May 10, 2015

शराब करे ख़राब

शराब करे ख़राब 
आजकल बलात्कार की जितनी घटनाएं घट रही है हैं , उनके मूल कारणों में एक बड़ा कारण शराब का सेवन है . वास्तव में शराब बीमारियों की जननी है । मेडिकल साइंस ने इधर जाकर इसकी पुष्टि की है कि इसके शरीर पर बहुत घातक प्रभाव पड़ते हैं । सम्राट जार्ज के पारिवारिक डॉक्टर सर फ्रेडरिक स्टीक्स वार्ट का कहना है, ‘‘शराब शरीर की पची हुई शक्तियों को भी उत्तेजित करके  काम में लगा देती है, फिर  उसके ख़र्च हो जाने पर शरीर काम के  लायक़ नहीं रहता ।’’ इसी प्रकार सर एंड्रू क्लार्क वार्ट [ एम॰डी॰] का कथन है, ‘‘शरीर को अल्कोहल से कभी लाभ नहीं हो सकता ।’’
इस्लाम की सद्क्रान्तियों में से एक है शराब और मादक पदार्थों के  सेवन से मानवता को निजात दिलाना । अल्लाह के  रसूल हज़रत मुहम्मद [ सल्ल॰] के समय  में अरब समाज इतना पतित था कि जीवन में भोग-विलास  की जो भी सामग्री प्राप्त हो सकती थी उससे आनन्द लेना और आज़ादी के साथ शराब पीना लोगों की दिनचर्या में शामिल हो गयी थी । लेकिन उन पर इस्लामी शिक्षाओं का इतना ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा कि शराब पीना बिलकुल बंद कर दिया और जब क़ुरआन की ये आयतें अवतरित हुईं, तो जिन लोगों के पास जो कुछ  शराब थी, उसे मदीना की गलियों में बहा दी -
‘‘ऐ ईमान लाने वालो ! यह शराब, जुआ और ये थान एवं पांसे शैतान के  गंदे कामों में से है । अतः इनसे बचो ताकि तुम सफल हो सको । शैतान तो यही चाहता है कि शराब और जुए के द्वारा तुम्हारे बीच वैमनस्य व द्वेष पैदा कर दे और तुम्हें अल्लाह की याद और नमाज़ से रोक दे । फिर क्या तुम बाज़ आ जाओगे ? अल्लाह का आदेश मानो और रसूल का आदेश मानो और [ इन चीज़ों से ] बचते रहो । यदि तुमने [ हुक्म मानने से ] मुंह मोड़ा, तो जान लो कि हमारे रसूल पर केवल स्पष्ट रूप से [ संदेश ] पहुंचा देने की ही ज़िम्मेदारी है ।’’   [ क़ुरआन , 5: 90-92 ]

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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