Jun 5, 2015

ज़हरीले खाद्य पदार्थों पर फ़ौरन लगे रोक

ज़हरीले खाद्य पदार्थों पर फ़ौरन लगे रोक 
- डॉ . मुहम्मद अहमद 
कहते हैं , हमारे देश में विकसित देशों का हर उत्सर्जित माल बिक जाता है , चाहे वह स्वास्थ्य के लिए कितना ही खतरनाक और जानलेवा हो ! फिर लगता है कि किसी सरकार में इतनी हिम्मत नहीं कि पूंजीपतियों का लोहा ले सके और अपनी जनता को हानिकारक  पदार्थों के सेवन से बचा सके | लेकिन इस दिशा में नाकाम कोशिशें होती रही हैं | जनता पार्टी के केन्द्रीय सत्ताकाल में जब जार्ज फर्नान्डीज उद्योग मंत्री थे , तब उन्होंने दो अमेरिकी कंपनियों - कोकाकोला और आई . बी . एम . पर गिरफ्त की थी , मगर इनका बाल बांका भी नहीं हुआ |
 कोकाकोला ने अपने पेयों का फार्मूला नहीं बताया और कैंसरजनित पेय हम भारतीयों को पिलाती रही , जबकि अमेरिका में इसे अपनी गुणवत्ता सुधारनी पड़ी | वास्तव में अमेरिका में खाद्य मानक संस्थाएँ और उनके नियम इतने कठोर हैं कि कोई कोई कम्पनी इस प्रकार की हरकत के बारे में सोच भी नहीं सकती | 
हमारे देश में स्थिति दूसरी है | यहाँ विदेश से आने वाली कम्पनियाँ हों या भारतीय कम्पनियाँ, मानक-नियम-क़ानून-सुरक्षा आदि के बारे में रत्ती भर भी परवाह नहीं करतीं.| युनियन कार्बाइड गैस रिसाव मामले में हम देख चुके हैं कि हजारों मौतों और लाखों को विकलांग बना देने के बावजूद कम्पनी के कर्ताधर्ता अब तक सुरक्षित हैं , क्योंकि हमारे यहाँ भ्रष्टाचार सिरमौर बना रहता है | भारत में जमकर रिश्वतखोरी होती है, और जनता के स्वास्थ्य से खिलवाड़ जारी रहता है | ताज़ा मामला नेस्ले इंडिया के उत्पाद ख़ासकर ' मैगी ' का है | यह स्विट्ज़रलैंड की नेस्ले कंपनी की अनुषंगी है , जिसे 2014 में ब्रांड इक्विटी रिपोर्ट में भारत का पांचवां विश्वसनीय ब्रांड का दर्जा दिया गया था | 
मगर यह कहना अनुचित होगा कि हाई प्रोफ़ाइल लोग इन उत्पादों को ठीक से नहीं जानते , इसलिए इनकी हिमायत करते हैं ! वास्तव में यह सब जानते - बूझते होता है | दिल्ली समेत कुछ राज्यों में ; मैगी ' को प्रतिबंधित किये जाने एवं मैगी टेस्ट रिपोर्ट में जहर पाए जाने के बावजूद कुछ "पत्रकार" मैगी की तरफदारी कर रहे हैं ! मैगी का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है | झटपट से मैगी तैयार कर के हम खा लेते है और स्वाद भी मिल जाता है और भूख भी मिट जाती है ,लेकिन इसमें उत्तरप्रदेश के कुछ इलाकों में मैगी के सैंपल में कुछ घातक पदार्थ पाया गया है | अतः इस बात का दबाव सरकार पर बढ़ रहा है कि  सबको लुभाने वाले मैगी पर देश भर में प्रतिबन्ध लगाया जाए | 
यह बात भी सच है कि हमारे देश में ' अंतिम विजय ' पूंजीपतियों की ही होती है , फिर देश में  मोदी सरकार भी मौजूद है , जो पूंजीपतियों की हर विघ्न - बाधा की निवारक है | यह बड़ी चिंताजनक बात है कि उत्तर प्रदेश से लिए गए नमूनों में मैगी में तय मात्रा से 17 गुना ज्यादा लेड यानी सीसा पाया गया। पैकेट में जिक्र न होने के बावजूद भी मैगी के मसाले में मोनो सोडियम ग्लूटामेट पाए जाने का आरोप है। आइए जानते हैं कि आखिर तय सीमा से ज्यादा खाने पर सीसा और एमएसजी हमारे लिए कितने ख़तरनाक हैं। खून में सीसे की अधिक मात्रा में जमा होने से कैंसर, दिमागी बीमारी, मिर्गी या फिर किडनी ख़राब हो सकती है। 
कुछ मामलों में इससे मौत भी हो सकती है। लेड बच्चों के दिमागी विकास पर स्थायी असर डाल सकता है। इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी मुंबई में फूड केमिस्ट्री विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ उदय अन्नापुरे के मुताबिक "शरीर में कई मेटल होते हैं, जो खून के प्रवाह के ज़रिये शरीर के किसी भी हिस्से में जा सकते हैं। सीसे के ज्यादा मात्रा में इकठ्ठा होने से सिरदर्द, तनाव या फिर यादाश्त कमज़ोर हो सकती है।" उनका कहना है कि कई पौधों में प्राकृतिक रूप से पाया जाना वाला ग्लूटामेट अमीनो एसिड है। मैगी पर लगे आरोप के मुताबिक , इसे मसाला मेकर में मिलाया गया, लेकिन जानकारी नहीं दी गई। मोनोसोडियम मिलने से ग्लूटामेट में नमक तेज हो जाता है, जिससे नर्वस सिस्टम पर असर हो सकता है, ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है, शरीर के कई हिस्सों में सिहरन या जलन का अनुभव हो सकता है।
. सूत्रों के अनुसार जांच नतीजों के बाद उक्त विभाग ने दिल्ली स्थित भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को लिखित में मैगी का लाइसेंस रद्द करने के लिए कहा है |
देश के विभिन्न राज्यों से मैगी के सैंपल लिए गये हैं और उनकी जाँच करवाई जा रही है | दूसरी ओर मैगी बनाने वाली कंपनी नेस्ले ने इस आरोप पर हैरानी जताई और कहा कि वह मैगी में मोनोसोडियम ग्लूटामेट केमिकल नहीं मिलाते हैं | मैगी में सीसा की मात्रा नगण्य है और निर्धारित 1 फीसदी से भी कम है | आज की यह बड़ी आवश्यकता है कि देश बिक रहे खाद्य सामग्रियों की ठीक से जाँच करवाई जाए और अपमिश्रण की स्थिति में बिना किसी बाह्य दबाव के उन पर रोक लगाई जाए |  
कोका-कोला और पेप्सी में इस्तेमाल होने वाला तत्व की वजह से कैंसर तक हो सकता है। इन पर रोक लगाने की बार - बार मांग की गई है , किन्तु भारत सरकार कोई क़दम नहीं उठाती | अमेरिका में इन कंपनियों ने अपने पेयों को स्वास्थ्य - अनुकूल बना लिया है , पर हमारे देश में पुराना ढर्रा ही चल रहा है | ब्रिटिश टैब्लॉइड ' डेली मेल ' के मुताबिक, अनुसंधानकर्ताओं का मानना है कि कोल्ड ड्रिंक्स में भूरा रंग लाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कलर एजेंट की वजह से हजारों लोगों को कैंसर हो सकता है। 
वॉशिंगटन डीसी के सेंटर फॉर साइंस इन द पब्लिक इंटरेस्ट (सीएसपीआई) ने कहा, 'कोका-कोला, पेप्सी और बाकी चीजों में इस्तेमाल किए जाने वाले दो केमिकल कैंसर पैदा कर सकते हैं और इन्हें बैन किया जाना चाहिए।' 'कोल्ड ड्रिंक्स और बाकी चीजों में भूरा रंग लाने के लिए चीनी को अमोनिया और सल्फाइट के साथ उच्च दबाव और तापमान पर मिलाया जाता है। इस केमिकल रिऐक्शन में दो तत्व 2-एमआई और 4-एमआई बनते हैं। सरकारी स्टडी यह बात पता चली है कि ये तत्व चूहों के फेफड़े, लीवर और थायरॉइड कैंसर का कारण बने हैं।'  अतः इन पेयों पर दुनियाभर में पाबंदी लगनी चाहिए |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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