Jul 30, 2015

53 वें जन्मदिन पर याक़ूब मेमन को फांसी

53 वें जन्मदिन पर याक़ूब मेमन को फांसी 

मुंबई में 12 मार्च 1993 के श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के सिलसिले में मौत की सजा पाने वाले एकमात्र दोषी याकूब मेमन को तमाम क़ानूनी कोशिशों के बावजूद गत 30 जुलाई की सुबह उसके 53 वें जन्मदिन पर फांसी दे दी गई । सुप्रीमकोर्ट में बार - बार की गुहार पर 29 / 30 जुलाई की रात में सुबह चार बजकर 55 मिनट तक सुनवाई हुई और याक़ूब के वकीलों की याचिका ख़ारिज कर डी गई | इसके साथ ही राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी एवं  महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल विद्यासागर राव ने भी याकूब की दया याचिका कर खारिज कर दिया। इस प्रकार राहत प्राप्त करने के उसके प्रयास विफल रहे | याक़ब को नागपुर केंद्रीय कारागार में सुबह सात बजे से कुछ देर पहले फांसी दे दी गई। यह सज़ा कई सवाल छोड़ गई , ख़ासकर यह कि जो शख्स 23 वर्ष क़ैद में रह चुका हो , उसे फांसी देने का क्या औचित्य है ? देश के कई नामी - गिरामी वकीलों और समाजसेवियों ने याक़ूब को फांसी से बचाने के सभी संभव प्रयास किए , जो आख़िरकार नाकाम रहे | जुलाई 1994 में याक़ूब मेमन को तब पकड़ा गया, जब वह काठमांडू [ नेपाल ] में एक वकील से भारत वापसी के बारे में सलाह लेने गया था | वकील उनका रिश्तेदार था | खबरों और रॉ के टेररिज़्म डिवीज़न के मुखिया बी रमन के लिखे एक लेख के मुताबिक़, उस समय उसे भारत लाया गया था और मामले में शामिल किया गया था | 2007 में याक़ूब को मौत की सज़ा दिए जाने और अभियोजन पक्ष द्वारा इस मामले में परिस्थितिजन्य तथ्यों को न रखे जाने से रॉ अधिकारी रमन नाराज़ हो गए थे | यह मामला सुप्रीमकोर्ट में भी चला और 29 जुलाई 15 को कोर्ट ने याक़ूब मेमन की फांसी की सजा बरकरार रखा। कोर्ट ने उसकी क्‍यूरेटिव पेटिशन पर दोबारा सुनवाई करते हुए उसे खारिज कर दिया। 
सुप्रीम कोर्ट में 29 जुलाई को जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई में तीन जजों की पीठ ने याकूब मेमन की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें मेमन ने 30 जुलाई को निर्धारित अपनी फांसी पर रोक लगाने का आग्रह (क्‍यूरेटिव पेटीशन) किया। कोर्ट में मेमन की अर्जी पर दोनों पक्षों की बहस पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्‍यूरेटिव पेटिशन पर तीनों जजों का फैसला सही था।
इसके एक दिन पहले 28 जुलाई को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने इस याचिका पर खंडित निर्णय दिया, जिससे मेमन की फांसी पर दो रायें उभरकर सामने आ गई थीं। 
जस्टिस ए.आर. दवे ने मौत के वारंट पर रोक लगाये बगैर उसकी याचिका खारिज कर दी, वहीं जस्टिस कुरियन की राय अलग रही और उन्होंने रोक का समर्थन किया। दोनों जजों के बीच किसी विषय पर अलग अलग राय होने पर पैदा कानूनी स्थिति के बारे में पूछे जाने पर पीठ को बताया गया कि यदि एक न्यायाधीश इस पर रोक लगाता है और दूसरा नहीं, तो फिर कानून में कोई व्यवस्था नहीं रहेगी। अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी और मेमन की ओर से पेश हुए राजू रामचंद्रन सहित वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि इस विषय को गौर करने के लिए प्रधान न्यायाधीश के हस्तक्षेप के साथ बड़ी पीठ को भेजा जाना चाहिए। न्यायमूर्ति दवे का नजरिया था कि 21 जुलाई को मेमन की उपचारात्मक याचिका को खारिज करने में कुछ खामी नहीं थी और महाराष्ट्र के राज्यपाल उसकी दया याचिका पर फैसला कर सकते हैं क्योंकि दोषी कैदी अपनी सभी कानूनी उपचारों का प्रयोग कर चुका है। शीर्ष अदालत की ओर से मेमन की उपचारात्मक याचिका पर फैसले में सही प्रक्रिया का पालन नहीं करने की बात कहने वाले न्यायमूर्ति कुरियन ने कहा कि इस खामी को दूर किया जाना चाहिए और उपचारात्मक याचिका पर नए सिरे से सुनवाई होनी चाहिए। जस्टिस ने कहा कि ऐसी परिस्थिति में मौत के वारंट पर रोक लगाई जानी चाहिए। जस्टिस दवे ने इस मसले पर मनु स्मृति का एक श्लोक उद्धृत करते हुये कहा कि खेद है, मैं मौत के फरमान पर रोक लगाने का हिस्सा नहीं बनूंगा। प्रधान न्यायाधीश को निर्णय लेने दीजिए। इस स्थिति में इसे तीन जजों की पीठ के हवाले किया गया |
 जब इस मामले में जस्टिस ए.आर. दवे और जस्टिस कुरियन जोसेफ के बीच असहमति पैदा हुई , तो इस गंभीर मामले को प्रधान न्यायाधीश एच. एल. दत्तू को भेजा गया , जिन्होंने मेमन की किस्मत का फैसला करने के लिए जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस प्रफुल्ल सी पंत और जस्टिस अमिताव राय की बड़ी पीठ का गठन किया। इस पीठ पर बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपी गई कि वह यह फ़ैसला करे कि 30 अप्रैल को मुंबई की टाडा अदालत की ओर से जारी मौत वारंट पर रोक लगाई जाए या नहीं और मेमन की याचिका के गुणदोष पर गौर किया जाए या नहीं। मेमन ने दावा किया था कि अदालत के सामने सभी कानूनी उपचार खत्म होने से पहले ही वारंट जारी कर दिया गया। 
 अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी का विचार था कि सुधारात्मक याचिका 21 जुलाई को खारिज होने के साथ ही एक तरह से दोषी को उपलब्ध सारे कानूनी विकल्प अब खत्म हो चुके थे , जबकि मेमन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन का दावा था कि मेमन की सुधारात्मक याचिका पर गौर करते समय शीर्ष अदालत ने सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया। राजू रामचंद्रन ने कहा कि सुधारात्मक याचिका लंबित होने के दौरान म्रत्यु की सज़ा का आदेश ही जारी नहीं किया गया, बल्कि टाडा अदालत ने मेमन को यह बताने का अवसर भी नहीं दिया कि क्या उसने उपलब्ध सारे कानूनी विकल्प अपना लिए हैं। उन्होंने मेमन को उसे फांसी दिए जाने की की तारीख की जानकारी देने में हुई देरी की भी आलोचना की। इस तारीख के बारे में उसे 13 जुलाई को बताया गया था। उन्होंने कहा कि टाडा न्यायाधीश ने मौत की सजा पर अमल के लिए 90 दिन का नोटिस दिया था लेकिन राज्य सरकार ने सिर्फ 17 दिन का नोटिस दिया। राज्य सरकार का आदेश समय पूर्व है। उन्होंने कहा कि 30 अप्रैल को मौत का फरमान जारी करने के मसले को चुनौती दी गई , जो इस अदालत की ओर से प्रतिपादित नियमों के आलोक में पूरी तरह मनमाना है। ऐसा लगता था कि जस्टिस कुरियन जोसेफ मेमन के वकील से सहमत थे , जब उन्होंने कहा कि शायद सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि सुधारात्मक याचिका शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के समक्ष जाने के बाद उस पीठ के पास भी जानी चाहिए थी जिसने उसकी मौत की सजा की पुष्टि के मामले में नौ अप्रैल, 2015 को पुनर्विचार याचिका पर अंतिम सुनवाई की थी।
जस्टिस कुरियन जोसेफ ने ऐसे मामलों में दोषी की ओर से राज्यपाल और राष्ट्रपति के दया याचिका दायर करने सहित विभिन्न प्रक्रियाओं के बारे में सवाल उठाए।  उन्होंने कहा कि खुले हाथों से रहम की मांग की जा रही है और यह सांविधानिक प्रक्रिया है।अटार्नी जनरल रोहतगी जब इस मामले के पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से अपनी बात रख रहे थे तो इस दौरान जस्टिस कुरियन ने सुधारात्मक याचिका के बारे में कई सवाल किए | वे जानना चाहते थे कि सुधारात्मक याचिका की प्रक्रिया क्या होती है। रोहतगी ने जोर देकर कहा कि इस मामले से संबंधित किसी भी पहलू को 21 मार्च, 2013 के मूल फैसले के आलोक में देखना चाहिए। इसी फैसले के अंतर्गत न्यायालय ने मेमन को दोषी ठहराने और मौत की सजा देने के टाडा अदालत के 2007 के फैसले को सही ठहराया था ,क्योंकि तथ्य तो बदल नहीं सकते। उन्होंने कहा कि दया का सवाल भी न्यायिक प्रक्रिया पर नहीं ,बल्कि अपराध के तथ्यों पर निर्भर करता है। न्यायमूर्ति दवे ने एक मौके पर कहा कि अदालत गुण दोष के सवाल पर अब गौर नहीं कर सकता। इसमें फैसला करने के लिए अब और कुछ नहीं बचा है।
अटार्नी जनरल ने इस मामले में शीर्ष अदालत की कार्यवाही का जिक्र करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत में 21 मार्च, 2013 को मौत की सजा की पुष्टि और 30 जुलाई को प्रथम पुनर्विचार याचिका खारिज होने के बाद मेमन के भाई ने राष्ट्रपति के पास उसी साल अगस्त के पहले हफ्ते में दया याचिका दायर की, क्योंकि उस समय 14 अगस्त को उसे फांसी दी जानी थी। दया याचिका लंबित होने के दौरान उसकी सजा के अमल पर रोक लगा दी गई थी और उसकी याचिका राज्यपाल के पास भेज दी गई, जिन्होंने 14 नवंबर, 2013 को इसे अस्वीकार कर दिया था। बाद में राष्ट्रपति ने भी 11 अप्रैल, 2014 को अस्वीकार कर दिया था। पिछले दिनों याक़ूब मेमन को फांसी की सज़ा से बचाने के लिए कई सेवानिवृत्त जजों सहित विभिन्न क्षेत्रों के संभ्रांत जनों ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई | चालीस लोगों के दस्तखतों के साथ राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की सेवा में पत्र लिखा गया |
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले लोगों में वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी, कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर. भाकपा महासचिव सीताराम येचुरी, वरिष्ठ वकील और पूर्व मंत्री प्रशांत भूषण, वरिष्ठ पत्रकार एन. राम, आनंद पटवर्धन , जस्टिस पणचंद जैन , जस्टिस एच . एस. बेदी , जस्टिस पी . बी . सावंत , जस्टिस के . पी . सिवा सुब्रह्मण्यम , जस्टिस एस . एन . भार्गव , जस्टिस के . चंद्रू , जस्टिस नाग मोहन दास , अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा , भाकपा सांसद डी . राजा , माकपा नेता प्रकाश करात , बृंदा करात , वरिष्ठ एडवोकेट के . टी . एस . तुलसी , तुषार गाँधी , नसीरुद्दीन शाह और महेश भट्ट के नाम शामिल हैं। इस पत्र रूपी याचिका में कहा गया, 'हम इस पत्र के जरिए महामहिम से अनुरोध करते हैं कि फांसी पर रोक लगाई जाए।'लिखा गया कि इस पत्र को दया याचिका मानकर याकूब की सजा पर फिर से विचार किया जाए। याकूब पिछले 20 वर्षों से पैरानाइड स्क्रित्जोफ्रेनिया से पीड़ित है और इस आधार पर वह फांसी के लिए शारीरिक रूप से अनफिट है। जेल के डॉक्टरों ने भी उसकी मानसिक स्थिति की पुष्टि की है।" ज़ाहिर है , इन सब प्रक्रियाओं के बीच याक़ूब को फांसी की सज़ा दे दी गई |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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