Aug 22, 2015

मुस्लिम सेनानियों की उपेक्षा क्यों ?

मुस्लिम सेनानियों की उपेक्षा क्यों ?


- डॉ . मुहम्मद अहमद
यह बड़े अफ़सोस और चिंता की बात है कि देश के स्वतंत्रता संग्राम के मुस्लिम सेनानियों का किसी भी रूप में उल्लेख तक नहीं किया जाता | जबकि ऐसी अनगिनत मुस्लिम हस्तियां और विभूतियाँ इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं , जिन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय व बहुमूल्य योगदान किया ! ब्रिटिश राज की नींव हिला दी और उन्हें भारत छोड़ने के लिए विवश किया | अनेक  मुस्लिम क्रांतिकारियों, कवियों और लेखकों ने अपने प्राणों की बाज़ी लगा दी , हज़ारों की संख्या में इन्हें शहीद किया गया | मगर हमने इन्हें भुला दिया या यूँ कहें , जानबूझकर इनके योगदानों को भुला दिया गया ! प्रख्यात समाजसेवी एवं चिंतक राम पुनियानी जी लिखते हैं , '' मुस्लिम नेताओं को स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में वह स्थान नहीं मिला , किसके वे लायक़ थे | हमारे कई शिक्षाविदों , इतिहासकारों , पाठ्य पुस्तक लेखकों और सबसे बढकर राजनीतिज्ञों की सांप्रदायिक सोच के कारण इन मुस्लिम नेताओं की स्वाधीनता आन्दोलन में महती भूमिका को भुला दिया गया या फिर उसे बहुत ही कम स्थान दिया गया |  '' [ ' चौथी दुनिया ', हिंदी में प्रकाशित एक लेख का अंश ] इसी सांप्रदायिक सोच का उल्लेख एक अन्य विचारक जगदीश्वर चतुर्वेदी इन शब्दों में करते हैं , '' इसके विपरीत भारत के मुसलमानों ने अनेक विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी भारत के स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अनेक मुस्लिम नेताओं ने ....  क्रांतिकारी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। ब्रिटिश शासन के खिलाफ मुसलमानों की देशभक्तिपूर्ण भूमिका को हमें हमेशा याद रखना चाहिए।मिसाल के तौर पर रौलेट एक्ट विरोधी आंदोलन और जलियांवाला बाग कांड में 70 से अधिक मुसलमान शहीद हुए। इनकी शहादत को हम कैसे भूल सकते हैं ? आरएसएस के दुष्प्रचार अभियान में मुसलमानों को जब भी निशाना बनाया जाता है तो उनके देशप्रेम और कुर्बानी की बातें नहीं बतायी जाती हैं। हमारे अनेक सुधीजन फेसबुक पर उनके प्रचार के रोज शिकार हो रहे हैं। ऐसे लोगों को हम यही कहना चाहेंगे कि मुसलमानों के खिलाफ फेसबुक पर लिखने से पहले थोड़ा लाइब्रेरी जाकर इतिहास का ज्ञान भी प्राप्त कर लें तो शायद मुसलमानों के प्रति फैलायी जा रही नफरत से इस देश को बचा सकेंगे। '' [ ' प्रवक्ता डॉट काम ' ]
भारतीय इतिहास पर निगाह रखनेवाले सुगमता के साथ जानते हैं कि स्वाधीनता आन्दोलन में सात प्रमुख मुस्लिम संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई , जिनके नाम हैं - 1 , मजलिसे अहरार 2 , खुदाई खिदमतगार 3 , खिलाफत कमेटी 4 . कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस 5 , जमीअतुल उलमा 6 , अंजुमने वतन बलूचिस्तान , और 7 . प्रजा कृषक पार्टी | एक दस्तावेज़ी रिपोर्ट के अनुसार , स्वतंत्रता आन्दोलन में गिरफ्तार किए गए मुसलमानों की कुल संख्या दो लाख 77 हज़ार है | साथ ही शहीद किए गए मुसलमानों की संख्या हज़ारों में है | उदाहरण के तौर पर कुछ आंकड़े इस प्रकार हैं -  1930 में सूबा सरहद [ सीमान्त प्रदेश ] में तीन हज़ार मुसलमानों को गोलियों से उडा दिया गया , जबकि चार हज़ार नामर्द बनाये गए और चालीस हज़ार गिरफ्तार किए गए | इसी वर्ष पंजाब में चार हज़ार , उत्तर प्रदेश में दस हज़ार , बिहार में तीन हज़ार , असम में तीन हज़ार , बंगाल में चार हज़ार , बम्बई में तीन हज़ार और सिंध में तीन हज़ार मुसलमान गिरफ्तार किए गए | एक रिकार्ड के अनुसार , भारतीय स्वाधीनता संग्राम में गिरफ्तार मुसलमानों की कुल संख्या लगभग दो लाख 77 हज़ार है |   
देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में लाखों मुसलमान भी शामिल हुए , जिनमें से बहुतों का नाम तक अज्ञात है | इन मुस्लिम सेनानियों के नामों की सूची में कुछ के नाम निश्चय ही सर्वोपरि हैं | प्रस्तुत विशेषांक में ऐसी ही कुछ शख्सियतों के कुछ कारनामों का उल्लेख भर किया गया है | प्रसिद्ध विद्वान मौलाना शाह वलीउल्लाह [ रह .]  ने  मुसलमानों में लक्ष्य - प्राप्ति की खातिर राजनीतिक चेतना जगाने का महत्वपूर्ण काम अंजाम दिया | इसी क्रम में मौलाना शाह अब्दुल अजीज़ और हाजी इम्दादुल्लाह के योगदानों को कोई कैसे नकार सकता है | महान क्रन्तिकारी मौलाना महमुदुल हसन और उबैदुल्लाह सिन्धी के कारनामे तो स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हैं , लेकिन राजनीति और कूटनीति के धनी मौलाना मुहम्मद मियां अंसारी के योगदान से दुनिया अनभिज्ञ  नहीं है | यह बात दूसरी है कि मुसलमानों के इस अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति के प्रयासों पर जानबूझकर प्रकाश नहीं डाला जाता | मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, हकीम अजमल खान , मौलाना मुहम्मद अली , मौलाना शौकत अली ,अल्ताफ़ हुसैन हाली , बी अम्मा , सैयद अहमद सरहिंदी , मौलाना शिबली नोमानी ,डॉ . सैफुद्दीन किचलू और रफी अहमद किदवाई आदि ऐसे मुसलमान हैं जो इस उद्देश्य में शामिल थे | शाहजहांपुर के अशफाकउल्लाह खां ने काकोरी (लखनऊ) पर ब्रिटिश राजकोष को लूटने का षड़यंत्र रचा था | खान अब्दुल गफ्फार खां (सीमांत गांधी के रूप में प्रसिद्ध) एक महान  थे ,जिन्होंने अपने 95 वर्ष के जीवन में से 45 वर्ष केवल जेल में बिताया| भोपाल के मुहम्मद बरकतुल्लाह ग़दर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे , जिन्होंने  ब्रिटिश विरोधी संगठनों से नेटवर्क बनाया था| ग़दर पार्टी के सैयद शाह रहमत ने फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम किया और 1915 में असफल गदर में उनकी भूमिका के लिए उन्हें फांसी की सजा दी गई | फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) के अली अहमद सिद्दीकी ने जौनपुर के सैयद मुज्तबा हुसैन के साथ मलाया और बर्मा में भारतीय विद्रोह की योजना बनाई और 1917 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया था | केरल के अब्दुल वक्कोम कादिर ने 1942 के 'भारत छोड़ो' में भाग लिया और 1942 में उन्हें फांसी की सजा दी गई थी|  उमर सुबहानी जो की बंबई की एकउद्योगपति करोड़पति थे, उन्होंने गांधी और कांग्रेस व्यय प्रदान किया था और अंततः स्वतंत्रता आंदोलन में अपने को कुर्बान कर दिया | क्रन्तिकारी मुस्लिम महिलाओं में बी अम्मा के साथ ही बेगम  हजरत महल, असगरी बेगम, हबीबा , जमीला , बेगम ज़ीनत महल आदि ने ब्रिटिश के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में महतवपूर्ण योगदान दिया है | बहुत सी मुस्लिम महिलाओं ने क्रांतिकारियों को विभिन्न प्रकार से सहायता प्रदान की |   जब 1857 में क्रांति प्रारंभ हुई, तो कानपुर में नाना साहब तथा तात्या टोपे ने क्रांति का नेतृत्व किया। उस समय हिंदू और मुस्लिम महिलाओं ने विविध रूप से क्रांतिकारियों को सहायता दी। उन्होंने गोला-बारूद इधर-उधर ले जाने, तोपचियों की मदद करने, किले के नीचे लड़ रहे क्रांतिकारियों को भोजन पहुँचाने, घायलों की सेवा-सुश्रूषा का कार्य कर युद्ध के समय क्रांतिकारियों को मदद पहुँचाई। आवश्यकता पड़ने पर वे शस्त्र धारण करके युद्ध के मैदान में भी जाती थीं। अवध में क्रांति का नेतृत्व बेग़म हज़रत महल ने किया था। उनके नेतृत्व में वहाँ की अनेक मुस्लिम महिलाओं ने अंग्रेज़ों के विरद्ध  क्रांति में खुलकर भाग लिया था। उनमें कुछ तो युद्ध में शहीद हो गईं और कुछ के साथ अँग्रेज़ सैनिकों ने बुरा बर्ताव किया था। ऐसा पता चलता है कि लखनऊ को बचाने के लिए अनेक महिलाओं ने अपनी जान तक कुर्बान कर दी। एक महिला नेे पेड़ पर बैठे हुए अँग्रेज़ सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया। इसी प्रयास में वह भी ब्रितानियों के हाथों शहीद हो गई। इसी प्रकार दिल्ली में जीनत महल के नेतृत्व में कुछ मुस्लिम महिलाओं ने अँग्रेज़ सैनिकों को विशेष क्षति पहुँचाई थी। ऐसा कहा जाता है कि दिल्ली की एक मुस्लिम महिला ने ब्रितानियों को आतंकित कर दिया था। इसके अतिरिक्त दिल्ली की चौदह मुस्लिम महिलाओं ने इज्ज़त बचाने के लिए आत्महत्या कर ली थी। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के भवन थाना की असगरी बेग़म को क्रांति में अहम भूमिका निभाने कारण ज़िंदा आग में जला कर मार डाला गया। इसके अतिरिक्त बाखरा गाँव की बख्तावरी को फाँसी की सजा दी गई थी।अफ़सोस आज हमें उन लोगों की कुर्बानी बिलकुल भी याद नहीं रही, जिनकी बदौलत हमें आज़ादी नसीब हुई |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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