Jun 24, 2015

विकास - संपन्नता के दावों की सच्चाई

विकास - संपन्नता के दावों की सच्चाई 
कहते हैं , हमारा देश तरक्की कर रहा है और संपन्नता की नित नई सीढियाँ चढ़ रहा है | लोगों का जीवन - स्तर ऊपर उठाने के लिए अनेक प्रकार की सरकारी योजनाएं चल रही हैं | प्रधानमंत्री की कई बीमा योजनाएं और जनधन योजना मौजूद है , लेकिन इनका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है | जिस देश में एक कटोरी दाल के लाले पड़े हों , भुखमरी और आत्महत्या जैसी स्थितियां बार - बार समाज की नियति बन जाती हों , उस देश में ' देश तरक्की कर रहा है ' और ' बुरे दिन बीते रे भैया ' जैसे जुमले आम जन पर फब्ती कसने से कम नहीं हैं | ' गरीबी हटाओ ' का नारा दशकों से सुनते आ रहे हैं , जिसके शब्द तो बदलते रहे , पर केन्द्रीय भाव एक ही रहता है | मगर आश्चर्य है , कभी गरीबी नहीं हटी , न ही कम हुई बल्कि गरीबी बढती ही जा रही है | इससे उलट अमीरी बढ़ी , नये - नये करोड़पति , अरबपति बने | हमारे देश की गरीबी बड़ी मर्मान्तक है | हाल की एक घटना देखिए , जो यह बताती है कि किसी की अंतिम इच्छा एक कटोरी दाल हो सकती है। कैसे कोई पूरी उम्र एक कटोरी दाल के लिए तरसता रह सकता है। ये कैसे हो सकता है कि एक आदमी जब मौत के निकट हो तो उसका परिवार दाल के लिए पड़ोसियों के घर दौड़ रहा हो। पूरी उम्र वह औरत एक कटोरी दाल के लिए तरसती रही। अरहर, मसूर, चना, मूंग या उड़द का विकल्प नहीं था उसके पास। जब उसने गरीबी से हारकर जहर खा लिया तो अपने अपाहिज पति से कहा अब तो जा रही हूं। आखिरी इच्छा है मेरी, जाते हुए दाल तो चखा दो। एक मरती हुई औरत अपनी उखड़ती हुई सांसों के साथ आखिरी ख़्वाहिश के तौर पर एक कटोरी दाल मांग रही थी। उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा, तहसील तरबगंज के गांव अकौनी में ऋतु बस इस दुनिया को छोड़ने से पहले दाल का स्वाद चख लेना चाहती थी। अपनी पत्नी की इस इच्छा के सामने बहुत बेचारा था उसका पति। क्‍योंकि घर में दाल नहीं थी इसलिए पड़ोसी के आगे कटोरी फैलानी पड़ी। तब जाकर वह अपनी पत्नी के लिए एक कटोरी दाल का इन्तिज़ाम कर पाया | यह भी एक बिडंबना ही है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में दाल की कीमतें ही अधिक बढ़ी हैं |
खाद्य मंत्रालय की प्राइस मॉनिटरिंग सेल के पास मौजूद आंकड़ों के मुताबिक, 26 मई 2014 से 22 मई 2015 के बीच दिल्ली में उड़द दाल 71 रुपये प्रति किलो से बढ़ कर 109 प्रति किलो यानी 54% महंगी हो गई। यही हाल अरहर की कीमतों में भी दिखा। अरहर दाल पिछले साल 26 मई 2014 को 75 प्रति किलो थी, जो 22 मई 2015 को बढ़ कर 108 रूपये प्रति किलो हो गई, यानी 44% की बढ़ोत्तरी। चना दाल पिछले एक साल में 50 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 68 प्रति किलो यानी 36% महंगी हुई और मसूर दाल इस दौरान 70 प्रति किलो से 94 प्रति किलो यानी 35% महंगी हुई | अब दाल व्यापारियों की आशंका है कि आने वाले दिनों में दाल की क़ीमतें और बढ़ेंगी | अगर ऐसा हुआ और सरकार कारगर क़दम उठाने में नाकाम रही , तो आम जन का जीवन और दूभर हो जाएगा और एक कटोरी दाल के लिए उसे दूसरों के आगे बार - बार हाथ पसारने के लिए बाध्य होना पड़ेगा एवं ख़ाली पड़े जनधन खाते उसकी भूख नहीं मिटा पायेंगे | इन खातों में जो रक़म है , वह भी तो मध्य वर्ग की है ... गरीबों का कोई पुरसानेहाल नहीं है ! 
ताज़ा सरकारी  आंकड़ों के मुताबिक भारत में पांच साल तक की उम्र के 45 फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। इस उम्र के 48 फीसद बच्चों का विकास उनकी उम्र के हिसाब से बेहद कम पाया गया और 25 फीसद से भी अधिक बच्चों की स्थिति बेहद बुरी पाई गई। एक चिंतनीय बात जो इन आंकड़ों में सामने आई वह यह है कि इन कुपोषित और बेहद कमजोर हालत वाले बच्चों में ज्यादातर संख्या लड़कियों की है। परिवार में लड़कों को अच्छा पौष्टिक खाना देने वाले ज्यादातर परिवार लड़कियों को वही पौष्टिक खाना नहीं देते। मेडिसिन सेंस फ्रंटियर्स इंडिया नाम की संस्था के मेडिकल एक्टिविटी मैनेजर जिया उल हक़ ने बताया कि पांच महीने के एक स्वस्थ बच्चे का आदर्श वजन कम-से-कम 5 किलो होना चाहिए, लेकिन उनके पास ज्यादातर ऐसे बच्चे आते हैं जिनका वजन 2.5 साल की उम्र में भी महज 5 किलो होता है। उन्होंने बताया कि उनके पास आने वाले कुपोषित बच्चों में लड़कियों की तादाद सबसे ज्यादा होती है। संयुक्त राष्ट्र के एक आंकड़े के अनुसार , कुपोषण से मरने वाले बच्चों की सालाना तादाद 30 लाख है | कुपोषण के कारण इन बच्चों के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद कम होती है। आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण का स्तर लड़कों से कई गुना ज्यादा लड़कियों में पाया जाता है। एमएसएफ इंडिया द्वारा फरवरी 2009 से सितंबर 2011 के बीच कराए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि संस्था के दरभंगा केंद्र पर इलाज के लिए आए 8000 बच्चों में तकरीबन 62 फीसदी संख्या लड़कियों की थी। यह बात इस लिहाज से भी चौंकाने वाली है कि दरभंगा जिले की कुल आबादी में पांच साल के कम उम्र के बच्चों की कुल तादाद में लड़कियों की संख्या केवल 47 फीसदी ही है। ज़ाहिर है ,इस विषम और विकट स्थिति से उबरने की दिशा में हमें अभी बहुत कुछ करना है , जिसकी ओर सरकार को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए | राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सतही प्रयास सदैव निरर्थक और असफल ही होंगे |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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