Jun 30, 2015

ग्रीस से सबक़

ग्रीस से सबक़ 
- डॉ . मुहम्मद अहमद 
ग्रीस संकट काफ़ी इतना गंभीर बन चुका है कि अब तात्कालिक मदद से उसका काम नहीं चलनेवाला | हालत यह है कि विश्व की असंतोषजनक अर्थव्यवस्था के मद्देनजर अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक संस्थाएं थकी - हारी लगती हैं | एक तरह से सबने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं , जिनमें यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) भी शामिल है | इस बैंक से मदद की बड़ी अपेक्षाएं थीं , मगर अब यह भी फूंक - फूंककर क़दम रख रहा है | ग्रीस की अंदरूनी माली हालत इतनी खराब है कि वहां के प्रधानमंत्री एलिक्सिस त्सिप्रास ने पिछले 29 जून को सभी बैंकों को बंद रखने के साथ हफ्ते भर तक बैंकों का कामकाज ठप रखा | 
इसके साथ ही एटीमएम मशीनों से पैसा निकालने निकालने पर भी पाबंदियां लगा दी गईं हैं | खाता धारकों को दिन में 60 यूरो से ज़्यादा निकालने की अनुमति नहीं होगी | लोग बिना पूर्व अनुमति के अपने पैसे को देश के बाहर भी नहीं भेज सकेंगे | ईसीबी ने ग्रीस की बैंकिंग प्रणाली के लिए और आपात सहायता नहीं देने का फ़ैसला करके उसकी आख़िरी उम्मीद पर भी पानी फेर दिया है | अब वह देनदारी को चुकता नहीं कर पाएगा और इस तरह वह दिवालिया हो जाएगा |
ग्रीस और यूरोज़ोन के बीच बातचीत पहले ही विगत 26 जून को विफल हो चुकी है | ग्रीस के प्रधानमन्त्री एलिक्सिस त्सिप्रास के पास कम ही रास्ते बचे थे | ईसीबी की घोषणा के बाद सहज रूप से ग्रीस के बैंक प्रभावित हुए हैं | ये पहले से ही केंद्रीय बैंक के ऊपर निर्भर थे | पिछले कुछ दशकों में अर्जेन्टीना , ब्राजील और अमेरिका के बाद ग्रीस के संकट ने सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपनी जद में ले रखा है | अतः ग्रीस के लोगों की यह आशंका बढ़ गई है कि उन्हें उनके ही पैसे निकालने से रोक दिया जाएगा या फिर उनके उनकी यूरो मुद्रा को ग्रीक की करंसी ड्राक्मा में तब्दील दिया जाएगा , जिसकी कोई कीमत नहीं होगी | एक संकट यह भी है कि ग्रीस में जनमत संग्रह के परिणाम आने तक यूरोप के देश राज़ी नहीं हैं | 
उधर भारतीय रिज़र्व बैक [ आरबीआई ] के गवर्नर रघुराम राजन ने यह कहकर सारी दुनिया को चौंका दिया है कि महामंदी आनेवाली है और हम वैश्विक मंदी की तरफ बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमे केंद्रीय बैंकों द्वारा वैश्विक नियम बनाने के लिए जोर देना चाहिए। उनके अनुसार , जिस तरह की आर्थिक महामंदी का सामना 1930 में करना पड़ा था, फिर दुनिया को उसी तरह के संकट का सामना करना पड़ सकता है , हालाँकि बाद में रिज़र्व बैंक ने कुछ सफ़ाई दी और कहा है कि गवर्नर महोदय के कहने का वह मन्तव्य नहीं था , जो समझा गया | फिर भी रिज़र्व बैंक की सफ़ाई को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष  [ आई एम एफ ] की आपत्ति का नतीजा माना जा रहा है और राजन की बात अपनी जगह मौजूद है | 
पिछले दिनों उन्होंने लंदन में आयोजित बिजनस स्कूल कॉन्फ्रेंस में कहा था कि 'हमें बेहतर हल के लिए नियम को बदलने होंगे। मेरा मानना है कि सेंट्रल बैंक की कार्रवाई में किन बातों की अनुमति दी जानी चाहिए, इसके लिए वैश्विक नियम बनाने पर चर्चा शुरू किए जाने का समय आ गया है।' राजन से जब ब्याज कटौती को लोकर जब सवाल किया तो उन्होंने कहा, 'जहां तक संभव था मैंने रेट कटौती में कड़ा रुख अपनाया । भारत में अभी भी निवेश को बढ़ाने की जरुरत है। मैं इसके लिए प्रयत्नशील हूं। ' बाद में रिजर्व बैंक ने स्पष्टीकरण में कहा है कि एक हलके ने गवर्नर रघुराम राजन की टिप्पणियों को गलत रूप दे दिया और इसे इस तरह प्रस्तुत किया कि राजन ने कहा कि दुनिया के सामने महामंदी का जोखिम है।
 राजन के बयान पर दुनिया भर में खलबली मचने पर अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के अनुसंधान पत्र में राजन के इस दृष्टिकोण को चुनौती दी गयी है कि अकेले सस्ते कर्ज वाली मौद्रिक नीति ही दुनिया के लिए वित्तीय संकट का कारण बन सकती है। केवल मौद्रिक नीति आसान बनाने को ही वित्तीय अस्थिरता के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। 
बीते समय में विश्व के समक्ष मंत्री की बड़ी समस्याएं ‘वित्तीय प्रणाली की स्थिरता की हिफाजत के लिए प्रभावी नियामकीय व्यवस्था की कमी’ के कारण पैदा हुईं। 2007-09 का संकट भी इसी कारण हुआ। ग्रीस संकट यह साफ़ तौर पर बताता है कि दुनिया में सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा | ब्याज के बढ़ते बोझ ने अर्थव्यवस्थाओं को रसातल में जाने के लिए मजबूर कर रखा है | इस विकट परिस्थिति में राजन की आशंका की पुष्टि प्रथम दृष्टया ग्रीस के संकट से होती है | अतः समय रहते महामंदी की चपेट से बचने के लिए ठोस प्रयास किए जाने चाहिए |



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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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