Apr 17, 2015

शाहबानो मामले जैसा एक और फ़ैसला , शरीअत में हस्तक्षेप की कोशिश

शाहबानो मामले जैसा एक और फ़ैसला , शरीअत में हस्तक्षेप की कोशिश 

शाहबानो मामले जैसे फ़ैसले का बार - बार आना और इस प्रकार मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप इन्तिहाई चिंताजनक और अफ़सोसनाक है | काबिलेगौर है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने उस समय एक अध्यादेश के ज़रिए ग़ैर इस्लामी फ़ैसले पर रोक लगा दी थी , किन्तु वैसे ही फ़ैसले कई बार आ चुके हैं , जो फ़ितरी तौर पर मुसलमानों को भीतर तक आहत और हैरान - परेशान करनेवाले होते हैं | सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रैल 2015 को अपने एक ताज़ा फ़ैसले में कहा है कि अगर कोई पत्नी गुजाराभत्ता की मांग करती है तो उसे देने से बचा नहीं जा सकता। 
साथ ही कोर्ट ने व्यवस्था दी कि इस नियम से जुड़ी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होगी। जस्टिस दीपक मिश्र और  प्रफुल्ल चंद्र पंत की खंडपीठ ने कहा, "अगर पति स्वस्थ है और इस हालत में हैं कि खुद को सपोर्ट कर सके, तो फिर उसे कानूनी तौर पर अपनी पत्नी का समर्थन करना होगा, क्योंकि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पत्नी गुजारा भत्ता की हकदार है और उसे बिना किसी सवाल उठाए ये दिया जाना चहिए।" कोर्ट के इस फ़ैसले से साफ़ है कि देश के सिविल लॉ को पर्सनल लॉ से अधिक महत्व दिया गया है | उल्लेखनीय है कि 1 अप्रैल 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट ने सामर्थ्यवान पत्नी द्वारा पति को गुज़ारा भत्ता देने का प्रावधान किया था | 
 सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस धारा के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भी गुजारा भत्ता पाने से रोका नहीं जा सकता, लेकिन जब तक वे दूसरी शादी नहीं कर लेती तब तक ही वे गुजारा भत्ता पाने की हकदार हैं। एक संविधान पीठ के पहले के आदेश का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दिए जाने वाले गुजारा भत्ता की रकम को इद्दत अवधि तक सीमित नहीं किया जा सकता है।
 इसके अलावा कोर्ट ने कहा, "इसमें कोई शक नहीं है कि अगर किसी व्यक्ति के पास पूरे संंसाधन हैं और वे फिर भी अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार या उसे नजरअंदाज करता है तो उस पर सीआरपीसी की धारा 125 के तहत इस आदेश जारी किया जा सकता है। खंडपीठ ने कहा, 'इस बात में कोई शक नहीं होना चाहिए कि अगर कोई व्यक्ति पर्याप्त संसाधन होते हुए भी अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार करता है तो ऐसे मामले में सीआरपीसी की धारा 125 के तहत आदेश जारी किया जा सकता है।' 
खंडपीठ ने कहा, 'कभी-कभार पति अनुरोध करता है कि उसके पास गुजारा-भत्ता देने के लिए संसाधन नहीं हैं क्योंकि वह नौकरी नहीं कर रहा है या उसका कारोबार सही नहीं चल रहा है। यह सब कोरा बहाना होता है। हकीकत यह है कि उनके मन में कानून का सम्मान ही नहीं होता है।' सुप्रीमकोर्ट ने लखनऊ की शमीमा  फारूकी से जुड़े एक मामले में अपना यह फ़ैसला सुनाया। 
आरोप है कि उसके पति शाहिद खान ने उनके साथ बुरा बर्ताव किया था। खान ने फिर दूसरी शादी कर ली और शमीमा  को गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया था। 
शमीमा ने 1998 में अपील की थी, जिस पर 2012 में सुनवाई शुरू हो सकी। खान ने पहले दावा किया था कि सीआरपीसी की धारा 125 मुस्लिम महिला के मामले में लागू ही नहीं होती और उनका तलाक शादी के पांच साल बाद 1997 में हो गया था और उन्होंने मेहर लौटा दी थी। काबिले ज़िक्र है कि कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट पहली शादी के रहते दूसरी शादी करने पर उत्तर प्रदेश के एक मुस्लिम अधिकारी को नौकरी से बर्ख़ास्त करने के फ़ैसले को उचित ठहरा चुकी है |
23 अप्रैल 1985 को सुप्रीमकोर्ट ने मुहम्मद अहमद खां बनाम शाहबानो बेगम मुक़दमे में जो फ़ैसला सुनाया था और मुसलमानों के विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने संसद द्वारा इसके विरोध में क़ानून बनवाकर इसके अमलदरामद पर रोक लगवा दी थी , ठीक वैसा ही फ़ैसला 29 साल के बाद 2014 में सुप्रीमकोर्ट द्वारा दिया गया था | यह मुस्लिम पर्सनल ला में सीधा हस्तक्षेप था और है |
 इसे एक इत्तिफ़ाक़ ही कहेंगे कि शाहबानो मामले का फ़ैसला अप्रैल महीने में आया था , पिछले साल भी ऐसा ही फ़ैसला अप्रैल के महीने में ही आया था , जब लोकसभा के लिए मतदान हो रहे थे | ऐसे में यह माना जा सकता है कि शाहबानो मामले के फ़ैसले के समय चुनावी माहौल रहा होगा | गत वर्ष  26 अप्रैल को शमीम बानो बनाम अशरफ़ खां मुक़दमे की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपक मिश्र और जस्टिस विक्रमजीत सेन की खंडपीठ ने अपने फ़ैसले में मुस्लिम महिला को इद्दत [ तलाक़ के बाद तीन महीने तक ] की अवधि पूरी होने के बाद भी पति से गुज़ारा भत्ता लेने का हक़दार ठहराया था | इस बार के 6 अप्रैल 15 के फ़ैसले में भी जस्टिस दीपक मिश्रा शामिल हैं , जो पिछले साल 26 अप्रैल 15 की खंडपीठ में शामिल थे |
पीठ ने कहा था कि मुस्लिम महिला [ तलाक़ अधिकार संरक्षण ] क़ानून की धारा 3 के तहत गुज़ारा भत्ता देने की व्यवस्था सिर्फ़ इद्दत तक सीमित नहीं है |  देश के मुसलमान "मुस्लिम पर्सनल लॉ अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं |"  यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, महर, तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ, चाह और विरासत शामिल है | 
सुप्रीमकोर्ट का गत वर्ष का फ़ैसला फ़ैसला भी सहज रूप से विवादकर था और यह ताज़ा फैसला भी आपत्तिजनक है , क्योंकि यह इस्लाम की शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है | इस प्रकार यह मुस्लिम पर्सनल ला में सीधा हस्तक्षेप है | देश के शीर्ष मुस्लिम संगठन जमाअत इस्लामी हिन्द के महासचिव जनाब नुसरत अली ने ताज़ा मुक़दमे में महिला - अधिकार और स्वतंत्रता के नाम पर तलाक़ के बाद भी मुस्लिम महिला को जब तक कि वह शादी न करे उसको नान - नफका [ गुज़ारा भत्ता ] दिए जाने के फ़ैसले को खुले तौर पर ग़ैर इस्लामी और शरीअत - विरुद्ध ठहराया है |उन्होंने इसको मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानते हुए स्पष्ट किया कि मुसलमान अपने दीन [ धर्म ] से प्रगाढ़ रूप से जुड़े हैं और क़ुरआन के आदेशों को अपनी आस्था का अभिन्न अंश समझते हैं | वे ऐसे अदालती फ़ैसलों को जो सम्मान्य जजों की इस्लामी आदेशों से अनभिज्ञता या उनको नजरअंदाज करके दिए जाते हैं उन्हें बदलने हेतु हर संभव क़ानूनी कोशिश जारी रखेंगे | उन्होंने मुसलमानों से दर्दमंदाना अपील की कि वे अपनी शानदार रिवायत से मज़बूती के साथ जुड़े रहें और और निकाह , तलाक़ और अन्य पारिवारिक व सामाजिक मामलों - समस्याओं में शरीअत से गहरा रिश्ता क़ायम रखें | 
कुछ लोग यह भी कहते हैं कि देश में एक ही नागरिक क़ानून होना चाहिए , जिसका भारतीय संविधान समर्थन करता है | इसके अनुच्छेद 44 [ नीति निर्देशक तत्व ] में समान सिविल कोड की परिकल्पना की गयी है | इसके हवाले से सुप्रीमकोर्ट केंद्र सरकार को पहले सुझाव दे चुकी है कि पूरे देश में समान सिविल कोड लागू करे | संघ परिवार इसके लिए बहुत लालायित दिखता रहा है , जबकि यह सच्चाई सबको पता है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में इसे लागू कर पाना असंभव है |  लेकिन वोटों की राजनीति को चमकाने के लिए इसके लिए दुष्प्रयास किए जाते रहे हैं | 
मदनलाल खुराना जिन्हें भाजपा ने काम निकल जाने के बाद गंदे - बदबूदार कीचड़ में फेंक दिया था , जब दिल्ली के मुख्यमंत्री थे , तब उन्होंने इस बाबत एक प्रस्ताव विधानसभा में पारित तक करवा लिया था | मध्यप्रदेश प्रदेश विधानसभा में भी भाजपा के लोगों ने भी ऐसे दुष्प्रयास किए , जो अंततः नाकाम हो गये , क्योंकि ये नाकाम होने ही थे | यह संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों के सर्वथा विपरीत है | संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अंतःकरण और धर्मानुसार अमल करने की आज़ादी देता है | ऐसी ही बात संविधान की प्रस्तावना में कही गई है |
संविधान में धाराओं 25(1) और 26 के अंतर्गत जो बातें कही गई है उनका सार यह है कि हर धार्मिक समुदाय को इसका अधिकार प्राप्त होगा कि अपने धर्म पर चले, तथा अपने तौर पर अपने धार्मिक क्रिया-कलाप अंजाम दे। अतः यह सिर्फ़ मुसलमानों (या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों) का मामला ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधान का भी तक़ाज़ा है कि उसके अंतर्गत देश में समान सिविल कोड लागू न हो। 
यही आदर्श बात भी है | मुसलमानों ने भी समान सिविल कोड को लागू नहीं किया | जब वे लगभग नौ सौ वर्ष देश के शासक रहे , कभी भी उन्होंने हिन्दू या अन्य धर्मानुयायी जनता पर अपना क़ानून नहीं थोपा | अंग्रेज़ों ने लार्ड मैकाले की अध्यक्षता में समिति बनकर भारतीय दंड संहिता , भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता , भारतीय व्यवहार प्रक्रिया संहिता , भारतीय साक्ष्य अधिनियम आदि बहुत - से क़ानून लागू कर दिए , लेकिन समान सिविल कोड की ओर नहीं बढ़े , क्योंकि वे ज़ालिम होने के बावजूद यह जानते थे कि यह किसी भी क़ीमत पर लागू नहीं हो सकता | 
उन्होंने मुसलमानों के लिए पारिवारिक क़ानून 1937 और अलग से मुस्लिम मैरिज डिज़ुलेशन एक्ट 1939 बनाया | देश के किसी भी ख्यातलब्ध विचारक एवं विद्वान ने समान सिविल कोड का समर्थन नहीं किया है | संविधान निर्माता डॉ . अंबेडकर ने संविधान निर्मात्री सभा में नीति निर्देशक तत्व की धारा 44 में इस बाबत रखे गये प्रावधान पर दक्षिण के कुछ मुस्लिम सदस्यों की आपत्ति का जवाब देते हुए कहा था कि जब तक सब देशवासी इसके लिए राज़ी नहीं होंगे , इसे कदापि लागू नहीं किया जाएगा |
 देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं . जवाहरलाल नेहरू ने कई बार इसी आशय का मत प्रकट किया था | तत्कालीन सरसंघ चालक गुरु गोलवलकर ने भी इसकी आवश्यकता को सिरे से ख़ारिज किया है | 20 अगस्त 1972 को दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने साफ़ कहा था कि देश में समान सिविल कोड अवांछित है | उन्होंने कहा था कि जो लोग समान सिविल कोड की बात करते हैं , वे भारत की ज़रूरत समझते ही नहीं हैं | गुरु जी ने इसी आशय के उद्गार एक इंटरव्यू में व्यक्त किए थे , जो 26 अगस्त 1972 को ' मदरलैंड ' में छपा था | 
आश्चर्य की बात है कि संघ परिवारी अपने गुरु जी की बात का बार - बार अनादर करते हैं | भाजपा के हाल के चुनाव घोषणापत्र में इसकी बात है | भाजपा नेताओं द्वारा इसकी ज़रूरत बार - बार बताकर गुरु जी की आत्मा को ठेस पहुंचाई जाती है | सुप्रीमकोर्ट का ताज़ा फ़ैसला भी अवांछित है | एक ओर देश में मौजूद मुस्लिम पर्सनल ला में बहुत - सी ख़ामियां हैं , जिन्हें दूर करने की ज़रूरत है , दूसरी ओर इन खामियों को और नहीं बढ़ाया जाना चाहिए |

About the Author

मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

0 comments:

Post a Comment