Apr 4, 2015

विधवाओं की बदहाली का ज़िम्मेदार कौन ?

विधवाओं की बदहाली का ज़िम्मेदार कौन

हमारे देश की यह भी बौद्धिक विडंबना है कि बृहत्तर समाज की महिलाओं की बदहाली की जानबूझकर अनदेखी करके मुस्लिम महिलाओं की ओर लक्ष्य करके बहसें की जाती हैं और जहाँ पर असली समस्या मौजूद है उसकी ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता | विधवाओं की समस्या ऐसी ही है | 2007-08 के बजट में विधवा महिलाओं की वैधव्‍य अवस्‍था को समाप्‍त करने की दृष्टि से एक योजना शुरू की गयी थी | योजनान्‍तर्गत, वर्तमान पेंशन नियमों में हकदार विधवा महिला यदि शादी करती है तो उसे शादी के मौके पर राज्‍य सरकार की ओर से उपहार स्‍वरूप 15,000 रुपये देने का प्रावधान है। 
इस हेतु आवेदिका को निर्धारित प्रार्थना पत्र भरकर विवाह के एक माह बाद तक सम्‍बन्धित ज़िले के ज़िला अधिकारी, सामाजिक न्‍याय एवं अधिकारिता विभाग को प्रस्‍तुत करना पड़ता था , लेकिन यह योजना भी नाकाम हो हो गयी एवं भ्रष्टाचार के हत्थे चढ़ गयी | भाजपा सांसद हेमा मालिनी ने गत 15 सितंबर को कहा है कि बंगाल और बिहार की विधवाओं को वृंदावन में आकर भीड़ नहीं बढ़ानी चाहिए। इस टिप्पणी को संवेदनहीन मानते हुए हेमा मालिनी की तीखी आलोचना हो रही है। संवेदनशीलता की हदों को पार करते हुए मथुरा से सांसद हेमा मालिनी ने कहा, 'वृंदावन की विधवाओं के पास बढ़िया बैंक बैलेंस होता है, अच्छी आय होती है, बढ़िया बिस्तर होते हैं लेकिन वे आदतन भीख मांगती हैं।' वृंदावन में कई विधवा आश्रम हैं जहां पूरे उत्तर और पूर्व भारत से विधवाएं आकर रहती हैं। ये ऐसी महिलाएं होती हैं जिन्हें उनके घरवाले निकाल देते हैं या छोड़ देते हैं। 
उन्होंने कहा, 'वृंदावन में 40 हजार विधवाएं हैं। मुझे नहीं लगता कि शहर में और विधवाओं के लिए जगह है। इनकी बड़ी तादाद बंगाल से आ रही है। यह ठीक नहीं है। वे बंगाल में ही क्यों नहीं रहतीं? वहां भी बहुत अच्छे मंदिर हैं। ऐसा ही बिहार में है।
विधवाओं का निवास - स्थल बने एक खस्ताहाल आश्रम का दौरा करने के बाद हेमा मालिनी ने कहा कि वह इस बारे में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बात करेंगी। सुप्रसिद्ध लेखक राजाराम भादू ने अपनी रचनाओं में विधवाओं के जीवन से जुड़े सत्य को विस्तार के साथ प्रस्तुत किया है |अपनी पुस्तक ' धर्मसत्ता और प्रतिरोध की संस्कृति ' में लिखते हैं ' क़रीब दो सौ साल बाद कम्प्यूटर और इंटरनेट के युग में भी विधवाओं की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है | पश्चिम बंगाल की विधवाएं आज भी बंगाल और दूसरे राज्यों के तीर्थ - स्थलों के मन्दिरों या उनकी सीढ़ियों पर दिन गुज़ार रही हैं | दूसरे राज्यों में बंगला विधवाओं की हालत काफ़ी भयावह है | बनारस में विधवाएं नारकीय जीवन जी रही हैं | '
श्री भादू आगे लिखते हैं ' बंगाल में विधवाओं की तादाद ज़्यादा है | विधवाओं पर ज़ुल्म का सिलसिला भी बदस्तूर जारी रहा है | विधवा का मुंडन करा उसे कन्दरानुमा घर में बंद कर दिया जाता था |उसके प्याज़ , लहसुन , मांस , अंडा व मसूर की दाल खाने पर रोक होती थी | पूर्णिमा , अमावस्या और एकादशी के दिन उन्हें उपवास रखने के लिए मजबूर किया जाता था | विधवाएं देवर , ससुर या परिवार के अन्य सदस्यों अथवा रिश्तेदारों के यौन - शोषण का शिकार भी होती थीं | यदि वे गर्भवती होती थीं , तो किसी नीम - हकीम के पास ले जाकर उनका गर्भपात कराया जाता था | यदि उनकी मौत हो जाती , तो अस्वस्थता से हुई मौत का हवाला देकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाता था | ऐसा नहीं है कि यह स्थिति पूरी तरह अब बदल गयी हो | बंगाल की कई विधवाएं बनारस में देह - व्यापार से जुड़ी हैं
दशाश्वमेध घाट पर बूढी विधवाएं भीख मांगती दिखती हैं | आज से सौ - डेढ़ सौ साल पहले की तरह तो नहीं , लेकिन फिर भी बंगाल में विधवाओं की स्थिति अच्छी नहीं है | ग्रामांचलों में विधवाओं की हालत और भी खराब है | उनकी संपत्ति पर कब्ज़ा करने के लिए उन पर चारित्रिक लांछन लगाकर उन्हें सताते हुए समाज से बाहर कर दिया है | कुछ को चुड़ैल बताकर उन्हें सताते हुए समाज से बाहर कर दिया है | नदिया ज़िले के नवद्वीप के मन्दिरों में कई विधवाएं बेहाल जी रही हैं | अहम सवाल यह है कि हिंदुत्व की दुहाई देनेवालों ने विधवाओं के उद्धार के लिए क्या किया ? वृन्दावन में विधवाएं नरक में जी रही हैं | इस धर्म - नगरी में धर्म के नाम पर उनका यौन - शोषण तो हो ही रहा है , उनसे वेश्यावृत्ति भी करायी जा रही है | यह बात पश्चिम बंगाल महिला आयोग द्वारा वृन्दावन की विधवाओं पर किये गये अध्ययन से सामने आयी है | वाराणसी , वृन्दावन और मथुरा हिन्दुओं के पवित्र तीर्थ - स्थल माने जाते हैं | शर्म की बात है कि इन्हीं धर्मस्थलों पर धड़ल्ले से अपवित्र काम हो रहे हैं | सदियों से हिन्दू विधवाओं का बहिष्कार कर उनकी स्थिति समाज में निचले दर्जे की बना दी गयी है | धर्म और संस्कृति की दुहाई देनेवाले सेवा - दासी प्रथा के नाम पर विधवाओं का शोषण कर रहे हैं | ' [ पृष्ठ 109, 110 ]   



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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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