Jun 10, 2015

योग के बहाने

योग के बहाने 
संयुक्त राष्ट्र ने आगामी 21 जून को योग दिवस मनाने का ऐलान क्या किया , श्रेय लेने वालों की होड़ लग गई | इसी बीच किसी ने इसे अपने धर्म - प्रचार का साधन समझ लिया और इसके प्राचीन रूपों के साथ मनाने का फ़ैसला , जिसका भारत जैसे लोकतान्त्रिक और धर्म निरपेक्ष देश में विरोध होना ही था और हुआ भी | जबकि संयुक्त राष्ट्र ने आधुनिक योग पर आधारित योग दिवस मनाने की बात कही थी |
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के विरोध पर ॐ और सूर्य नमस्कार जैसी क्रियाओं को हटाने का फ़ैसला विवेकसम्मत  ही कहा जाएगा | दरअसल इस मामले में संयुक्त राष्ट्र से बड़ी चूक हुई है | उसे विचारक वेंडी डॉनियर जैसे बुद्धिजीवियों की किताबों के हवाले से बताया गया कि '' योग यूरोपीय जनों की भारत को देन है , जो 18 वीं और 19 वीं सदी में यूरोपियों के साथ भारत आया था | उस समय लोग व्यायाम के फ़ायदे तलाश कर रहे थे और फ्रांसीसी दार्शनिक रूसो की ' एमिली ' जैसी किताबों से उन्हें प्रेरणा मिल रही थी | ''
 वह लिखता है कि ''कई लोग इस तथ्य पर एतिराज़ जताते हैं और सोचते हैं कि आधुनिक योग प्राचीन भारतीय चीज़ है |'' इन बातों से प्रभावित होकर योग के स्वास्थ्य - लाभ के परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्र ने इसे दिवस के रूप में मनाने का फ़ैसला किया |
वास्तव में योग की जड भारत के प्राचीन ग्रन्थ '' घेरंड संहिता ' में निहित है , जिसके रचनाकार घेरंड मुनि हैं | वर्णित है कि मुनि जी अपने प्रिय शिष्य चंड कपालि को योग विषयक प्रश्न पूछने पर जो नसीहत की थी , वह इसमें संकलित है | पतंजलि के ' योग सूत्र ' में आसन , प्राणायाम , मुद्रा , नेति आदि योगिक क्रियाओं का उल्लेख नहीं है | जबकि ' घेरंड संहिता ' में योग आसन , प्राणायाम , बंध , मुद्रा और योग की विभिन्न क्रियाओं का जैसा विशद वर्णन मिलता है , वह अन्यत्र उपलब्ध नहीं है |  इस किताब में 350 श्लोक हैं | यही आधारभूत किताब योग को सही तौर पर हिन्दू धर्म से जोड़ती है | यह अद्वैतवादी है , जो आदि शंकराचार्य का भी उपदेश है |
हमारे देश धार्मिक क्रियाओं और प्रतीकों को दूसरे धर्म के लोगों पर थोपने का जो चलन बढ़ा है , उसकी व्यापक निंदा हो रही है | योग ही नहीं सूर्य नमस्कार , सरस्वती वन्दना , गीता - पठन आदि को जबरन थोपने की कोशिश की जा रही है और विरोध पर अशालीन जवाब दिया जाता है | यह सब कृत्य हमारे देश के संविधान के विपरीत हैं ! जमाअत इस्लामी हिन्द के महासचिव इंजीनियर मुहम्मद सलीम ने ऐसी चीज़ों को केंद्र - राज्य सरकारों द्वारा पूरे समाज और इसके सभी वर्गों के लिए अनिवार्य करने और जबरन थोपने का विरोध किया है और इसे संविधान की आत्मा के प्रतिकूल बताया है |
 उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को अपनी धारणा के अनुसार कृत्य की स्वतंत्रता प्राप्त है | सत्ताधारी वर्ग देश के जन - साधारण की निर्धनता , आर्थिक बदहाली , शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने और सामाजिक न्याय जैसी महत्वपूर्ण समस्याओं को हल करने एवं विभिन्न वर्गों और समूहों के बीच एकजुटता और सद्भाव पैदा करने की सच्चे दिल से कोशिश करने के स्थान पर समाज में अशांति और बेचैनी पैदा करने की अनुचित व अनपेक्षित कोशिश कर रहा है , जो अत्यंत हानिकारक है | इंजीनियर मुहम्मद सलीम ने यह आशा प्रकट की कि सरकार संविधान का पालन करते हुए एक विशेष कल्चर के वर्चस्व की कोशिश से बचेगी और व्यापक देशहित में न्याय , प्रेम , सद्भावना और एकजुटता को बढ़ावा देने की गंभीर कोशिश करेगी |     


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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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