Jul 28, 2015

निजता का अधिकार ?


- डॉ . मुहम्मद अहमद 
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह सवाल उठा कर सबको चौंका दिया कि ‘क्या निजता का अधिकार मूल अधिकार माना जा सकता है ?’ यह सवाल इसलिए भी व्यर्थ है , क्योंकि सुप्रीमकोर्ट ने अपनी कई व्याख्याओं में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकारों के तहत माना है | केंद्र सरकार निराधार ' आधार ' के चक्कर में तरह - तरह की दलीलें दिए जा रही है | केंद्र सरकार की ओर से ' आधार ' को आधार प्रदान करने के लिए बहस करते हुए अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि संविधान निजता के अधिकार को मान्यता नहीं देता।
 उन्होंने इस सिलसिले में दो दशकों में सुप्रीम कोर्ट की ओर दिए उन फैसलों पर पुनर्विचार करने को कहा जिनमें निजता के अधिकार को मूल अधिकार के तौर पर परिभाषित किया गया है। उल्लेखनीय है कि बिना संसद की मंज़ूरी और शीर्ष अदालत की मुहर के ' आधार ' की घोड़ा बुरी तरह कांग्रेस नीत केंद्र सरकार ने दौड़ाया था , उसी सरपट चाल को मोदी सरकार भी पकड़े हुए है ! जबकि इसी वर्ष 16 मार्च को सुप्रीमकोर्ट इसकी अनिवार्य्रता पर रोक लगा चुकी है | फिर भी मोदी सरकार पर कोई असर नहीं पड़ा | वह बस इसी की लगातार रट लगाये हुए है | 
उसे इसके दुरूपयोग की भी परवाह नहीं ! कुछ ईष्ट देवों के अतिरिक्त कुत्ते - बिल्ली के भी आधार बन चुके हैं और कुछ सीनियर सिटीजन के हाथ के निशान घिस जाने या कैमरे पर न आने के कारण उनके ' आधार ' बनाने से इन्कार कर दिया गया है ! फिर भी सरकार पुख्ता व्यवस्था बनाने का दम भर रही है ! आधार योजना पर उठी आपत्तियों को लेकर कुछ आपत्तियों पर केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में कहा कि आधार योजना को लागू करने के लिए ‘पुख्ता व्यवस्था’ होगी और कल्याणकारी कार्यक्रम को निरस्त करने के लिए निजता के अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार नहीं है। 
न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष अटार्नी जनरल ने कहा, ‘निजता का अधिकार हमारे संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार नहीं है। यह अधिकार एक अन्य अधिकार से मिलता है। संविधान निर्माताओं की मंशा निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की नहीं थी।’
उन्होंने कहा, निजता के लिए कोई मौलिक अधिकार नहीं है, इसलिए अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिकाएं खारिज की जानी चाहिए। इस पर पीठ ने कहा कि वह इस मामले को संविधान पीठ के पास भेजना चाहता है। आधार कार्ड को वेतन, भविष्य निधि वितरण और विवाह व संपति के पंजीकरण जैसी तमाम गतिविधियों के लिए अनिवार्य बनाने के कुछ राज्यों के फैसलों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अदालत सुनवाई कर रही है।
अटार्नी जनरल ने कहा कि इसमें किसी अधिकार के हनन का सवाल ही नहीं उठता। वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अटार्नी जनरल की इन दलीलों का विरोध किया। सुप्रीमकोर्ट ने पूर्व के अपने फ़ैसलों में निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार के तहत एक मौलिक अधिकार माना है, लेकिन यह अधिकार ऐसा नहीं है, जिसमें कोई कटौती नहीं की जा सकती है। 
अमेरिकी नागरिकों को यह अधिकार प्राप्त है , हालाँकि यह अधिकार उन्हें बहुत विलंब से मिला | अमेरिका में अदालतों ने इस अधिकार की रक्षा 19वीं सदी के अंत तक नहीं की क्योंकि कॉमन लॉ ने इसे मान्यता नहीं दी थी। इसे मान्यता तब मिली जब चार्ल्स वारेन तथा लूई ब्रैंडाइस ने हार्वाड लॉ रिव्यू (1890) में एक ऐतिहासिक लेख लिखा- ‘द राइट टू प्राइवेसी’। निजता के अधिकार से संबंधित सैकड़ों मामले अमेरिकी अदालतों के समक्ष आये | पहली बार इस मामले में न्यूयॉर्क ऐपेलेट कोर्ट ने रॉबर्सन बनाम रोचेस्टर फोल्डिंग बॉक्स कम्पनी (1902) में इस पर विचार किया और प्रतिवादी को इस अधिकार के उल्लंघन के लिए दोषी करार दिया। 
फिर ग्रिसवर्ल्ड मामले (1965) में जस्टिस डगलस ने कहा कि भले ही बिल ऑफ राइट्स में इस अधिकार का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, यह अन्य अधिकारों में निहित है। अमेरिका में ' आधार ' नहीं पाया जाता | भारतीय सुप्रीमकोर्ट ने आर. बनाम गोविंद (1975) विवाद में अमेरिकी अदालत के स्टैंड का हवाला दिया था । यह सच है कि सार्वजनिक हित महत्वपूर्ण होते हैं , परन्तु  ' आधार ' के मामले में पुख्ता तौर पर ' सार्वजनिक हित ' सामने नहीं आ सका है | आकड़ों आदि के दुरूपयोग का संशय अलग से बना हुआ है |
 

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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