Jun 25, 2015

शराब के जबड़े

शराब के जबड़े 

- डॉ . मुहम्मद अहमद 
नशा एक धीमा जहर है जिसमें दर्दनाक मौत के सिवा कुछ हासिल नहीं होता है,,, कितने ही परिवारो की जिंदगी इस जहर की शिकार होकर घर से बेघर हो गई है तथा न जाने कितनी जिंदगियां मौत के मुहं में समा चुकी हैं और ऩ जाने कितनी जिंदगियां अतिंम सांसे गिन रही हैं | शराब का नशा सबसे अधिक घातक है | इसीलिए हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने शराबबंदी की ओर भी ध्यान दिया और मद्य निषेध विभाग भी बनाया गया | आबकारी विभाग भी अस्तित्व में आया और आरंभिक कुछ समय के बाद यह धड़ल्ले से शराबबंदी का मखौल उड़ाने लगा | सरकारें शराब माफ़िया के आगे झुकती गईं और आबकारी विभाग निरंकुश ढंग से शराब की नई दूकानें खोलने का लाइसेंस बाँटने लगा |
 अब हालत यह है कि इस सूरतेहाल पर सरकार से कुछ ख़ास स्वेच्छिक क़दम की अपेक्षा नहीं की जा सकती , क्योंकि सरकार को नशे के कारोबार से करोडो- अरबों का मुनाफा होता है और शराब माफ़िया से राजनेताओं की निरंतर बंदरबांट चलती रहती है | जनस्वास्थ्य की किसी को चिंता नहीं है | योग से शराबबंदी होने से रहीं |
अतः इस जहर को रोकने के लिए जनता को ही पहल करनी होगी , कयोंकि यह एक बड़ी समस्या बनी हुई है | अगर जनता नशा मुक्ति के पक्ष में एक जुट हो जाए तो ये मौत की फैक्टरियां अपने आप बंद हो जायेंगी, और सरकार को मजबूर होकर उन पर बैन लगाना पड़ेगा | वास्तव में शराबनोशी ने भारतीयों की बड़ी संख्या का जीवन दुष्कर बना डाला है | 
कुछ समय पहले एक अंग्रेज़ी दैनिक में शराब के इस्तेमाल पर एक सर्वेक्षणात्मक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें बताया गया कि भारतीय समाज के विशेषकर अभिजात्य वर्ग के युवक और युवतियां शराब के प्रति तेज़ी से आकर्षित हो रहे हैं । यह वर्ग फैशन के तौर पर भी शराब का इस्तेमाल करता है । कहने का मतलब यह कि इस ज़हरीले पदार्थ का इस्तेमाल पढ़े-लिखे मूर्ख तो पहले से करते रहे हैं, यह दुर्व्यसन अपनी पीढ़ी की ओर भी स्थानांतरित कर रहे हैं । इसकी बुरी आदत और लत ने ख़ासकर कमज़ोर वर्ग के लोगों की आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य पर कल्पनातीत कुप्रभाव डाला है | 
यह भी सच है कि पुरातनकाल से ही कुछ लोगों की सामाजिक व्यवस्था और जीवनशैली में शराब का प्रवेश था , जिसे पूंजीपतियों ने अपनी धन बढ़ाऊ घिनौनी मानसिकता के फेर में हवा दी है | ये लोग अपने देवताओं और पितरों को संतुष्ट करने के लिए भी हर त्योहार पर , जन्म और विवाह के अवसरों पर शराब का इस्तेमाल अनिवार्य रूप से करते हैं | दैनिक दिनचर्या में भी इस्तेमाल करते हैं | फिर न तो शराब के उपयोग की मात्रा की कोई सीमा है और न ही उनके समाज के किसी सदस्य पर इसके सेवन पर रोक है ! हालत यह है कि शराब पीनेवालों का शरीर और मन - मस्तिष्क सभी अपाहिज हो चुके हैं ! नतीजा यह है कि अच्छे और बुरे की पहचान करने के योग्य नहीं रहे और न ही वे किसी मामले में सही निर्णय कर सकते हैं |  
क़ुरआन में शराब के लिए ‘‘ख़म्र’’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, जिसकी व्याख्या हज़रत उमर [ रज़ि॰] ने इन शब्दों में की है, ‘‘ख़म्र उस चीज़ को कहते हैं जो बुद्धि पर परदा डाल दे ।’’ शराब मन-मस्तिष्क को सर्वाधिक प्रभावित करती है और बुद्धि को नष्ट कर डालती है । डॉ॰ ई॰ मैक्डोवेल कासग्रेव [ एम॰ डी .] केअनुसार,‘‘अल्कोहल मस्तिष्क को नष्ट कर देती है ।’’.
इस्लाम ने हर प्रकार की शराब ही को हराम नहीं किया है, बल्कि इसके  अन्तर्गत हर वह चीज़ आ जाती है जो नशावर हो और मनुष्य की सोचने-समझने की शक्ति को नष्ट करे या उसे क्षति पहुंचाए ।
इस अवसर पर इस बात को भी ध्यान में रखने की ज़रूरत है कि मनुष्य का जिस चीज़ के कारण समस्त प्राणियों में विशिष्ट और प्रतिष्ठित एवं केन्द्रीय स्थान दिया गया है, वह वास्तव में उसकी सोचने-समझने और सत्य-असत्य और भले-बुरे में अन्तर करने की क्षमता है । अब यह स्वाभाविक बात है कि जिस चीज़ या काम से मनुष्य की इस क्षमता और योग्यता को आघात पहुंचा हो या उसके पूर्ण रूप से क्रियाशील होने में बाधा उत्पन्न होती हो, उसको मनुष्य का निकृष्टतम शत्रु समझा जाए । शराब चूंकि मस्तिष्क को स्वाभाविक रूप से कार्य करने में रुकावट डालती है और उसकी तर्कशक्ति को शिथिल करके मनुष्य को मानवता से ही वंचित कर देती है, इसलिए उसे मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु घोषित करना बिलकुल उचित ही है ।
क़ुरआन मजीद में शराब के विषय में जो कुछ कहा गया है उसका स्पष्टीकरण अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद [ सल्ल॰ ] के बहुत से कथनों से भी होता है । आपने कहा है , ‘प्रत्येक मादक चीज़ ‘ख़म्र’ है और प्रत्येक मादक चीज़ हराम है ।’ ‘वह हर पेय जो नशा पैदा करे, हराम है और मैं हर मादक चीज़ से वर्जित करता हूं ।’

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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