Jun 10, 2015

मुस्लिम पर्सनल लॉ की हर सूरत में हिफ़ाज़त की जाए

मुस्लिम पर्सनल लॉ की हर सूरत में हिफ़ाज़त की जाए

मुंबई की एक परिवार अदालत ने अमेरिका से वापस भारत आए एक मुस्लिम डाक्टर को दूसरी शादी करने से रोक दिया है | जज स्वाति चौहान ने पिछले दिनों आदेश दिया है कि वह पहली पत्नी के अधिकार और मुआवजा राशि उसे दे, तभी दूसरी शादी करे। उनका कहना है कि पहली पत्नी को उसके अधिकार दिए बिना एक मुस्लिम शख्स को धर्म और कानून दोनों में से कोई भी दूसरी शादी की इजाजत नहीं देता है। कोर्ट ने वर्ली निवासी डॉ. अकबर खान (बदला हुआ नाम) की दूसरी शादी पर उसकी पहली पत्नी सकीना (बदला हुआ नाम) को वैकल्पिक आवास मुहैया कराने तक रोक लगा दी है। 34 साल की सकीना ने अपने 45 साल के पति अकबर के वैवाहिक वेबसाइट पर शादी का विज्ञापन देने के बाद शादी रोकने के लिए अदालत की मदद ली थी। सकीना और अकबर ने 27 मई 2001 को शादी की थी। इसके अलगे महीने ही वे अमेरिका चले गए थे। वहां उनके चार बेटे हुए। उनकी उम्र 4 से लेकर 12 साल की बीच है। सितंबर 2011 में मुंबई आकर किराए के फ्लैट में रहने से पहले ही उनके बीच झगड़ा होने लगा था। सकीना ने इससे पहले परिवार अदालत में अपने तीन बच्चों की कस्टडी के लिए आवेदन किया था और आरोप लगाया था कि अकबर ने उन्हें उससे छीन लिया था। सकीना ने यह भी कहा कि मकान मालिक ने उससे जुलाई 2014 में फ्लैट खाली करने को कहा था। अदालत में अकबर के वकील ने कहा कि उसके मुवक्किल ने सकीना को तलाक दे दिया है और सकीना ने इसे चुनौती भी नहीं दी थी। वकील ने कहा कि वे मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आते हैं, इसलिए उनके मुवक्किल को चार शादी करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। दूसरी ओर सकीना के वकील ने तर्क दिया कि अगर कोई पति अपनी पहली पत्नी के अधिकारों का हनन कर रहा है तो उसे धर्म और कानून के तहत दूसरी शादी करने से रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि चार शादी का विचार 'पवित्र क़ुरआन की गलत व्याख्या है। पहली नज़र में अदालत का उक्त फ़ैसला मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप है | दूसरे सकीना के वकील का यह कहना कि चार शादियों की अवधारणा पवित्र क़ुरआन की गलत व्याख्या है , बेहद निंदनीय और आपत्तिजनक है | वास्तव में शाहबानो मामले और उसके बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप का जो सिलसिला शुरू हुआ , वह मुसलमानों की तमाम आपत्तियों और विरोधों के बावजूद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है ! बार - बार पर्सनल लॉ विरोधी फ़ैसले सामने आ रहे हैं , जो न्यायपालिका की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं | ज्ञातव्य है कि 23 अप्रैल 1985 को सुप्रीमकोर्ट ने महम्मद अहमद खां बनाम शाहबानो बेगम मुक़दमे में जो फ़ैसला सुनाया था और मुसलमानों के विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने संसद द्वारा इसके विरोध में क़ानून बनवाकर इसके क्रियान्वयन पर रोक लगवा दी थी |,अफसोसनाक बात यह है कि ठीक वैसा ही फ़ैसला कई बार सामने आ चुका है | मिसाल के तौर पर गत वर्ष 26 अप्रैल 2014 को शमीम बानो बनाम अशरफ़ खां मुक़दमे की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक मिश्र और जस्टिस विक्रमजीत सेन की खंडपीठ ने अपने फ़ैसले में मुस्लिम महिला को इद्दत [ तलाक़ के बाद तीन महीने तक ] की अवधि पूरी होने के बाद भी पति से गुज़ारा भत्ता लेने का हक़दार ठहराया | 
पीठ ने कहा कि मुस्लिम महिला [ तलाक़ अधिकार संरक्षण ] क़ानून की धारा 3 के तहत गुज़ारा भत्ता देने की व्यवस्था सिर्फ़ इद्दत तक सीमित नहीं है |  देश के मुसलमान "मुस्लिम पर्सनल लॉ अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं |"  यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, महर, तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ और विरासत शामिल है | देखा गया है कि इस तरह केअक्सर फ़ैसले इस्लाम की शिक्षाओं के अनुरूप नहीं होते | इस प्रकार यह मुस्लिम पर्सनल ला में सीधा हस्तक्षेप का विषय बन जाता है | कुछ लोग यह भी कहते हैं कि देश में एक ही नागरिक क़ानून होना चाहिए , जिसका भारतीय संविधान समर्थन करता है | इसके अनुच्छेद 44 [ नीति निर्देशक तत्व ] में समान सिविल कोड की परिकल्पना की गयी है | इसके हवाले से सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को पहले सुझाव दे चुकी है कि पूरे देश में समान सिविल कोड लागू करे | संघ परिवार इसके लिए बहुत लालायित दिखता रहा है , जबकि यह सच्चाई सबको पता है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में इसे लागू कर पाना असंभव है ,  लेकिन वोटों की राजनीति को चमकाने के लिए इसके लिए दुष्प्रयास किए जाते रहे हैं | मदनलाल खुराना जिन्हें भाजपा ने काम निकल जाने के बाद उपेक्षित कर दिया था , जब दिल्ली के मुख्यमंत्री थे , तब उन्होंने इस बाबत एक प्रस्ताव विधानसभा में पारित तक करवा लिया था | मध्यप्रदेश विधानसभा में भी भाजपा के लोगों ने भी ऐसे दुष्प्रयास किए , जो अंततः नाकाम हो गये , क्योंकि ये नाकाम होने ही थे | यह संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों के सर्वथा विपरीत है | संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अंतःकरण और धर्मानुसार अमल करने की आज़ादी देता है | ऐसी ही बात संविधान की प्रस्तावना में कही गई है | संविधान में धाराओं 25 (1) और 26 के अंतर्गत जो बातें कही गई है उनका सार यह है कि हर धार्मिक समुदाय को इसका अधिकार प्राप्त होगा कि अपने धर्म पर चले, तथा अपने तौर पर अपने धार्मिक क्रिया-कलाप अंजाम दे। अतः यह सिर्फ़ मुसलमानों (या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों) का मामला ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधान का भी तक़ाज़ा है कि उसके अंतर्गत देश में समान सिविल कोड लागू न हो। मुसलमानों ने भी समान सिविल कोड को लागू नहीं किया | जब वे लगभग नौ सौ वर्ष देश के शासक रहे , कभी भी उन्होंने हिन्दू या अन्य धर्मानुयायी जनता पर अपना क़ानून नहीं थोपा | अंग्रेज़ों ने लार्ड मैकाले की अध्यक्षता में समिति बनकर भारतीय दंड संहिता , भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता , भारतीय व्यवहार प्रक्रिया संहिता , भारतीय साक्ष्य अधिनियम आदि बहुत - से क़ानून लागू कर दिए , लेकिन समान सिविल कोड की ओर नहीं बढ़े , क्योंकि वे ज़ालिम होने के बावजूद यह जानते थे कि यह किसी भी क़ीमत पर लागू नहीं हो सकता | उन्होंने मुसलमानों के लिए पारिवारिक क़ानून 1937 और अलग से मुस्लिम मैरिज डिज़ुलेशन एक्ट 1939 बनाया | देश के किसी भी ख्यातलब्ध विचारक एवं विद्वान ने समान सिविल कोड का समर्थन नहीं किया है | संविधान निर्माता डॉ . अंबेडकर ने संविधान निर्मात्री सभा में नीति निर्देशक तत्व की धारा 44 में इस बाबत रखे गये प्रावधान पर दक्षिण के कुछ मुस्लिम सदस्यों की आपत्ति का जवाब देते हुए कहा था कि जब तक सब देशवासी इसके लिए राज़ी नहीं होंगे , इसे कदापि लागू नहीं किया जाएगा | देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं . जवाहरलाल नेहरू ने कई बार इसी आशय का मत प्रकट किया था | राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लंबे समय तक कमान संभालने वाले गुरु गोलवलकर जी भी इसके समर्थक है कि देश समान सिविल कोड लागू न हो | 20 अगस्त 1972 को दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने साफ़ कहा था कि देश में समान सिविल कोड अवांछित है | उन्होंने कहा था कि जो लोग समान सिविल कोड की बात करते हैं , वे भारत की ज़रूरत समझते ही नहीं हैं | गुरु जी ने इसी आशय के उद्गार एक इंटरव्यू में व्यक्त किए थे , जो 26 अगस्त 1972 को ' मदरलैंड ' में छपा था | आश्चर्य की बात है कि संघ परिवारी अपने गुरु जी की बात का बार - बार अनादर करते हैं | भाजपा नेताओं द्वारा इसकी ज़रूरत बार - बार बताकर गुरु जी की आत्मा को ठेस पहुंचाई जाती है , यहाँ तक कि भाजपा इसे अपने घोषणापत्र तक में शामिल कर लेती है || देश की अदालतें भी मुस्लिम पर्सनल लॉ को समुचित महत्व नहीं देतीं , जिसके कारण बार - बार समस्या पैदा होती है | एक ओर देश में मौजूद मुस्लिम पर्सनल ला में बहुत - सी ख़ामियां हैं , जिन्हें दूर करने की ज़रूरत है , दूसरी ओर इन खामियों को और नहीं बढ़ाया जाना चाहिए और इस मामले को स्थाई रूप से हल किया जाना चाहिए , ताकि भविष्य में मुस्लिम पर्सनल लॉ का अतिक्रमण न किया जा सके |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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