May 19, 2015

धार्मिक भेदभाव क्यों ?

धार्मिक भेदभाव क्यों ?
क्या इस वक्त पूरी दुनिया तंगनज़री की चपेट में है ? कुछ घटनाओं से ऐसा ही लगता है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इन्सानों में वांछित उदारता और सहिष्णुता के गुणों का घोर अभाव हो चला है ! अभी कुछ ही दिन पहले मानवाधिकार और मानव स्वतंत्रता के अलमबरदार समझे जानेवाले देश अमेरिका में सिख शिक्षकों पर पगड़ी सहित धार्मिक परिधान पहनने पर पाबंदी लगा दी गई | अमेरिकी सरकार के इस क़दम से अमेरिका में जारी नस्ली विवाद को नया रंग मिला है , जो हर लिहाज़ से निंदनीय है | सारी दुनिया के सिखों ने अमेरिकी सरकार के उस कानून की निंदा की है जो सिख समुदाय केशिक्षकों पर पब्लिक स्कूलों में पगड़ी सहित ‘धार्मिक परिधान’ पहनने पर बंदिशें लगाता है। ओरेगन की विधायिका में पारित यह विधेयक गवर्नर के पास मंजूरी के लिए भेजा गया है। ओरेगनऑनलाइव ऑनलाइन ने कहा है कि विधेयक के अनुसार शिक्षा अधिकारी और स्कूल कानून का उल्लंघन नहीं करेंगे, अगर वे ‘किसी शिक्षक को बतौर अध्यापक धार्मिक परिधान पहनने से रोकेंगे।’ असल में ओरेगॉन में पारित यह विधेयक कार्यस्थल पर धार्मिक आजादी को व्यापकता देने के लिए लाया गया लेकिन इसने सिख समुदाय में विरोध को जन्म दे दिया है क्योंकि विधेयक में समान तरह के अधिकारों से स्कूलों को अलग रखा गया है। ‘ओरगॉन वर्कप्लेस रिलीजन फ्रीडम एक्ट’ शीर्षक वाला विधेयक कामकाजियों को तब तक धार्मिक आजादी की अनुमति देता है जब तक उनकी गतिविधि,परिवेश या अन्य धार्मिक रीतियाँ नियोक्ता के लिए दिक्कतें खड़ी न करें। इस पर विवाद बढ़ता ही जा रहा है | इसी बीच अब भारत में भी धार्मिक भेदभाव का ताज़ा मामला प्रकाश में आया है | लखनऊ के एक आईसीएसई स्कूल के खिलाफ भेदभाव बरतने की जांच का आदेश दिया गया है। नौवीं क्लास की एक छात्रा को क्लास में इसलिए नहीं आने दिया गया , क्योंकि वह हिजाब पहनकर पहुंची थी। सेंट जोसेफ इंटर कॉलेज के प्रबंध निदेशक अनिल अग्रवाल ने कहा कि स्कूल का अपना ड्रेस कोड है। 
उन्होंने कहा कि यदि कोई मजहबी ड्रेस पहनना चाहता या चाहती है तो उसे मदरसे या उसी तरह के किसी स्कूल में दाख़िला लेना चाहिए। जिलाधिकारी राज शेखर ने इस मामले में जांच का आदेश दिया है। इन्होंने इस मामले में अतिरिक्त जिलाधिकारी और ज़िला विद्यालय निरीक्षक को 19 मई तक रिपोर्ट सौंपने को कहा है। जब लड़की को हिजाब के कारण क्लास में जाने नहीं दिया गया , तो उसकी मां ने इस मामले में जिलाधिकारी को चिट्ठी लिखी थी। इसके बाद जिलाधिकारी ने इस मामले में जांच का आदेश दिया। गत 15 मई को स्कूल ने कहा कि यदि फरहीन को हिजाब में स्कूल आने की अनुमति दी जाती तो यह वाजिब नहीं होता क्योंकि इसके बाद भविष्य में इसे लेकर और गतिरोध पैदा होने की आशंका रहती। फरहीन के परिवार वालों ने स्कूल के इस कदम के बाद वहां नहीं पढ़ाने का फैसला किया है। ये फरहीन के लिए शहर में कोई दूसरा स्कूल देख रहे हैं। जिलाधिकारी को भेजे अपने पत्र में फरहीन की मां फातिमा वकार ने कहा कि मेरी बेटी का सेंट जोसेफ इंटर कॉलेज में दाख़िला सभी मानदंडों को पूरा करने का बाद हुआ था। फातिमा लखनऊ में ठाकुरगंज इलाके में रहती हैं। विगत सात मई को फरहीन को क्लास में बैठने से इसलिए रोक दिया गया क्योंकि वह हिजाब पहन कर आई थी। स्कूल ने दो टूक कहा कि आप स्कूल हिजाब पहन कर नहीं आ सकतीं। लेकिन मां फातिमा वक़ार का कहना है कि जब मेरी बेटी दाख़िला  लेने गई थी तब भी हिजाब पहनकर ही गई थी। उन्होंने कहा कि दाख़िले के फार्म पर फहरीन की तस्वीर भी स्कार्फ के साथ थी। फरहीन के जीजा शादाब वहीद ने कहा कि उनके ससुर की मौत दो साल पहले हो गई थी। तब फरहीन का दाख़िला भी नहीं हुआ था। दाख़िले के दौरान इंटरव्यू प्रिंसिपल ने ही लिया था और तब हिजाब को लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। वहीद ने कहा, '6 मई को फीस जमा करने का बाद दाख़िला लिया गया था। जब वह सात मई को स्कूल गई तो उसे स्कार्फ हटाने का कहा गया। इसके जवाब में उसने कहा कि वह नहीं हटा सकती क्योंकि वह धार्मिक परिवार से है। इसके बाद उसे क्लास खत्म होने तक लाइब्रेरी में भेज दिया गया। 8 मई को भी ऐसा ही हुआ।' इस प्रकार की घटनाएं बहुत ही निंदनीय हैं | इन पर रोक लगाना ही समाज और देश के हित में ही नहीं बल्कि विश्व शांति के लिए बहुत आवश्यक है |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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