Apr 1, 2015

गुजटोक भी पोटा जैसा

काले विधेयक को कदापि न मिले मंज़ूरी 

गुजरात विधानसभा ने आज विवादित आतंकवाद और संगठित अपराध निरोधी विधेयक (जीसीटीओसी) पारित कर दिया जिसके तहत पुलिस को किसी का फोन टैप करके उसे अदालत में बतौर सबूत पेश करने सहित कई नयी शक्तियां दी गयी हैं। पहले यह 'गुजकोक' विधेयक 
था | अब  'गुजटोक' विधेयक पारित किया गया है। ज्ञातव्य है कि गुजकोक विधेयक को पहले तीन बार पारित किया जा चुका था, लेकिन राष्ट्रपति ने आपत्तिजनक प्रावधानों के कारण उसे मंजूरी देने से मना कर दिया था | अब मोदी सरकार में देखना यह है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस पर क्या फैसला लेते हैं। इस बार भी पुलिस को टेलीफोन टेप करने का अधिकार देने और उसे सुबूत के तौर पर कोर्ट में स्वीकार किए जाने का पूर्ववत प्रावधान रखा गया है। गुजरात सरकार पिछले 12 साल से आतंकवाद व संगठित अपराध रोकने के लिए कठोर कानून बनाने की कोशिश कर रही है, जिसका प्राथमिक निशाना मुसलमान ही बताए जाते हैं | 2004 में इस तरह का पहला विधयेक मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में लाया गया था | गुजरात विधानसभा में पिछले 31 मार्च को कांग्रेस के कड़े विरोध के बीच इस विधेयक को नए नाम से चौथी बार विधानसभा से पारित कर दिया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते इस विवादित विधेयक को तीन बार पारित कर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया था, लेकिन इसे मंजूरी नहीं मिली। अब मुख्यमंत्री आनंदीबेन की सरकार ने इसे फिर पारित किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते इस विवादित विधेयक को तीन बार पारित कर राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा गया था, लेकिन इसे मंजूरी नहीं मिली। अब मुख्यमंत्री आनंदीबेन की सरकार ने इसे फिर पारित किया है।
गृह राज्य मंत्री रजनीकांत पटेल ने विधानसभा में गुजरात आतंकवाद और संगठित अपराध निरोधी विधेयक विधेयक 2015 पेश किया। बहस के दौरान कांग्रेस नेता शंकर सिंह वाघेला व शक्ति सिंह गोहिल ने राष्ट्रपतियों के सुझाव के आधार पर विधेयक के विवादित प्रावधान हटाने की मांग की। उन्होंने कहा कि यह असंवैधानिक और राष्ट्रपतियों की सलाह का अपमान है। यह भी कहा, ‘‘लोगों के अधिकारों के लिए यह बहुत खतरनाक स्थिति है।’ विधयेक के विवादित प्रावधानों का विरोध करते हुए कांग्रेस सदन से बहिर्गमन कर गयी।
वास्तव में वर्षों से इसका विरोध इसलिए किया जा रहा है , क्योंकि यह विधेयक पोटा की तरह है | पोटा को संविधान की आत्मा के विरुद्ध बताकर मुसलमानों को इसके तहत प्रताडित करने के बाद इसे हटाया गया था | ' गुजटोक ' के कई प्रावधान आपत्तिकर हैं , जैसे विधेयक की धारा 14 के अनुसार किसी आरोपी की फोन पर बातचीत का टेप सुबूत के तौर पर कोर्ट में मान्य होगा। इस पर किसी अन्य कानून का कोई असर नहीं होगा। वर्तमान में भारतीय साक्ष्य अधिनियम में फोन पर बातचीत को सुबूत नहीं माना जाता है। एक बड़ी आपत्ति यह भी है कि विधयेक की धारा 16 के अनुसार आरोपी का पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी के समक्ष दर्ज कराया गया बयान सुबूत माना जाएगा। वर्तमान में दंड प्रक्रिया संहिता [ IPC ] की धारा 164 के तहत किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान को ही सुबूत माना जाता है।धारा 20 के अनुसार जांच पूरी करने या आरोप पत्र दायर करने की तय अवधि 180 दिन तक बढ़ाई जाएगी। जबकि वर्तमान में 90 दिन में आरोप पत्र पेश न हो तो आरोपी को रिहा कर दिया जाता है। छह माह तक बिना आरोप जेल में रखना अनुचित है | धारा 20 (4) के तहत किसी आरोपी को निजी मुचलके पर रिहा नहीं किया जा सकेगा |
 यह प्रावधान असंवैधानिक है। यह आरोपी की रिहाई के अधिकार के खिलाफ है। गुजटोक में दर्ज केस की सुनवाई सिर्फ विशेष अदालतों में ही होगी। ज़ाहिर है , विशेष अदालतों में सुनवाई में देरी होने पर आरोपी त्वरित न्याय से वंचित रहेगा। इस विधयेक की चौतरफ़ा आलोचना की जा रही है और इस काले क़ानून को मंज़ूरी न देने की राष्ट्रपति से मांग की गई है | आज जब ऐसा दमनकारी क़ानून मौजूद नहीं है , तब भी लोगों ख़ासकर बेक़सूर मुसलमानों को सताया और प्रताड़ित किया जाता है | जब क्रूर क़ानून बन जाएगा , तो इसकी खौफनाकी को सहज ही महसूस किया जा सकता है | वर्तमान सरकार से आशा करना व्यर्थ ही है | पूर्व केंद्र सरकार में तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री मंत्री सुशील कुमार शिंदे के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद किसी भी राज्य सरकार द्वारा गिरफ्तार  बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों की रिहाई के लिए कोई क़दम न उठाया जाना वाक़ई अफ़सोसनाक और आश्चर्यजनक रहा है | उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों की जेलों में बड़ी संख्या में बेक़सूर मुस्लिम नवजवान क़ैद हैं , जिनमें कई वर्षों से ' बेगुनाही ' की सज़ा भुगतनेवाले भी शामिल हैं | उत्तर प्रदेश की सपा अपने को मुसलमानों की हिमायती बताती है, लेकिन मुसलमानों के वोट से सपा के कई बार सत्ता में पहुँचने के बावजूद मुसलमानों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। जाँच ब्यूरो [ आई . बी .] साम्प्रदायिक निगाहें सबसे ज्यादा पढ़े लिखे मुस्लिम युवकों पर है , क्योंकि मुसलमानों की यह पीढ़ी अपने अधिकारों के प्रति पहले से ज्यादा जागरूक है। ऐसे में जरूरत है कि देश में ऐसा वातावरण बने कि किसी भी नागरिक के मूलभूत मानवीय अधिकारों का हनन न हो सके | इसके लिए पहले क़दम के तौर पर गिरफ्तार बेगुनाह मुस्लिम नवजवानों को फ़ौरन रिहा किया जाए और गुजरात में पोटा की पुनरावृत्ति न होने पाए | मुसलमानों को आतंकी ठहराने की कोशिश बहुत घृणित एवं निंदनीय है | इस्लाम शांति का धर्म है | इस्लाम मूल शब्द ‘सलाम’ से निकला है जिसका अर्थ है ‘शान्ति’। इसका दूसरा अर्थ है अपनी इच्छाओं को अपने पालनहार ख़ुदा के हवाले कर देना। अतः इस्लाम शान्ति का धर्म है  , जो सर्वोच्च स्रष्टा अल्लाह के सामने अपनी इच्छाओं को हवाले करने से प्राप्त होती है। क़ुरआन में है -'' ऐ लोगो जो ईमान लाये हो , अल्लाह के लिए औचित्य पर क़ायम रहनेवाले और इन्साफ़ की गवाही देनेवाले बनो | किसी गिरोह की दुश्मनी तुमको इतना उत्तेजित न कर दे कि इन्साफ़ से फिर जाओ | इन्साफ़ करो , यह ईशभक्ति और विनम्रता के अधिक अनुकूल है | '' (कुरआन, 5:8)

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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