Apr 7, 2015

गाय पर सियासत क्यों ? हटाई जाए पाबंदी !

गाय पर सियासत क्यों ? हटाई जाए पाबंदी !

प्रेस कौंसिल के पूर्व अध्यक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू अक्सर सुर्ख़ियों में रहते हैं | उनके बयान विचारणीय भी होते हैं और चिंतनशील भी | काटजू ने  गत 5 अप्रैल को इस तरह के किसी भी प्रतिबंध को लोकतंत्र के खिलाफ करार दिया। वे यह मानते हैं कि गोहत्या पर प्रतिबन्ध की मांग केवल राजनीतिक है। काटजू ने गृहमंत्री राजनाथ के बयान का जिक्र करते हुए अपने ब्लॉग में लिखा है कि वे खुद भी गोमांस खाते हैं , कई बार खा चुके हैं और खाते रहेंगे | इसमें कुछ भी गलत नहीं है। उल्लेखनीय है कि केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कहा था कि उनकी सरकार गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए आम सहमति बनाने का प्रयास करेगी। हाल में महाराष्ट्र और हरियाणा में गोमांस पर प्रतिबंध लगाया गया था। मार्कंडेय काटजू ने गोहत्या पर प्रतिबन्ध के विरोध में पांच तर्क दिए हैं -.1-मुझे गोमांस खाने में कुछ भी गलत नहीं दिखता है। दुनिया में अधिकतर लोग गोमांस खाते हैं। क्या वे पापी लोग हैं? 2-गोमांस सस्ते प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। भारत में कई लोग उदाहरण के लिए उत्तर-पूर्वी राज्यों- नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा और दक्षिणी राज्य केरल, जहां गोमांस की बिक्री पर प्रतिबन्ध नहीं है, इसे खाते हैं। गोमांस की बिक्री पर रोक नहीं है। 3-मैंने भी कुछ एक बार गोमांस खाया है। मैं अपनी पत्नी और रिश्तेदारों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए सामान्यत: गोमांस नहीं खाता हूं। लेकिन अगर मौका मिला, तो मैं इसे जरूर खाऊंगा। मैं किसी को गोमांस खाने के लिए विवश नहीं कर रहा हूं, लेकिन कोई मुझे इससे कैसे रोक सकता है? एक लोकतांत्रिक देश में खाने की आजादी होनी चाहिए। 4-इस तरह के प्रतिबन्ध से दुनिया को हम पर हंसने का मौका मिलता है, क्योंकि इससे हमारी सामंती सोच का पता चलता है। 5-जो लोग गोहत्या को लेकर चिल्ला रहे हैं, वे उन हजारों गायों की जरा भी फिक्र नहीं करते, जिन्हें ठीक से खाना नहीं मिलता है। जब गायें बूढ़ी हो जाती हैं या किसी कारण से दूध देने के लायक नहीं रहती हैं, तो ये लोग उन्हें अक्सर घरों से बाहर निकाल लेते हैं। मैंने गायों को कूड़ा-कचरा खाते देखा है। मैंने गायों की इतनी दुर्दशा देखी है कि उनकी पसलियां तक नजंर आती हैं। क्या यह गोहत्या नहीं है? लेकिन कोई इस बारे में कुछ नहीं कहता। इसी बीच अदालत ने इस मामले में नई टिप्पणी की है | पिछले दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से पशु संरक्षण क़ानून पर जवाब मांगा है। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि क़ानून में सिर्फ गाय और बैल के वध पर रोक और इनके मांस को पास रखने, खाने पर ही रोक लगाने के पीछे क्या आधार है और इस प्रतिबंध में अन्य पशुओं को क्यों शामिल नहीं किया गया। जस्टिस वी एम कनाडे और ए आर जोशी उन याचिकाओं की सुनवाई कर रहे थे जिनमें महाराष्ट्र पशु संरक्षण (संशोधन) अधनियम की धारा 5 (डी) को चुनौती दी गई है। इस धारा में गाय, बैल जैसे पशुओं के वध, मांस पास रखने और खाने पर प्रतिबंध लगाया गया है।याचिकाओं में मांग की गई है कि अगर इन पशुओं का वध महाराष्ट्र से बाहर होता है तो उनके मांस को राज्य में लाने की अनुमति दी जानी चाहिए। बेंच ने सवाल किया कि राज्य में सिर्फ गाय, बैलों के वध पर ही रोक क्यों लगाई गई? बकरी जैसे दूसरे पशुओं के बारे में क्या? इस पर एडवोकेट जनरल सुनील मनोहर ने कहा कि सरकार इस पर विचार कर रही है। सुनील मनोहर ने कहा, “ये सिर्फ शुरुआत है (गाय, बैल पर प्रतिबंध)। हम दूसरे पशुओं के वध पर रोक पर भी विचार कर सकते हैं। फिलहाल सरकार ने गाय, बैलों के संरक्षण को ज़रूरी समझा।” बाम्बे हाईकोर्ट इस मामले में दाखिल कई याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी | महाराष्ट्र में गोमांस पर लगे प्रतिबन्ध के खिलाफ कई लोगों ने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका डाल रखी है। हिंदू धर्म से ताल्लुक रखने वाले दो याचिकाकर्ताओं ने महाराष्ट्र पशु संरक्षण (संशोधन) अधनियम की धारा 5 (डी) को चुनौती दी है। गोमांस व्यापारियों ने भी कोर्ट से राहत की याचिका पेश की है। इस एक्ट के तहत गाय को मारना या उसका मांस खाना प्रतिबंधित है। एडवोकेट विशाल सेठ और छात्रा शाइना सेन ने हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में इसे मूल अधिकारों का उल्लंघन बताया है। याचिका में कहा गया है,'हम हिंदू हैं और गोमांस खाते हैं। यह हमारे भोजन का हिस्सा है और हमारे लिए पोषण का स्रोत है | गोमांस पर प्रतिबन्ध लगाना और इसे बेचने को अपराध बनाना नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन है।' एक याचिका कहती है कि यह प्रतिबन्ध अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की गुणवत्ता के अधिकार तो उल्लंघन करता ही है साथ ही अनुच्छेद 29 का भी उल्लंघन करता है जिसके तहत संविधान में अल्पसंख्यकों के साथ नस्ल, भाषा, धर्म या संस्कृति के आधार पर भेदभाव अपराध है। इस एक्ट के तहत गोमांस बेचते पकड़े जाने पर पांच साल तक की कैद और 10 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है।
यह सच है कि देश की अर्थव्यवस्था गोश्त और चमड़े के कारोबार पर भी निर्भर है | पशुओं को सिर्फ गोमांस खाने वालों के लिए ही नहीं मारा जाता, बल्कि दवा उद्योग की जरूरतों के लिए भी ऐसा किया जाता है। दवाओं के कैप्सूल, विटामिन की दवाओं और चिकन के चारे में इस्तेमाल होने वाले जेलेटिन को जानवर की हड्डियों और चमड़े की प्रोसेसिंग से बनाया जाता है। एक फार्मा कंपनी के सीनियर ऐग्जिक्युटिव के अनुसार , 'किसी न किसी रूप में हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में गोवंश मांस कन्ज्यूम करते ही हैं।' इंडिया में ज्यादातर जेलेटिन मेकर्स का कहना है कि वे इसे बनाने में भैंस की हड्डियों का उपयोग करते हैं, लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा में गोवध विरोधी कानूनों को देखते हुए कंपनियों को आने वाले दिनों में परेशान किए जाने का डर सता रहा है। केरल की निट्टा जेलेटिन इंडिया लिमिटेड के एमडी सजीव मेनन ने कहा, 'हम भैंस की हड्डियों का इस्तेमाल करते हैं। इसकी पहचान के लिए हमारे पास एक सिस्टम है। मसला यह है कि जो लोग हमारे पास हड्डियां भेजते हैं, वे नंगी आंख से देखकर यह तय नहीं कर सकते कि वे भैंसों की हड्डियां हैं या गायों की। अगर किसी ने बवाल खड़ा कर दिया तो हमारी इंडस्ट्री प्रभावित होगी।' यह कंपनी केरल सरकार और जापान की निट्टा लिमिटेड का संयुक्त उपक्रम है।कंसल्टिंग फर्म ग्लोबल ऐग्री सिस्टम के अनुसार, भारत में सालाना करीब 21 लाख टन कैटल बोन जेनरेट होती है। इसके दम पर भारत जेलेटिन का प्रमुख निर्यातक बना हुआ है। निट्टा के कारखाने गुजरात में हैं। गुजरात जेलेटिन बनाने का प्रमुख केंद्र है। इंडिया में 5,000 करोड़ रुपये की कैप्सूल इंडस्ट्री बड़ी मात्रा में जेलेटिन खरीदती है। अस्थमा के इलाज में काम आने वाली कुछ दवाएं कैप्सूल के जरिये ही दी जाती हैं। कंपनियों का कहना है कि कैपसूल का उपयोग आयुर्वेद ड्रग मेकर्स भी करते हैं। इंडिया में कैपसूल बनाने वाली एक बड़ी कंपनी के एक सीनियर ऐग्जिक्युटिव ने कहा, 'इस प्रतिबंध का सबसे बड़ा झटका उन लोगों को लगेगा, जो हड्डियां इकट्ठा करते हैं। हम तो जेलेटिन इंपोर्ट भी कर सकते हैं, लेकिन उनके लिए यह रोजी-रोटी का मसला है।' उन्होंने कहा कि रोटावायरस जैसी कुछ वैक्सींस और बड़े ऑपरेशन के दौरान खून का थक्का बनने से रोकने में काम आने वाली थ्रॉम्बिन को गाय के भ्रूण से तैयार किए गए सीरम से बनाया जाता है। इस प्रतिबंध से चमड़ा  उद्योग पर भी अस्तित्व का संकट मंडराने लगा है | इस उद्योग में लगे लोगों की आजीविका छिन जाने का भी सता रहा है | जानकारों का मानना है कि इससे चमड़े की खाल की कीमत बढ़ जाएगी जो अप्रत्यक्ष रूप से चीनी प्रॉडक्ट्स को फायदा पहुंचाएगा। लोगों का रुझान चीन के सस्ते प्रॉडक्ट्स की ओर हो जाएगा। महाराष्ट्र में गाय, बैल और बछड़ों को मारने पर लगे व्यापाक प्रतिबंध के कारण पहले से ही अस्तित्व संकट से जूझ रहे कोल्हापुर के लेदर मार्केट की हालत और दयनीय होने का खतरा गहरा गया है। कोल्हापुरी के नाम से मशहूर लेदर फुटवेअर के निर्माताओं पर संकट मंडराने लगा है। पिछले दशक से सामाजिक कार्यकर्ता, शैक्षणिक संस्थान, राजनीतिज्ञ और प्रशासक दम तोड़ रहे इस उद्योग में नई जान डालने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन प्रतिबंध से उन सबके प्रयासों पर पानी फिर सकता है। उल्लेखनीय है कि पिछले साल लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोल्हापुर के चमड़ा करोबारियों के प्रति सहानुभूति प्रकट की थी। उन्होंने कहा था, 'आज पूरे देश को कोल्हापुर की चप्पल की जरूरत है, ताकि पूरा देश तेज गति से चले।' लेकिन, उनकी ही सरकार के दौरान इस तरह का प्रतिबंध लग गया है | राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के स्थानीय नेता धनंजय महादिक ने भी इस मामले से राजनीतिक लाभ उठाते हुआ कहा कि वे स्थानीय उद्योग को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। इस कानून का विरोध करते हुए उन्होंने कहा, 'हजारों लोगों की आजीविका खतरे में पड़ गई है। इस कानून में उनकी आजीविका और भविष्य पर गौर नहीं किया गया है। चमड़ा उद्योग के अनुमान के मुताबिक, हर साल पूरे राज्य में करीब तीन लाख बछड़ों को काटा जाता है और उनकी खाल को चमड़े के सामान तैयार करने में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन, प्रतिबंध होने के कारण खाल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। अतः समाज और देशहित में इस बात की जरूरत है कि गोहत्या हत्या विरोधी क़ानून को तत्काल खत्म किया जाए |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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