Aug 13, 2015

डायन बताकर हत्या कब तक जारी रहेगी

महिलाओं के असली दुश्मन कौन ?

खबर है कि झारखंड की राजधानी रांची से 45 किलोमीटर दूर एक गांव में पिछले दिनों पांच  महिलाओं की कथित तौर पर डायन बताकर हत्या कर दी गई। यह गांव रांची के मंडार ब्लॉक के अंतर्गत आता है। ब्लॉक प्रशासन ने घटना की पुष्टि की है। उसका कहना है कि मामले की जांच शुरू कर दी गई है , लेकिन पुलिस ने अभी तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया है। अक्सर पुलिस ऐसे ही करती है और इस तरह के मामलों को गंभीरता से नहीं लेती | वह रटा - रटाया कुछ बयान जारी कर देती है | इस बड़े मामले में पुलिस ने प्रथम दृष्टया सबूतों के आधार पर बताती है कि ऐसा लगता है कि उक्त मामले में ग्रामीण ही शामिल थे। बाहर के किसी तत्व के दखल देने या प्रभाव स्थापित करवाने की संभावना नहीं दिख रही है। इस बयान के बावजूद पुलिस हत्यारों को गिरफ्तार करने में अक्षम है | मारी गई एक महिला की बेटी का कहना है कि इलाके के ही एक परिवार में एक बच्चा बीमार था। बच्चे के परिवार ने उसका इलाज कराने की जगह उस पर डायन का असर बताया। सभी 5 महिलाओं को ग्रामीणों ने गत सात अगस्त 15 की रात में डायन होने का आरोप लगाकर एक-एक कर मार डाला। ग्रामीणों ने उनके कपड़े फाड़े और फिर उन्हें तलवार और लाठी से पीट-पीटकर मार डाला। डायन बताकर हत्या करने की घटना झारखंड के लिए नई नहीं है राज्य में इस तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं। नेशनल क्राइम ब्यूरो रिकॉर्ड्स के अनुसार, वर्ष 2000 से 2012 के बीच देशभर में डायन बताकर की गई हत्याओं की ज्ञात संख्या 2097 हैं। इनमें से सिर्फ झारखंड में हुए मामले 363 हैं। हालांकि झारखंड सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2011 से 2013 के बीच 400 से भी ज्यादा की डायन होने का आरोप लगाकर हत्या की गई है। इसके अलावा 2854 मामले पुलिस में दर्ज हैं। झारखंड में डायन प्रथा विरोधी कानून साल 2001 से ही लागू है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कानून बनने के बाद भी ना तो उसे प्रभावी तरीके से लागू करने की कोशिश की गई है और न ही समाज में कोई खास बदलाव आया है। देश भर में यही गंभीर स्थिति बनी हुई है | विधि - विधान और नैतिकता को धता बताकर देश के गांव-देहातों और छोटे कस्बों में अब भी कोई ओझा, भोपा , गुनिया और तांत्रिक किसी सामान्य औरत को कभी भी डायन घोषित कर देता है | आम तौर पर औरत के घर , परिवार और रिश्तेदार अपने घिनौने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए करवाते हैं | 
देखा जाता है कि इस कुप्रथा के ख़िलाफ़ जनचेतना का घोर अभाव है | खाप पंचायतें भी अपना मुंह नहीं खोलतीं | महाराष्ट्र में सामाजिक कार्यकर्ता विनायक तावडे़ और उनका संगठन कई सालों से डायन प्रथा के विरुद्ध अभियान चला रहे है | तावडे़ के मुताबिक आदिवासी इलाकों में ये प्रथा एक बड़ी समस्या बनी हुई है | वे बताते हैं कि कैसे एक ओझा गाव में एक महिला को डायन करार देने का उपक्रम करता है -  “जैसे गांव में कोई बीमार हो गया,तो कुछ लोग जवार के दाने बीमार के ऊपर सात बार घुमाकर ओझा के पास ले जाते हैं |ओझा एक दाना इस तरफ, एक उस तरफ रख कर मन्त्र बोलना शुरू करता है | फिर कहता है - हाँ, .उसे डायन ने खाया है | उस डायन का घर नाले के पास है | उसमे पेड़ है, इतने जानवर है ,आम के पेड़ है | महू का पेड़ है ,इतने बच्चे है! ” मि . तावडे आगे बताते हैं, “इनमे जो बातें अनुमान से किसी पर लागू  हो जाए , उस औरत को डायन करार दिया जाएगा | हमने ऐसे ही एक ओझा को गिरफतार करवाया है | ” राष्ट्रीय महिला आयोग की निर्मला सावंत प्रभावलकर मानती हैं कि देश के पचास - साठ ऐसे जिले है जहाँ इस कुप्रथा के उदाहरण आये दिन मिल जाते हैं | महिला को डायन, कही डाकन, तेनी या टोनी, पनव्ती ,मनहूस और ऐसे ही नामों से लांछित कर उसे घर से निकाल दिया जाता है | यह  समस्या शिक्षित वर्ग में भी है | कभी ऐसा भी होता है कि जब कोई महिला राजनीति में आती है ,तो लोग कहने लगते हैं कि वह जहां भी हाथ लगाएगी, नुकसान हो जायेगा | आप चुनाव हार जायेगे ,ऐसा कह कर लांछित किया जाता है | पीड़ित महिलाओं में ज्यादातर दलित, आदिवासी या पिछड़े  वर्ग से है | सामाजिक कार्यकर्ता तारा अहलूवालिया ने राजस्थान में आदिवासी बहुल इलाकों में ऐसी पीड़ित महिलाओं की मदद की है | उनके अनुसार ,  “ लगभग 36 ऐसे मामले मेरे पास है जिनमें औरत को डायन घोषित कर दिया गया |  मगर पुलिस ने कोई मदद नहीं की | इस गंभीर स्थिति में इस कुप्रथा पर कैसे लगाम लग पाएगी ? अहलूवालिया ने कहा, “ यह समय है जब डायन विरोधी कानून बनना चाहिए | अकेले भीलवाड़ा जिले में ही कोई ग्यारह स्थान ऐसे है जो औरत के शरीर से डायन निकालने के लिए जाने जाते है | वहां हर सप्ताह भीड़ लगती है. इन औरतों के साथ हर तरह की हिंसा होती है | ”रांची इंस्टीटयूट ऑफ़ न्यूरो साइकिएट्री एंड एलायड साइसेंज के निदेशक सह मनोवैज्ञानिक डॉ. अमूलरंजन सिंह कहते हैं , “किसी की बीमारी या मौत में भूत-प्रेत, ओझा-गुनी की कोई भूमिका नहीं होती , लेकिन गांवों में अब भी तरह-तरह की भ्रांतिया हैं | इसे जागरूकता के ज़रिए ही दूर किया जा सकता  है | महिला कार्यकर्ता लखी दास डायन कुप्रथा के ख़िलाफ़ कोल्हान इलाक़े में काम करती हैं | उनका कहना है , “ इन मामलों में विधवाएं अधिक प्रताड़ित होती हैं | जनजाति बहुल गांवों में अब भी गहरा अंधविश्वास है |.” उन्होंने बताया कि अध्ययन में पाया गया है कि महिलाओं को सार्वजनिक तौर पर मैला पिलाया जाता है | उनके बाल काट दिए जाते हैं और उन्हें निर्वस्त्र कर घुमाया जाता है, लेकिन सुदूर इलाक़ों में होनेवाली प्रताड़ना की अधिकतर घटनाएं प्रकाश में नहीं आ पातीं | झारखंड सरकार ने डायन प्रथा उन्मूलन की जो योजना बनाई है , उस   पर हर साल बीस लाख रुपए ख़र्च किए जाते हैं | मगर यह योजना कारगर नहीं साबित हुई है |  इस कुप्रथा पर रोक के लिए बड़े पैमाने पर काम करने की ज़रूरत है | 

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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