ायदे देने में अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति-जनजाति का ख़्याल रखा है, लैंगिक समानता का ध्यान रखा है- उसकी एक रेटिंग होगी | उस रेटिंग में जो ऊपर आएंगे उन्हें सरकार की ओर से कुछ छूट दी जा सकती है, कुछ उन्हें फंड दिए जा सकते हैं | " ज़ाहिर है , उनकी सिफ़ारिशों पर सरकार ने अब तक कोई ध्यान नहीं दिया है | पुणे बेस्ड फोर्ब्स मार्शल ग्रुप और सी.आई.आई. नेशनल कमेटी ऑन अफर्मेटिव एक्शन के चेयरमैन फरहाद फोर्ब्स का कहा है कि प्राइवेट सेक्टर का फोकस अब तक एससी, एसटी पर रहा है। दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद ने कहा कि मुसलमानों को हाशिए पर रखना पूरे सिस्टम की सेहत के लिए अच्छा नहीं है। सरकार को इस गंभीर स्थिति की ओर फ़ौरन ध्यान देना चाहिए |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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