Jun 17, 2015

भुखमरी और कुपोषण से कब मिलेगी नजात ?

भुखमरी और कुपोषण से कब मिलेगी नजात ?

एक तरफ़ तो देश में खाद्य सुरक्षा क़ानून लागू है , जिसके तहत भुखमरी , कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के लिए सरकार को ज़िम्मेदार माना गया है | मगर लगता हमारे यहाँ यह क़ानून भी सुविधावादी है , लेकिन इसमें बड़ा अंतर यह है कि इसे इच्छानुसार अपनाया जाता है , वह भी कागज़ों पर ! दुनिया में इस समय भूखे लोगों की संख्या लगभग 7,950 लाख है, जिनमें से एक चौथाई भारत में रहते हैं। यह संख्या चीन में कुपोषितों की संख्या से भी ज्यादा है। ये आंकड़े हैं फूड एंड ऐग्रिकल्चरल ऑर्गनाइजेशन (FAO) की रिपोर्ट के, जो पिछले दिनों प्रकाशित हुई है। यह स्थिति तब है , जब वैश्विक भुखमरी सूचकांक (जीएचआई) में 2014 में भारत की स्थिति सुधरी है और यह 55वें स्थान पर आ गया है। रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में 1,946 लाख लोग कुपोषण के शिकार हैं, जो भारत की कुल जनसंख्या के 15.2 फीसदी है। 1990-1992 में भारत में कुपोषितों की तादाद लगभग 2,101 लाख थी। चीन में कुपोषितों की संख्या 1,338 लाख है, जो 2014-16 की चीन की कुल जनसंख्या के 9.3 फीसदी हैं। 1990-92 में चीन में कुपोषितों की संख्या 2,890 लाख थी। भारत 1990-92 से 2014-16 के बीच अपने यहां कुपोषितों की संख्या में 36 फीसदी की कमी लाने में कामयाब रहा। वहीं, चीन ने इतने ही समय में कुपोषितों की तादाद 60.9 फीसदी तक कम कर ली है। रिपोर्ट के मुताबिक, 'भारत में जारी हुए खाद्य वितरण कार्यक्रम के सकारात्मक परिणाम मिले, हालांकि, भारत उच्च आर्थिक विकास दर को उच्च खाद्य खपत में बदलने में नाकाम रहा। अतः समग्र विकास से भूखों को कोई फायदा नहीं हुआ।' हमारे देश का यह खुला सच है कि हमारे यहाँ हर साल लाखों टन अनाज सिर्फ भंडारण के उचित प्रबंध के अभाव में बर्बाद हो जाता है | खाद्य सुरक्षा क़ानून में सस्ते रेट पर चावल , गेहूं और मोटे अनाजों को उपलब्ध कराने की व्यवस्था है | इसके बावजूद भूखे लोगों की तादाद घट नहीं पा रही है ! कितनी बड़ी विडंबना है कि सरकार अनाज को तो सड़ने देती है , दूसरी ओर यह कहती है कि अनाज की कमी है , लिहाज़ा वह गरीब जनता को मुफ़्त में अनाज नहीं उपलब्ध करा सकती | भूखे लोगों तक मुफ़्त अनाज आपूर्ति के सुप्रीमकोर्ट की हिदायत पर बार - बार सरकार यही बात कहकर पल्ला झाड़ लेती है | सरकार जो अनाज आयात करती है , उसे भ्रष्ट जन अमूमन सड़ा ही डालते हैं | चिंता और हैरानी की बात यह भी है कि उचित भंडारण न हो पाने के कारण अनाज के सड़ने की खबरें पिछले कई वर्षों से आती रही हैं, लेकिन इस दिशा में सरकार को कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। एक रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल देश में साढ़े तीन करोड़ टन भंडारण क्षमता की जरूरत है, मगर इसकी कमी के चलते लगभग चालीस फीसद अनाज का रखरखाव सही तरीके से नहीं हो पाता। उसमें अवैज्ञानिक और गैर-व्यावसायिक तरीके से किए गए भंडारण और गोदामों की उपलब्धता में क्षेत्रीय विसंगति के चलते देश में कुल उपज का बीस से तीस फीसद अनाज बर्बाद हो जाता है। यह सच्चाई पहली बार सामने नहीं आई है। खाद्य सुरक्षा क़ानून के आने के बाद यह आशा की जा रही थी कि देश से भुखमरी का खात्मा हो जाएगा , किन्तु व्यवहार में ऐसा नही दीखता | आज भी करोड़ों लोगों को दिन की शरुआत के साथ ही यह सोचना पड़ता है कि आज पूरे दिन पेट भरने की व्यवस्था कैसे होगी ? सुप्रीम कोर्ट की फटकार का भी सरकार पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता | भंडारण में व्यापक खामियों के चलते लाखों टन अनाज सड़ जाने की खबरों के मद्देनजर कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी कि अगर भंडारण का प्रबंध नहीं किया जा पा रहा है तो क्यों नहीं अनाज को गरीबों में मुफ्त बांट दिया जाता। इसके अनुपालन में सरकार मूक - बधिर नज़र आती है | एक आंकड़े के अनुसार , सही रखरखाव के अभाव में पंजाब में पिछले तीन वर्षों के दौरान पंजाब में 16 हज़ार 500 टन अनाज सड गया |

सरकार एक तरफ़ यह दावा करते नहीं थकती कि देश में अनाज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं , फिर भी देश में भूख से मौतों का सिलसिला बरक़रार है | कितनी अजीब बात है , जब सरकार विरोधाभासी बयान देकर यह कहती है कि अनाज की कमी है , जिसकी भरपाई के लिए जीएम तकनीक से अनाज उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाता है ,जबकि जीएम [ जेनेटिकली मोडीफाइड ] जी ई [ जेनेटिकली इंजीनियर्ड ]  तकनीक से पैदा ऐसी फसलों के जोखिम से भरे होने को लेकर कई अध्ययन आ चुके हैं। जीई फसलें डीएनए को पुनर्संयोजित करनेवाली प्रौद्योगिकी ( Recombinant DNA technology) के माध्यम से प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से तैयार किए गए पादप जीव हैं। आनुवांशिकी इंजीनियरिंग (जीई) की अनिश्चितता और अपरिवर्तनीयता ने इस प्रौद्योगिकी पर बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे भी आगे, विभिन्न अध्ययनों ने यह पाया है कि जीई फसलें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं और इससे मानव स्वास्थ्य को संकट की आशंका है। इन सबके परिणामस्वरूप, इस खतरनाक प्रौद्योगिकी को अमल में लाने की आवश्यकता पर दुनिया भर में विवाद खड़ा हो गया है। भारत एवं अन्य बहुत सारे देशों में, पर्यावरण में छोड़े जा रहे जीई या जीएम पौधों-जंतुओं (organism) के विरूद्ध प्रचार के साथ ग्रीनपीस का कृषि पटल पर पदार्पण हुआ। जीई फसलें जिन चीजों का प्रतिनिधित्व करती हैं वे सब हमारी खेती के लिए अनुचित हैं। वे हमारी जैवविविधता के विनाश और हमारे भोजन एवं खेती पर निगमों के बढ़ते नियंत्रण को कायम रखती हैं। करीब छह महीने पहले ब्रिटेन स्थित मेकेनिकल इंजीनियरिंग संस्थान की ओर से जारी एक रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया था कि भारत में मुख्य रूप से भंडारण और ढुलाई सहित आपूर्ति की खामियों के चलते हर साल लगभग दो करोड़ टन गेहूं बर्बाद हो जाता है। जबकि देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिन्हें भरपेट भोजन नहीं मिल पाता या फिर पर्याप्त पोषण के अभाव में वे गंभीर बीमारियों का शिकार होकर जान गंवा देते हैं। हैरानी की बात है कि एक ओर भंडारण के क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया गया, लेकिन स्थानीय जरूरतों के हिसाब से सरकारी पैमाने पर ऐसे प्रबंध करना या फिर इस व्यवस्था का विकेंद्रीकरण करके सामुदायिक सहयोग से इसे संचालित करना जरूरी नहीं समझा गया। इसके अलावा, जरूरत से अधिक भंडारण को लेकर खुद कृषि मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति की आलोचना के बावजूद यह सिलसिला रुका नहीं है। सरकार की लापरवाही से स्थिति दिन - प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है | ऐसे में खाद्य सुरक्षा क़ानून के क्रियान्वयन पर सवालिया निशान लग गया है | सरकार को चाहिए कि इस गंभीर समस्या पर प्राथमिक रूप से ध्यान दे और विगत सरकारों द्वारा की जा रही अनदेखी पर रोक लगाए | 

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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