Jul 2, 2015

पुलिस की कारकर्दगी में बड़े बदलाव की ज़रूरत

पुलिस की कारकर्दगी में बड़े बदलाव की ज़रूरत 
हमारे देश में पुलिस की कार्यशैली अक्सर विभिन्न सवालों के घेरे में रहती है | यह अपनी नियंत्रक सरकार की ग़ुलाम बनी रहती है | यह महत्वपूर विभाग आज़ादाना काम करे , इसके नसीब में नहीं है ! अतएव निष्पक्ष कार्रवाई इसके बस की बात नहीं !! फिर सत्तारूढ़ राजनेताओं का बल बनी पुलिस से न्याय और इन्साफ की कैसे आशा की जा सकती है ? यह तथ्य भी बार - बार उजागर हो चुका है कि राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण भी वे अपराध बढ़े हैं , जिन्हें पुलिस ख़ुद अंजाम देती और दिलवाती है | उत्तर प्रदेश की पुलिस कार्य - प्रणाली को देखें , तो यह तथ्य और भी साफ़ हो जाता है , जहाँ अपराधिक भ्रष्टाचार के साथ जातिवाद का बोलबाला है | नतीजा यह है कि एक ही जाति - यादव की पुलिस के उच्च पदों पर भरमार हो गई है | बिहार पुलिस आज के युग में भी जातीय आधार चूल्हा - चौके का इन्तिज़ाम करवाती है | इस अफ़सोसनाक सूरतेहाल में पुलिस की कार्यप्रणाली और विवेचना कैसी होगी , सभी को सहज ही समझ में आ सकती है | उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार के चहेते मंत्री राम स्वरुप वर्मा ने अभी जो आपराधिक गुल खिलाया , उससे सारी दुनिया अवगत हो चुकी है | पुलिस कोतवाल श्रीप्रकाश राय ने अपने साथ चार पुलिसकर्मियों को शाहजहांपुर के पत्रकार जागेन्द्र सिंह को मंत्री वर्मा के कहने पर विगत एक जून 15 को जिन्दा जला दिया , फिर भी इन सबको निलंबन की दिखावटी कार्रवाई के बाद साफ़ बचा लिया गया | पुलिस ने पूरे मामले को गलत ढंग से विवेचित कर दिया ! पुलिस की खराब कार्यप्रणाली और गलतकारी से पुलिस सुधार आयोग सदैव चिन्तित रहता है | उसका मानना रहा है कि पुलिस का तौर - तरीक़ा सन्तोषजनक नहीं रहता , जिसके कारण जनता को न्याय नहीं मिल पाता और उसे तरह - तरह की परेशानियाँ उठानी पडती हैं | अतः आयोग पुलिस तंत्र में सतत सुधार की सिफ़ारिशें करता रहता है , फिर भी इन पर ध्यान न देना और इन्हें अमल में न लाना सचमुच हैरानकुन और चिंताजनक है | पुलिस सुधार आयोग की सिफ़ारिशों में एक महत्वपूर्ण सिफ़ारिश थानों में पुलिस प्रशासन से अलग एक विवेचना इकाई की स्थापना है , ताकि मामलों में निष्पक्ष कार्रवाई संभव हो सके | ऐसी सिफ़ारिश विवेचना अधिकारियों द्वारा दबाव में काम करने एवं इस प्रकार न्याय की जगह अन्याय का पैरोकार बनने की शिकायतों के कारण की गयी है | पुलिस निरंकुशता के बेशुमार मामले हैं | ऐसा ही एक और मामला मेरठ का सामने आया था |  पिछले वर्ष 2014 के आरंभिक काल में एसआई अरुणा राय द्वारा आईपीएस अधिकारी डीपी श्रीवास्तव पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने के बाद जिस तरह से यह मामला सामने आया कि सीओ रैंक की विवेचनाधिकारी सरवन जीत कौर ने मुकदमें से गैरजमानती धाराओं को हटाकर श्रीवास्तव की जमानत का रास्ता साफ किया गया , उसने एक बार फिर पुलिस की विवेचना पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए | 
आरोपी आईपीएस को जमानत दिलाने वालों को अरुणा ने सहअभियुक्त कह कर उनके साथ हुए अन्याय में विवेचनाधिकारी को भी बराबर का दोषी माना है | उन्होंने बड़ी मुश्किल से उक्त आई पी एस अफ़सर के ख़िलाफ़ एफ़ आई आर दर्ज करायी थी और अब विवेचना अधिकारी ने मामले को काफ़ी हल्का बनाने में कोई कोई कसर नहीं छोड़ी है | ऐसे भी आरोप लगते रहे हैं कि मामला जब राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी का या अल्पसंख्यक या दलित समाज का होता है , तो यह स्वेच्छाचार - भ्रष्टाचार कुछ अधिक ही बढ़ जाता है | इन सारी बुराइयों की जड़ सत्ता व पुलिस का नापाक एवं कलुषित गठजोड़ है , जो एक दूसरे के मनोबल के प्रति इतना फिक्रमंद होता है कि आम नागरिक का मनोबल बरक़रार न रह सके | देखा जाता है कि इस पूरे मनोबल को बचाने में विवेचनाधिकारी लगा रहता है, जो सबूतों का अभाव खड़ा कर उन्हें बरी करवाने की कोशिश करता है | चिंता की बड़ी बात यह भी है कि आजकल सीबीआई भी दबावों और प्रभावों से मुक्त नहीं है |से मुक्त नहीं है | अल्पसंख्यकों के मामले में पुलिस की भूमिका क्या होती है ? इसे हम बार - बार देखते और भुगतते हैं | एक मिसाल देखिए -  सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर-शामली व आस-पास के जिलों में सांप्रदायिक हिंसा के दौरान मुस्लिम महिलाओं के साथ हुए बलात्कार के मामलों में तीन हफ्ते से अधिक समय बाद एफ़ आई आर  दर्ज हो पाती है |  बलात्कार जैसे जघन्यतम अपराध जिसमें पीडि़ता की तहरीर के बाद प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करते हुए 24 घंटे के भीतर पीडि़ता का चिकित्सकीय परीक्षण कराने का निर्देश है, वहां हफ्तों की जाने वाली पुलिस की यह देरी बलात्कारी को बचाने की हर संभव कोशिश होती है | सवाल यह भी उठता है कि मुजफ्फरनगर ही नहीं देश में ऐसे तमाम दलित व अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा में पुलिस की इस आपराधिक कार्यशैली को क्या विवेचनाधिकारी अपनी विवेचना में शामिल करता है, तो इसका जवाब न में होगा | सर्वोच्च न्यायालय  विवेचनाधिकारी को एक स्वंतंत्र जांच अधिकारी के बतौर कार्य करने की बात कहता है | देश में पुलिस द्वारा की गई फर्जी मुठभेड़ों की जांच चाहे वह  यूपी के सोनभद्र में रनटोला कांड, जहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दो छात्रों को डकैत बताकर की गई हत्या का मामला हो या फिर उत्तराखंड के रणवीर हत्याकांड इन सभी में विवेचनाधिकारी ने पुलिस अधीक्षक का नाम न लेकर उसे बचाने का कार्य किया है , जबकि सजा पाने वाले पुलिस कर्मियों ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि ऐसा उन्होंने एसपी के कहने पर किया था | निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है| इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ कांड को कौन भूल सकता हैं, जिसमें राज्य के पुलिस अधिकारियों पर राज्य सरकार के संरक्षण में हत्या का आरोप है, वहां पर भी इसे साफ देखा जा सकता है | वहीं उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से गिरफ्तार किए गए तारिक-खालिद की गिरफ्तारी पर गठित निमेष कमीशन, गिरफ्तारी को संदिग्ध मानते हुए पुलिस के अधिकारियों को दोषी माना , वहीं इस मामले के विवेचनाधिकारी ने पुलिस की गिरफ्तारी को सही माना | 18 मई 2013 को खालिद मुजाहिद की हत्या कर डी गई थी , जिसमे कई पुलिसवाले आरोपित हैं | इस मामले की सीबीआई जाँच भी मनरेगा की तरह बहुत ही धीमी गति से चल रही है | इसी तरह छत्तीसगढ़ में सोनी सोरी के गुप्तांगों में पत्थर डालने वाले पुलिस अधिकारियों में से एक एसपी अंकित गर्ग को राष्ट्रपति द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जा चुका है ! यह एक बड़ी विडंबना है | अतः पुलिस की कार्यशैली में आमूल सुधार की ज़रूरत है |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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