Apr 17, 2015

'11 साल सलाखों के पीछे '

'11 साल सलाखों के पीछे

यह एक किताब का शीर्षक है | यह 44 वर्षीय मुफ्ती अब्दुल कय्यूम की जेल की ज़िन्दगी की दर्दनाक कहानी है | सुप्रीमकोर्ट ने उनको पिछले साल 16 मई को 24 सितंबर 2002 के अक्षरधाम मंदिर [ अहमदाबाद , गुजरात ] पर हुए आतंकी हमले में मुक्त कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उन पर लगे सभी आरोपों को हटाते हुए बेक़सूर लोगों को गलत आरोपों में फंसाने के लिए गुजरात सरकार पर तीखी टिप्पणी की | अदालत ने इस मामले में पांच अन्य को भी बेक़सूर क़रार दिया |  
मुफ़्ती साहब को घटना के लगभग एक साल बाद 28 अगस्त  2003 को गिरफ्तार किया गया था | यह संयोग ही है कि जिस दिन उनको रिहा किया गया था , उसी दिन नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे | 
उल्लेखनीय है कि अक्षर धाम हमले में 33 लोग मारे गए थे और 80 से अधिक घायल हो गए थे | गुजरात की निचली अदालत ने अब्दुल कय्यूम समेत दो लोगों को दोषी करार  देते हुए मौत की सजा दी थी | मुफ़्ती अब्दुल कय्यूम ने अपने जीवन के 11 साल सलाखों पीछे काटे।उन्होंने पिछले एक साल का पूरा वक्त 200 पेज की एक किताब लिखने में लगाया। इस किताब में इन्होंने राज्य में खुद के साथ हुई नाइंसाफी के दर्द को बयां किया है। किताब का विमोचन अगले हफ्ते हुआ | 
यह किताब गुजरात पुलिस द्वारा एक बेक़सूर शख्स को कागज़ी कार्रवाई के जरिए आतंकवादी बनाने की जीवंत कहानी बयान करती है | मुफ़्ती साहब को जुर्म कबूल कराने के लिए बार - मारा पीटा गया और बिजली के झटके लगाए गए | पुलिस हिरासत में उन्हें इतना मारा जाता था कि बेहोश हो जाते थे | किसी - किसी दिन दो बार पिटाई की जाती थी और उस वक्त तक पीटा जाता था , जब तक कि वे बेहोश नहीं हो जाते थे | कुख्यात पुलिस अधिकारी डी . जी . वंज़ारा और जी .एस . सिंघल और दो अन्य ने मुफ़्ती साहब को झूठे आरोपों में जेल में डलवाया था | उनसे फर्ज़ी कागज़ों पर दस्तखत कराए गए !
पुलिस ने उन पर आरोप लगाया था कि इन्होंने अक्षरधाम पर हमले करने वाले दोनों आतंकियों को चिट्ठी लिखी थी। पुलिस ने इन दोनों आतंकियों को मार डाला था। पुलिस ने दावा था कि उनकी  लिखी चिट्ठी उसके पास है। इस पुलिस का रवैया इतना ज़लिमाना था कि मुफ़्ती साहब को एक दिन के लिए भी पैरोल नहीं मिला , यहाँ तक कि उनके पिता की मौत पर भी उन्हें नहीं जाने दिया |
किताब जारी करते हुए मुफ़्ती साहब ने कहा कि  'यह किताब केवल मुस्लिमों के लिए नहीं है। यह किताब उन सभी के लिए है जो इस देश का शोषित तबका है। यदि इस किताब के जरिए किसी एक शख्स को भी सरकार की ज्यादती से जूझने में मदद मिलती है तो मुझे खुशी होगी। यह मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।' अपनी रिहाई के बाद 40 साल के मदरसा टीचर अपनी बची ज़िन्दगी को सहेजने में जुटे हैं। 
 मुफ़्ती साहब की पत्नी जो 'आतंकी की पत्नी' का धब्बा लेकर जिंदा रहने के लिए अभिशप्त थीं , बताया, 'मेरा बेटा जैसे-जैसे बड़ा हो रहा था वह लगातार अपने पिता के बारे में सवाल पूछता रहा। हर दिन वह स्कूल जाने से पहले पूछता था कि पापा घर कब आएंगे। मैं उस दर्द को बयां नहीं कर सकती। हर पल दर्द के साथ जिया है।' मुफ़्ती साहब की किताब बिना किसी गुनाह के सलाखों के पीछे कटे एक दशक से ज्यादा वक्त का जिंदा दस्तावेज है। उनके लिए किताब लिखना आसान था , लेकिन अब इतना साहस नहीं है कि वह इस किताब को पढ़ सकें। काश , अन्य बेक़सूर क़रार दिए गए लोग भी इस तरह की सराहनीय कोशिश करते | मुफ़्ती साहब ने सुप्रीमकोर्ट में मुआवज़े और वंज़ारा , सिंघल समेत चार पुलिस अफसरों पर कार्रवाई की मांग करते हुए याचिका दाख़िल की है , जिस पर आगामी 11 मई को सुनवाई होनी है |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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