Sep 10, 2015

देश की गरीबी काबू में क्यों नहीं ?

देश की गरीबी काबू में क्यों नहीं ?

हमारे देश में गरीबी के आंकडे बड़े भयावह हैं | इन आंकड़ों की असलियत और सच्चाई पर बार - बार उठनेवाले सवालों के बावजूद देश की गरीबी और बदहाली को छिपाया नहीं जा सका है | हाल के सर्वेक्षणों में यह बात नुमायाँ तौर पर सामने आ रही है कि 1991 में तत्कालीन कांग्रेस नीत  केंद्र सरकार ने जो आर्थिक उदारीकरण प्रक्रिया शुरू की थी , उसका गरीबी बढ़ानेवाला घातक परिणाम आज  ही सामने आ रहा है , क्योंकि किसी भी सरकार ने इस पर रोक नहीं लगाई है | भाजपा जब केन्द्रीय सत्ता से बाहर थी , तो उदारीकरण के विरुद्ध बोलती थी , लेकिन सत्ता पाते ही उसकी बोलती बंद ही नहीं हो गई , उसके ख़ुद के क़दम प्राथमिकता के साथ उदारीकरण की ओर ही बढ़े ! हमारा देश ग्राम प्रधान देश है , इसलिए कहा जाता है कि देश की आत्मा गांवों में बसती है | अतः देश की गरीबी में कमीबेशी का सीधा प्रभाव ग्रामीणों पर पडता है | देश की 125 करोड़ आबादी में से गांवों में रहनेवाले 70 फीसद लोगों के लिए गरीबी जीवन का कडुवा सच है | यह बात भी सौ फीसद सच है कि ग्रामीण भारत उससे अधिक गरीब है , जितना अब तक आकलन किया गया था | झूठे सर्वेक्षणों से बार - बार ग्रामीण भारत की भी गलत तस्वीर सामने आती रही है | एक सर्वेक्षण के अनुसार ,  ग्रामीण क्षेत्रों में कमानेवाले लोगों में से 75 फीसद की महीने भर की अधिकतम आय पांच हज़ार रूपये से अधिक नहीं है | 51 फीसद परिवार मानव श्रम पर निर्भर हैं | यही उनकी आय का प्राथमिक स्रोत है | हमारे देश के ग्रामीण विकास के जो भी बढ़ - चढ़ कर दावे किए जा रहे हैं , उनमें अधिक सच्चाई नहीं है | सर्वेक्षण में पाया गया कि विगत वर्षों में विकास की चाहे जितनी बातें हुई हों , गांवों में गरीबी की जडें गहरी बनी हुई हैं | उल्लेखनीय है कि मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों और नीति - निर्धारकों ने ग्रामीण गरीबी को ढांकने - छिपाने की नाकाम कोशिश की है ! सुप्रीमकोर्ट ने 2011 में इन्हीं आंकड़ों पर सवालिया निशान लगाया था और पूछा था कि गरीबों की संख्या निर्धारित करने के क्या आधार हैं ? इससे पहले किसी ने कृत्रिम रूप से नीचे रखी गई गरीबी रेखा कभी उँगली नहीं उठाई थी | उस समय तत्कालीन योजना आयोग उन लोगों को गरीब बता रहा था , जो शहरी इलाक़ों में रोज़ाना 17 रूपये और ग्रामीण इलाक़ों में रोज़ाना 12 रूपये खर्च कर रहे थे | शीर्ष अदालत ने कहा कि ' यहाँ दो भारत नहीं हो सकते | '  अदालत ने ये तीखी टिप्पणियां पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की जनहित याचिका की सुनवाई करते समय कीं थीं। उसने हरेक राज्य में बीपीएल परिवारों की संख्या 36 फीसदी तय करने के पीछे योजना आयोग के तर्को को जानना चाहा था । शीर्ष कोर्ट ने जानना चाहा कि 1991 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर 2011 के लिए यह प्रतिशत कैसे तय कर लिया गया ? वास्तव में यह सवाल बार - बार खड़ा होता है कि एक ओर देश तरक्की कर रहा है , दूसरी ओर गरीबों की संख्या काबू में क्यों नहीं आ पा रही है ?

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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