Apr 22, 2015

सिर्फ निंदा बयान तक सीमित है नक्सलियों पर कार्रवाई !

सिर्फ निंदा बयान तक सीमित है नक्सलियों पर कार्रवाई !
कायर जवान नहीं कर सकते देश की सुरक्षा 

छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले बढ़ गए | पिछले दिनों तीन दिनों के भीतर चार नक्सली हमले हुए , जिनमें ख़ासकर सुरक्षा बलों के जवान निशाना बने | पुलिस और सुरक्षा बलों की संपत्तियां तबाह व बर्बाद हुईं | अब यह बात छिपी नहीं रही कि पुलिस  और सुरक्षा बलों में मनोबल की कमी और कायरता ऐसे हमलों के सबब बने हुए हैं | मई 13 में कांग्रेसी नेताओं पर हमले के सिलसिले में बस्तर जिले के दरभा थाने के तत्कालीन टीआई यूके वर्मा के बयान के प्रतिपरीक्षण में यह बात सामने आई है कि नक्सलियों के डर से थाने से निकले जवान घटनास्थल से तीन किलोमीटर दूर मंदिर के पास दुबके रहे। उन्हें कांग्रेसी नेताओं की सुरक्षा से ज्यादा अपनी जान की चिंता थी। जब गोलियों की आवाज बंद हो गई थी और नक्सलियों के जाने की पुष्टि हुई, तब जवान सर्चिंग करते हुए घटनास्थल पहुंचे। स्वचलित हथियार होने के बाद भी महज तीन किलोमीटर का फासला एक घंटे में तय करने के सवाल पर तत्कालीन टीआई ने यह सफाई दी कि दोनों ओर घाटी और मोड़ होने के कारण वहां तेजी से नहीं पहुंचा जा सकता था। झीरम घाटी कांड की जांच के लिए गठित विशेष न्यायिक आयोग के अध्यक्ष जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा के कोर्ट में गत 17 मार्च 15 को दरभा थाने के तत्कालीन टीआई यूके वर्मा के बयान का प्रतिपरीक्षण हुआ। उन्होंने बताया कि दरभा थाने से 24 मई 13 को सीआरपीएफ की 80 बटॉलियन को बल उपलब्ध कराने के लिए पत्र लिखा गया था। देश में बढ़ती नक्सल समस्या पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार चिंतित है , फिर भी प्रभावी क़दम का न उठाना चिंताजनक है | गत वर्षांत के सुकमा कांड के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलियों को ‘राष्ट्र विरोधी तत्व'  क़रार दिया और कहा कि इस अमानवीयहमले की निंदा करने के लिए शब्द ही नहीं हैं। पहले के प्रधानमंत्री भी नक्सल विरोधी बयान देते रहे , लेकिन कारगर क़दम कभी न उठ सके | 6 जून 13 को नई दिल्ली में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ . मनमोहन सिंह ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हुए नक्सल हमले का जिक्र करते हुए कहा था कि इस तरह की हिंसा का हमारे लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है। केंद्र और राज्यों को साथ मिल कर काम करने की जरूरत है ताकि सुनिश्चित हो सके कि इस तरह की घटना फिर से न होने पाए। उन्होंने कहा था कि माओवादियों के खिलाफ सक्रियता से सतत अभियान चलाने और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों में विकास और शासन से जुडे मुद्दों के समाधान की दो-स्तरीय रणनीति को और मजबूत करने की जरूरत है। गौरतलब है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री के वक्तव्य पर ध्यान नहीं दिया गया और  दंतेवाड़ा में 2010 में सीआरपीएफ के 76 जवानों के खूनी नरसंहार की यादें 11 मार्च 14 को एक बार फिर ताजा हो गईं , जब लगभग 200 नक्सलियों के गिरोह ने एक बार फिर झीरम घाटी के उसी इलाके में सुरक्षाबलों पर हमला बोलकर 15 जवानों सहित 16 लोगों की ताबड़तोड़ गोलीबारी कर हत्या कर दी गई। नक्सलियों ने सुरक्षा बलों से 15 स्वचालित हथियार भी लूट लिए और तीन वाहनों में आग लगा दी। करीब तीन घंटे तक चली मुठभेड़ के बाद वे मृत पुलिसकर्मियों के हथियार और गोला बारूद भी लेकर फरार हो गए। बताया जाता है कि दिनदहाड़े हुए इस हमले को दंडकारण्य जोनल कमेटी की दरभा घाटी इकाई के रामन्ना-सुरिंदर-देवा की तिकड़ी ने अंजाम दिया । यह हमला जिस स्थान पर हुआ था वह इससे पहले 23 मई 2013 को कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर हुए हमले से महज पांच किलोमीटर की दूरी पर है। उस हमले में नक्सलियों ने महेंद्र कर्मा सहित राज्य कांग्रेस के समूचे नेतृत्व का लगभग सफाया कर दिया था। इसी गिरोह ने तत्कालीन छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस प्रमुख नंद कुमार पटेल और उनके बेटे और कर्मा सहित 25 लोगों की जान ली थी। इससे पहले 6 अप्रैल 2010 की तारीख छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक काली तारीख है। इस दिन
नक्सलियों ने ताड़मेटला में  घात लगाकर सीआरपीएफ के 76 जवानों को अपना निशाना बनाया था। उस दिन सीआरपीएफ के 120 जवान सर्चिंग के लिए निकले थे, उनके वापस लौटने के रास्ते में घात लगाकर बैठे 1000 से ज्यादा नक्सलियों ने ब्लास्ट करके जवानों पर हमला कर दिया, जवान संभल पाते इससे पहले ही नक्सलियों ने घात के पीछे से अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर दी। काफी देर तक चली इस मुठभेड़ में 76 जवान शहीद हुए थे और 8 नक्सली मारे गए थे। हमले के बाद नक्सलियों ने जवानों के हथियार और जूते भी लूट लिए थे। यह अर्ध सैनिकों पर हुआ देश का सबसे बड़ा नक्सली हमला था। कांग्रेस नेताओं पर हमले के बाद नई दिल्ली में सीआरपीएफ के अधिकारियों ने हमले के लिए सुरक्षा चूक को भी जिम्मेदार ठहराया था । उन्होंने बताया कि सीआरपीएफ और स्थानीय पुलिस की 48 सदस्यीय संयुक्त टीम ने मानक परिचालन प्रक्रिया (एसओपी) का पूरी तरह उल्लंघन किया। यह टीम रोजाना निर्माण स्थल पर जा रही थी और एक ही रास्ते से जा रही थी। नक्सल रोधी अभियान में किसी एक ही रास्ते से बार बार न गुजरने के सिद्धांत का यहां उल्लंघन हुआ। वास्तव में यह सुरक्षा का इस्लामी सिद्धांत है , जिस पर पूरी दुनिया में अमल किया जाता है | ऐसा लगता है कि सुरक्षाकर्मियों की आवाजाही पर माओवादियों की निगाह थी। ऐसे में उन्हें सुनियोजित हमले के लिए पर्याप्त समय मिल गया। अक्सर नक्सली मुठभेड़ों में एक ही प्रकार के सवाल उठते हैं , जिनको कभी हल नहीं किया जाता इनमें पहला यह कि नक्सली हमले में क्रास फायरिंग होती है पर अक्सर कोई नक्सली मारा नहीं जाता ? दूसरा सवाल यह कि जब पता है की नक्सली इलाका है तो वहां का खुफ़िया विभाग और सूचना - तंत्र इतना कमजोर और बेबस क्यों रहता है ?  प्रायः देख जाता है कि नक्सली सौ -दो सौ की संख्या में जमा होकर घात लगाते हैं, पर उनकी खबर वारदात तक नहीं मिल पाती ! ? तीसरा सवाल यह कि हमला तीन - तीन घंटे तक चलता है , पर वहां अतिरिक्त जवान क्यों नहीं पहुँचते चाहे पुलिस थाने निकट ही क्यों न हों ? इसी क्रम में यह बात भी कि नक्सली वारदात बाद काफी देर गन,कारतूस,जूते और दीगर सामान लूटते रहते हैं और कोई अतिरिक्त फ़ोर्स नहीं पहुंचती ! इस विषम परिस्थिति में क्या यह सच नहीं कि अवसरवादी , ओछी और लचर राजनीति ने इस संकट को नासूर में तब्दील कर डाला है ? जब हम देश के आंतरिक दुश्मनों के ख़िलाफ़ प्रभावी , ठोस और कठोर क़दम नहीं उठा सकते , विदेशी दुश्मनों से कैसे निबट पायेंगे ?


किसान हितों पर गौर

किसान हितों पर गौर 

- डॉ . मुहम्मद अहमद 
यह वही दशक था , जब देश में आर्थिक उदारीकरण की हवा डॉ . मनमोहन सिंह द्वारा बहाई गई थी | कुछ जानकार इसके नतीजों के प्रति आशंकित थे और वे इसका अपने - अपने स्तर से विरोध कर रहे थे | मगर कहते हैं कि सत्तामद के शिकार लोग हक़ीक़त भूल जाते हैं और जो उनके दिल में आता है , बिना विचारे सब कर गुजरते हैं ! यह वही दशक था , जब देश में ज्ञातव्य तौर पर किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला शुरू हुआ | 1990 के बाद प्रति वर्ष लगभग दस हज़ार किसानों की आत्महत्याओं का आंकड़ा सामने आया , जो आज बढ़ते - बढ़ते हर दिन औसतन 46 किसानों की आत्महत्याओं में तब्दील हो चुका है ! 
हर दिन क़रीब 46 परिवारों पर मुसीबत का पहाड़, पिछला क़र्ज़ कैसे चुकेगा, पेट कैसे पलेगा, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई कैसे होगी, खेती कौन सम्भालेगा, लड़कियों की शादी कैसे होगी? यह भयावह मानवीय त्रासदी हमारे देश और समाज की सच्चाई है | एक आंकड़े के अनुसार , 1997 से 2006 तक 166304 किसानों ने आत्महत्याएं कीं | आज हालात इतने संजीदा हैं कि देशभर में असमय बारिश और ओलों से खेतों में लगे खराब फसल के अंबार से हताश किसानों की आत्महत्या का सिलसिला थमता नजर नही आ रहा है। 
महाराष्ट्र सरकार की ओर से हाल ही जारी आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से मार्च 2015  तक प्रदेश में 601 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यानी महाराष्ट्र में हर रोज करीब 8 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, साल 2014 में महाराष्ट्र में करीब 1900 किसानों ने आत्महत्या की थी । इस हिसाब से पिछले साल की तुलना में इस बार आत्महत्या का आंकड़ा करीब 30 फीसदी तक बढ़ गया है। ये हालात ऐसे दौर के हैं, जब महाराष्ट्र की भाजपा सरकार लगातार किसानों के मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान देने की बात कर रही है।
 महाराष्ट्र के विदर्भ में आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस भी विदर्भ इलाके से है। जनवरी से लेकर मार्च तक विदर्भ में 310 किसानों ने आत्महत्या की थी। विदर्भ जनांदोलन कमेटी के किशोर तिवारी ने बताया कि 1900 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से दिए जाते हैं, साथ ही बैंक सरकार के निर्देशों को नजरअंदाज करते हुए लगातार किसानों से पैसे मांगते रहते हैं। उत्तर प्रदेश के आंकड़े भी बड़े भयावह हैं उत्तर प्रदेश में महज़ 40 दिनों में 42 किसानों ने आत्महत्या कर ली | वहां के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव फ़रमाते हैं कि किसी किसान ने फ़सल ख़राब होने की वजह से अपनी जान नहीं दी है |
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह भी किसानों की आत्महत्या की वारदात को ख़राब फ़सल से हुए नुक़सान से जोड़ने से साफ़ इन्कार करते हैं | उन्होंने कहा कि किसान कभी भी फ़सल ख़राब होने से आत्महत्या नहीं करते | वे इतने कमज़ोर नहीं होते कि आर्थिक नुक़सान न झेल पाएं और अपनी जान दे दें | श्री सिंह किसानों की ख़ुदकुशी को मीडिया का प्रचार क़रार देते हैं | उन्होंने कहा, “किसी किसान की मौत प्राकृतिक कारणों से भी हुई तो मीडिया ने उसे आत्महत्या बता दिया | यह पूरी तरह ग़लत है |”   
यह एक खुली हकीक़त है कि देश की जनसंख्या के साठ फ़ीसद से अधिक जनसंख्या वाले किसानों की समस्याओं पर कभी कोई गम्भीर सोच-विचार नहीं हुआ | भूमि अध्यादेश पर तर्क - कुतर्क सिर्फ राजनीतिक नफ़ा - नुक़सान तक सीमित है ! कोई न तो भूमि अध्यादेश की खामियां खुलकर बता पा रहा है और न ही किसानों के दुःख - दर्द का सही चित्रण कर पा रहा है | उलटे बेशर्मी की हद यह है कि उत्तर प्रदेश , छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने इन आँकड़ों को छिपाना शुरू कर दिया और शून्य आत्महत्याएँघोषित करना शुरू कर दिया. कहा जाने लगा कि आत्महत्याएँ खेती की वजह से नहीं, बल्कि नशे की लत, पारिवारिक झगड़े, बीमारी की परेशानी, लड़की की शादी या ऐसे ही किसी कारण से लिये गये क़र्ज़ को न चुका पाने के कारण हो रही हैं ! 
इस मामले में उत्तर प्रदेश में तो खुले झूठ का बाज़ार गर्म है , जहाँ आधिकारिक रूप से फ़सल बर्बादी की वजह से पिछले दिनों 99 किसानों द्वारा आत्महत्या की बात आई , वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ मंत्री शिवपाल यादव कहते हैं कि प्रदेश ने फसल बर्बादी से एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की
ज़ाहिर है , वस्तुस्थिति यह नहीं है | आर्थिक उदारीकरण ने किसानों को निगला है | इसी वजह से खेती लगातार किसान के लिए घाटे का सौदा होती जा रही है और उसकी लागत लगातार बढ़ती जा रही है, जिसे बर्दाश्त करना नामुमकिन है
पूंजीवाद इस कदर हावी है कि किसानों को उत्पादित फ़सल का मुनासिब दाम नहीं मिलता |  सरकारी आँकड़े बताते हैं कि गेहूँ की फ़सल पर औसतन एक हेक्टेयर में क़रीब 14 हज़ार, सरसों की फ़सल पर क़रीब 15 हज़ार, चने की फ़सल पर महज़ साढ़े सात हज़ार रुपये और धान पर सिर्फ़ साढ़े चार हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर ही किसान को बच पाते हैं | लेकिन अगर फसल खराब हो गई तो वह भी नहीं
अगर खेती खुद नहीं की , साझेदारी या बटाई के माध्यम से करवाई तो कुछ ही मिल पाता है | हमारी कृषि नीति इतनी ख़ामियों वाली है कि किसानों को कोई उल्लेखनीय सरकारी लाभ नहीं मिल पाता | ऐसे में बहुत आवश्यक है कि अब किसान हितों पर भी ध्यान दिया जाए , रस्मन नहीं अमलन उन कारकों को तलाश करके उनका हल भी तलाश करना होगा , जो किसानों को आत्महत्या की ओर ले जाते हैं |  


Apr 17, 2015

शाहबानो मामले जैसा एक और फ़ैसला , शरीअत में हस्तक्षेप की कोशिश

शाहबानो मामले जैसा एक और फ़ैसला , शरीअत में हस्तक्षेप की कोशिश 

शाहबानो मामले जैसे फ़ैसले का बार - बार आना और इस प्रकार मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप इन्तिहाई चिंताजनक और अफ़सोसनाक है | काबिलेगौर है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने उस समय एक अध्यादेश के ज़रिए ग़ैर इस्लामी फ़ैसले पर रोक लगा दी थी , किन्तु वैसे ही फ़ैसले कई बार आ चुके हैं , जो फ़ितरी तौर पर मुसलमानों को भीतर तक आहत और हैरान - परेशान करनेवाले होते हैं | सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रैल 2015 को अपने एक ताज़ा फ़ैसले में कहा है कि अगर कोई पत्नी गुजाराभत्ता की मांग करती है तो उसे देने से बचा नहीं जा सकता। 
साथ ही कोर्ट ने व्यवस्था दी कि इस नियम से जुड़ी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होगी। जस्टिस दीपक मिश्र और  प्रफुल्ल चंद्र पंत की खंडपीठ ने कहा, "अगर पति स्वस्थ है और इस हालत में हैं कि खुद को सपोर्ट कर सके, तो फिर उसे कानूनी तौर पर अपनी पत्नी का समर्थन करना होगा, क्योंकि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत पत्नी गुजारा भत्ता की हकदार है और उसे बिना किसी सवाल उठाए ये दिया जाना चहिए।" कोर्ट के इस फ़ैसले से साफ़ है कि देश के सिविल लॉ को पर्सनल लॉ से अधिक महत्व दिया गया है | उल्लेखनीय है कि 1 अप्रैल 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट ने सामर्थ्यवान पत्नी द्वारा पति को गुज़ारा भत्ता देने का प्रावधान किया था | 
 सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस धारा के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भी गुजारा भत्ता पाने से रोका नहीं जा सकता, लेकिन जब तक वे दूसरी शादी नहीं कर लेती तब तक ही वे गुजारा भत्ता पाने की हकदार हैं। एक संविधान पीठ के पहले के आदेश का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दिए जाने वाले गुजारा भत्ता की रकम को इद्दत अवधि तक सीमित नहीं किया जा सकता है।
 इसके अलावा कोर्ट ने कहा, "इसमें कोई शक नहीं है कि अगर किसी व्यक्ति के पास पूरे संंसाधन हैं और वे फिर भी अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार या उसे नजरअंदाज करता है तो उस पर सीआरपीसी की धारा 125 के तहत इस आदेश जारी किया जा सकता है। खंडपीठ ने कहा, 'इस बात में कोई शक नहीं होना चाहिए कि अगर कोई व्यक्ति पर्याप्त संसाधन होते हुए भी अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार करता है तो ऐसे मामले में सीआरपीसी की धारा 125 के तहत आदेश जारी किया जा सकता है।' 
खंडपीठ ने कहा, 'कभी-कभार पति अनुरोध करता है कि उसके पास गुजारा-भत्ता देने के लिए संसाधन नहीं हैं क्योंकि वह नौकरी नहीं कर रहा है या उसका कारोबार सही नहीं चल रहा है। यह सब कोरा बहाना होता है। हकीकत यह है कि उनके मन में कानून का सम्मान ही नहीं होता है।' सुप्रीमकोर्ट ने लखनऊ की शमीमा  फारूकी से जुड़े एक मामले में अपना यह फ़ैसला सुनाया। 
आरोप है कि उसके पति शाहिद खान ने उनके साथ बुरा बर्ताव किया था। खान ने फिर दूसरी शादी कर ली और शमीमा  को गुजारा भत्ता देने से इनकार कर दिया था। 
शमीमा ने 1998 में अपील की थी, जिस पर 2012 में सुनवाई शुरू हो सकी। खान ने पहले दावा किया था कि सीआरपीसी की धारा 125 मुस्लिम महिला के मामले में लागू ही नहीं होती और उनका तलाक शादी के पांच साल बाद 1997 में हो गया था और उन्होंने मेहर लौटा दी थी। काबिले ज़िक्र है कि कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट पहली शादी के रहते दूसरी शादी करने पर उत्तर प्रदेश के एक मुस्लिम अधिकारी को नौकरी से बर्ख़ास्त करने के फ़ैसले को उचित ठहरा चुकी है |
23 अप्रैल 1985 को सुप्रीमकोर्ट ने मुहम्मद अहमद खां बनाम शाहबानो बेगम मुक़दमे में जो फ़ैसला सुनाया था और मुसलमानों के विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने संसद द्वारा इसके विरोध में क़ानून बनवाकर इसके अमलदरामद पर रोक लगवा दी थी , ठीक वैसा ही फ़ैसला 29 साल के बाद 2014 में सुप्रीमकोर्ट द्वारा दिया गया था | यह मुस्लिम पर्सनल ला में सीधा हस्तक्षेप था और है |
 इसे एक इत्तिफ़ाक़ ही कहेंगे कि शाहबानो मामले का फ़ैसला अप्रैल महीने में आया था , पिछले साल भी ऐसा ही फ़ैसला अप्रैल के महीने में ही आया था , जब लोकसभा के लिए मतदान हो रहे थे | ऐसे में यह माना जा सकता है कि शाहबानो मामले के फ़ैसले के समय चुनावी माहौल रहा होगा | गत वर्ष  26 अप्रैल को शमीम बानो बनाम अशरफ़ खां मुक़दमे की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपक मिश्र और जस्टिस विक्रमजीत सेन की खंडपीठ ने अपने फ़ैसले में मुस्लिम महिला को इद्दत [ तलाक़ के बाद तीन महीने तक ] की अवधि पूरी होने के बाद भी पति से गुज़ारा भत्ता लेने का हक़दार ठहराया था | इस बार के 6 अप्रैल 15 के फ़ैसले में भी जस्टिस दीपक मिश्रा शामिल हैं , जो पिछले साल 26 अप्रैल 15 की खंडपीठ में शामिल थे |
पीठ ने कहा था कि मुस्लिम महिला [ तलाक़ अधिकार संरक्षण ] क़ानून की धारा 3 के तहत गुज़ारा भत्ता देने की व्यवस्था सिर्फ़ इद्दत तक सीमित नहीं है |  देश के मुसलमान "मुस्लिम पर्सनल लॉ अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 द्वारा शासित हैं |"  यह मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ को निर्देशित करता है जिसमें शादी, महर, तलाक, रखरखाव, उपहार, वक्फ, चाह और विरासत शामिल है | 
सुप्रीमकोर्ट का गत वर्ष का फ़ैसला फ़ैसला भी सहज रूप से विवादकर था और यह ताज़ा फैसला भी आपत्तिजनक है , क्योंकि यह इस्लाम की शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है | इस प्रकार यह मुस्लिम पर्सनल ला में सीधा हस्तक्षेप है | देश के शीर्ष मुस्लिम संगठन जमाअत इस्लामी हिन्द के महासचिव जनाब नुसरत अली ने ताज़ा मुक़दमे में महिला - अधिकार और स्वतंत्रता के नाम पर तलाक़ के बाद भी मुस्लिम महिला को जब तक कि वह शादी न करे उसको नान - नफका [ गुज़ारा भत्ता ] दिए जाने के फ़ैसले को खुले तौर पर ग़ैर इस्लामी और शरीअत - विरुद्ध ठहराया है |उन्होंने इसको मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप मानते हुए स्पष्ट किया कि मुसलमान अपने दीन [ धर्म ] से प्रगाढ़ रूप से जुड़े हैं और क़ुरआन के आदेशों को अपनी आस्था का अभिन्न अंश समझते हैं | वे ऐसे अदालती फ़ैसलों को जो सम्मान्य जजों की इस्लामी आदेशों से अनभिज्ञता या उनको नजरअंदाज करके दिए जाते हैं उन्हें बदलने हेतु हर संभव क़ानूनी कोशिश जारी रखेंगे | उन्होंने मुसलमानों से दर्दमंदाना अपील की कि वे अपनी शानदार रिवायत से मज़बूती के साथ जुड़े रहें और और निकाह , तलाक़ और अन्य पारिवारिक व सामाजिक मामलों - समस्याओं में शरीअत से गहरा रिश्ता क़ायम रखें | 
कुछ लोग यह भी कहते हैं कि देश में एक ही नागरिक क़ानून होना चाहिए , जिसका भारतीय संविधान समर्थन करता है | इसके अनुच्छेद 44 [ नीति निर्देशक तत्व ] में समान सिविल कोड की परिकल्पना की गयी है | इसके हवाले से सुप्रीमकोर्ट केंद्र सरकार को पहले सुझाव दे चुकी है कि पूरे देश में समान सिविल कोड लागू करे | संघ परिवार इसके लिए बहुत लालायित दिखता रहा है , जबकि यह सच्चाई सबको पता है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में इसे लागू कर पाना असंभव है |  लेकिन वोटों की राजनीति को चमकाने के लिए इसके लिए दुष्प्रयास किए जाते रहे हैं | 
मदनलाल खुराना जिन्हें भाजपा ने काम निकल जाने के बाद गंदे - बदबूदार कीचड़ में फेंक दिया था , जब दिल्ली के मुख्यमंत्री थे , तब उन्होंने इस बाबत एक प्रस्ताव विधानसभा में पारित तक करवा लिया था | मध्यप्रदेश प्रदेश विधानसभा में भी भाजपा के लोगों ने भी ऐसे दुष्प्रयास किए , जो अंततः नाकाम हो गये , क्योंकि ये नाकाम होने ही थे | यह संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त उनके मौलिक अधिकारों के सर्वथा विपरीत है | संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अंतःकरण और धर्मानुसार अमल करने की आज़ादी देता है | ऐसी ही बात संविधान की प्रस्तावना में कही गई है |
संविधान में धाराओं 25(1) और 26 के अंतर्गत जो बातें कही गई है उनका सार यह है कि हर धार्मिक समुदाय को इसका अधिकार प्राप्त होगा कि अपने धर्म पर चले, तथा अपने तौर पर अपने धार्मिक क्रिया-कलाप अंजाम दे। अतः यह सिर्फ़ मुसलमानों (या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों) का मामला ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधान का भी तक़ाज़ा है कि उसके अंतर्गत देश में समान सिविल कोड लागू न हो। 
यही आदर्श बात भी है | मुसलमानों ने भी समान सिविल कोड को लागू नहीं किया | जब वे लगभग नौ सौ वर्ष देश के शासक रहे , कभी भी उन्होंने हिन्दू या अन्य धर्मानुयायी जनता पर अपना क़ानून नहीं थोपा | अंग्रेज़ों ने लार्ड मैकाले की अध्यक्षता में समिति बनकर भारतीय दंड संहिता , भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता , भारतीय व्यवहार प्रक्रिया संहिता , भारतीय साक्ष्य अधिनियम आदि बहुत - से क़ानून लागू कर दिए , लेकिन समान सिविल कोड की ओर नहीं बढ़े , क्योंकि वे ज़ालिम होने के बावजूद यह जानते थे कि यह किसी भी क़ीमत पर लागू नहीं हो सकता | 
उन्होंने मुसलमानों के लिए पारिवारिक क़ानून 1937 और अलग से मुस्लिम मैरिज डिज़ुलेशन एक्ट 1939 बनाया | देश के किसी भी ख्यातलब्ध विचारक एवं विद्वान ने समान सिविल कोड का समर्थन नहीं किया है | संविधान निर्माता डॉ . अंबेडकर ने संविधान निर्मात्री सभा में नीति निर्देशक तत्व की धारा 44 में इस बाबत रखे गये प्रावधान पर दक्षिण के कुछ मुस्लिम सदस्यों की आपत्ति का जवाब देते हुए कहा था कि जब तक सब देशवासी इसके लिए राज़ी नहीं होंगे , इसे कदापि लागू नहीं किया जाएगा |
 देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं . जवाहरलाल नेहरू ने कई बार इसी आशय का मत प्रकट किया था | तत्कालीन सरसंघ चालक गुरु गोलवलकर ने भी इसकी आवश्यकता को सिरे से ख़ारिज किया है | 20 अगस्त 1972 को दिल्ली स्थित दीनदयाल शोध संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने साफ़ कहा था कि देश में समान सिविल कोड अवांछित है | उन्होंने कहा था कि जो लोग समान सिविल कोड की बात करते हैं , वे भारत की ज़रूरत समझते ही नहीं हैं | गुरु जी ने इसी आशय के उद्गार एक इंटरव्यू में व्यक्त किए थे , जो 26 अगस्त 1972 को ' मदरलैंड ' में छपा था | 
आश्चर्य की बात है कि संघ परिवारी अपने गुरु जी की बात का बार - बार अनादर करते हैं | भाजपा के हाल के चुनाव घोषणापत्र में इसकी बात है | भाजपा नेताओं द्वारा इसकी ज़रूरत बार - बार बताकर गुरु जी की आत्मा को ठेस पहुंचाई जाती है | सुप्रीमकोर्ट का ताज़ा फ़ैसला भी अवांछित है | एक ओर देश में मौजूद मुस्लिम पर्सनल ला में बहुत - सी ख़ामियां हैं , जिन्हें दूर करने की ज़रूरत है , दूसरी ओर इन खामियों को और नहीं बढ़ाया जाना चाहिए |

'11 साल सलाखों के पीछे '

'11 साल सलाखों के पीछे

यह एक किताब का शीर्षक है | यह 44 वर्षीय मुफ्ती अब्दुल कय्यूम की जेल की ज़िन्दगी की दर्दनाक कहानी है | सुप्रीमकोर्ट ने उनको पिछले साल 16 मई को 24 सितंबर 2002 के अक्षरधाम मंदिर [ अहमदाबाद , गुजरात ] पर हुए आतंकी हमले में मुक्त कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उन पर लगे सभी आरोपों को हटाते हुए बेक़सूर लोगों को गलत आरोपों में फंसाने के लिए गुजरात सरकार पर तीखी टिप्पणी की | अदालत ने इस मामले में पांच अन्य को भी बेक़सूर क़रार दिया |  
मुफ़्ती साहब को घटना के लगभग एक साल बाद 28 अगस्त  2003 को गिरफ्तार किया गया था | यह संयोग ही है कि जिस दिन उनको रिहा किया गया था , उसी दिन नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे | 
उल्लेखनीय है कि अक्षर धाम हमले में 33 लोग मारे गए थे और 80 से अधिक घायल हो गए थे | गुजरात की निचली अदालत ने अब्दुल कय्यूम समेत दो लोगों को दोषी करार  देते हुए मौत की सजा दी थी | मुफ़्ती अब्दुल कय्यूम ने अपने जीवन के 11 साल सलाखों पीछे काटे।उन्होंने पिछले एक साल का पूरा वक्त 200 पेज की एक किताब लिखने में लगाया। इस किताब में इन्होंने राज्य में खुद के साथ हुई नाइंसाफी के दर्द को बयां किया है। किताब का विमोचन अगले हफ्ते हुआ | 
यह किताब गुजरात पुलिस द्वारा एक बेक़सूर शख्स को कागज़ी कार्रवाई के जरिए आतंकवादी बनाने की जीवंत कहानी बयान करती है | मुफ़्ती साहब को जुर्म कबूल कराने के लिए बार - मारा पीटा गया और बिजली के झटके लगाए गए | पुलिस हिरासत में उन्हें इतना मारा जाता था कि बेहोश हो जाते थे | किसी - किसी दिन दो बार पिटाई की जाती थी और उस वक्त तक पीटा जाता था , जब तक कि वे बेहोश नहीं हो जाते थे | कुख्यात पुलिस अधिकारी डी . जी . वंज़ारा और जी .एस . सिंघल और दो अन्य ने मुफ़्ती साहब को झूठे आरोपों में जेल में डलवाया था | उनसे फर्ज़ी कागज़ों पर दस्तखत कराए गए !
पुलिस ने उन पर आरोप लगाया था कि इन्होंने अक्षरधाम पर हमले करने वाले दोनों आतंकियों को चिट्ठी लिखी थी। पुलिस ने इन दोनों आतंकियों को मार डाला था। पुलिस ने दावा था कि उनकी  लिखी चिट्ठी उसके पास है। इस पुलिस का रवैया इतना ज़लिमाना था कि मुफ़्ती साहब को एक दिन के लिए भी पैरोल नहीं मिला , यहाँ तक कि उनके पिता की मौत पर भी उन्हें नहीं जाने दिया |
किताब जारी करते हुए मुफ़्ती साहब ने कहा कि  'यह किताब केवल मुस्लिमों के लिए नहीं है। यह किताब उन सभी के लिए है जो इस देश का शोषित तबका है। यदि इस किताब के जरिए किसी एक शख्स को भी सरकार की ज्यादती से जूझने में मदद मिलती है तो मुझे खुशी होगी। यह मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।' अपनी रिहाई के बाद 40 साल के मदरसा टीचर अपनी बची ज़िन्दगी को सहेजने में जुटे हैं। 
 मुफ़्ती साहब की पत्नी जो 'आतंकी की पत्नी' का धब्बा लेकर जिंदा रहने के लिए अभिशप्त थीं , बताया, 'मेरा बेटा जैसे-जैसे बड़ा हो रहा था वह लगातार अपने पिता के बारे में सवाल पूछता रहा। हर दिन वह स्कूल जाने से पहले पूछता था कि पापा घर कब आएंगे। मैं उस दर्द को बयां नहीं कर सकती। हर पल दर्द के साथ जिया है।' मुफ़्ती साहब की किताब बिना किसी गुनाह के सलाखों के पीछे कटे एक दशक से ज्यादा वक्त का जिंदा दस्तावेज है। उनके लिए किताब लिखना आसान था , लेकिन अब इतना साहस नहीं है कि वह इस किताब को पढ़ सकें। काश , अन्य बेक़सूर क़रार दिए गए लोग भी इस तरह की सराहनीय कोशिश करते | मुफ़्ती साहब ने सुप्रीमकोर्ट में मुआवज़े और वंज़ारा , सिंघल समेत चार पुलिस अफसरों पर कार्रवाई की मांग करते हुए याचिका दाख़िल की है , जिस पर आगामी 11 मई को सुनवाई होनी है |

फिंगर प्रिंट न उभरने से नहीं बन पा रहा आधार

आधार क़ानूनी तौर पर निराधार , फिर भी पकड़ रहा रफ़्तार 

आधार कार्ड को देश की दूसरी महत्वपूर्ण योजनाओं से जोड़ने की प्रक्रिया को झटका लगा है , क्योंकि देश के कई राज्यों से ऐसी सूचनाएं प्राप्त हो रही हैं कि ऐसे उम्रदराज़ लोगों की बड़ी संख्या है , जिनका आधार कार्ड नहीं बन पा रहा है , क्योंकि उनके हाथ की लकीरें फोटो में नहीं आ प् रही हैं , अतः उनका आधार कार्ड बनाने से इन्कार कर दिया गया है | सुप्रीमकोर्ट ने अभी हाल में इसकी अनिवार्यता पर रोक लगा दी है | कोर्ट ने गत 17 मार्च को देश में आधार कार्ड को सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए बतौर पहचान मानने से मना कर दिया है। इतना ही नहीं हर नागरिक को पहचान देने वाला आधार कार्ड बनवाना अब अनिवार्य नहीं है। यह बात खुद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कही है। सरकार ने यह भी कहा है कि आधार कार्ड बनाने का फैसला लोगों की इच्छा पर है। कोर्ट ने यह आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया , जिसमें आधार कार्ड को बंद किए जाने की मांग की गई है। इसके पीछे तर्क दिया है कि आधार कार्ड में कई तरह की कमियां हैं। सुप्रीमकोर्ट ने ऐसा ही आदेश 20 13 में दिया था , फिर भी उसे अमलन नहीं मन गया ! दूसरी ओर इसे अनिवार्य ठहराना जारी है ! अभी उत्तर प्रदेश के बस्ती ज़िले में मनरेगा में रोज़गार पाने के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य किया गया | सुप्रीमकोर्ट के आदेश को ताक़ पर रखकर मतदाता कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ने का काम ज़ोर - शोर से चल रहा है | ऐसा लगता है कि सरकारें बिना संसद की मंज़ूरी के लूले - लंगड़े आदेश को जिस प्रकार अमली जामा पहनाने में जुटी हैं , उससे कहीं न कहीं संदेह के संदेश उभरते हैं | भाजपा  नेता एवं वर्तमान में हरियाणा में कैबिनेट मंत्री राम बिलास शर्मा ने 26 सितंबर 2013 को अपने फ़ेसबुक पेज पर लिखा था , जिसका शीर्षक था '' 2000 करोड़ का है आधार कार्ड घोटाला, कई गुमनाम कम्पनियों के वारे न्यारे, सब भारतीयों का डाटाबेस बनाकर अमेरिका को सोंपने की तैयारी '' | इस लंबे लेख में उन्होंने कई आपत्तियां की हैं | उन्होंने लिखा कि '' 2000 करोड़ का आधार घोटाला भले ही सबसे बड़ा घोटाला न हो , पर यकीन मानिए सबसे खतरनाक घोटाला यही है क्योंकि इस घोटाले में देश की सुरक्षा के साथ समझोता किया गया है | 1 . अगर आप साधारण बुद्धि का उपयोग करे और सोचे कि जिस कांग्रेस सरकार ने घोटालो का नया इतिहास लिख दिया वह लोगो से आधार कार्ड बनवाने के लिए इतना अनुरोध क्यों कर रही है ? 2 .  जिस कांग्रेस सरकार ने गरीबो को लूटकर आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया उनको आधार कार्ड बनवाने पर सौ रुपये क्यों दे रहे है ? 3 . सोनिया के फोटो के बिना कोई विज्ञापन न देने वाली कांग्रेस क्यों आधार कार्ड के विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहा रही है ? 4 . जब पहचान के लिए पहले से इतने साधन उपलब्ध है तो आधार कार्ड की जरुरत क्यों ? 5 .  जिन सेवाओ में आधार कार्ड की जरुरत नहीं उनमे भी आधार कार्ड की बाध्यता क्यों ? 6 .  आखिर क्या कारण है कि सोनिया गाँधी आधार कार्ड प्रोजेक्ट में इतनी रूचि ले रही हैं ? दुदू [राजस्थान ) में 21  करोडवा कार्ड खुद सोनिया गाँधी ने एक समारोह में वितरित किया | अगर आप सोच रहे है कि आधार कार्ड से किसी को क्या नुकसान हो सकता हैं तो एक उदाहरण से आपको समझाता हूँ | निकट भविष्य सभी भारतीयों की पहचान सम्बन्धी जानकारी आधार कार्ड के डाटाबेस में दर्ज होगी | अगर किसी व्यक्ति ने कांग्रेस या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो आधार कार्ड के माध्यम से उसको आसानी से पहचान लिया जाएगा | ..... उसके बाद किसी एक या अधिक व्यक्तियों को जेल में डाल दिया जाएगा या जहर देकर मार दिया जाएगा | [जैसे राजीव दीक्षित जी को मारा था ) कांग्रेस हमेशा से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और अमेरिका की गुलाम रही है और आधार डाटाबेस को अंततः बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हाथो में दे देगी | अगर आपने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के घटिया उत्पादों के खिलाफ आवाज उठायी |तो वे आधार कार्ड के माध्यम से आपकी गतिविधियों पर नजर रख सकती है | ..... अगले चरण में सभी भारतीयों को RFID [रेडियो चिप या आधार कार्ड चिप ] लगायी जाएगी | इसके लिए सरकार द्वारा तरह -तरह के प्रलोभन भी दिए जायेंगे जो जैसे आधार कार्ड के लिए आजकल दिए जा रहे है | यह चिप लगने के बाद आपका छिपना नामुमकिन हो जाएगा | कांग्रेस और सीआईए के एजेंट आपकी स्थिति का सटीक अनुमान लगा लेंगे क्यों कि यह चिप सेटेलाइट से जुडी होगी | इसकी बाद कांग्रेसी गुण्डे और सीआईए एजेंट आपको ढूंढ़कर गोलियों से भून देंगे | इस चिप की साइज गेहूं के दाने बराबर है । लेकिन नेनो टेक्नोलोजी के कारण इसमें बहुत से डिवाइस लगे हैं । कहा जाता है की इसमें एक नेनो बम भी लगाया गया है जो इसे शरीर के अंदर ही तोड देता है, अंदर छिपे साईनाइड को रिलीज कर देता है । जब कोई  पुलिस अधिकारी किसी क्रिमिनल को शूट करना चाहता हो , तो सिस्टम को अक्सेस करके करवा सकता है । ''
 भाजपा नेता जो लंबे समय तक हरियाणा भाजपा के अध्यक्ष रहे , ने आधार की अन्य खामियां भी गिनाई थीं | भाजपा के दूसरे नेता भी इसके ख़िलाफ़ थे और यह वादा करते थे कि अगर वे सत्ता में आए , तो आधार समाप्त कर देंगे , लेकिन हुआ इसके विपरीत | सत्ता में आते ही इसको और रफ़्तार दे दिया गया ! हरियाणा में भाजपा की खट्टर सरकार अब गायों तक को आधार जैसा कार्ड जारी क्र रही है , जिस पर कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया के अध्यक्ष कार्डिनल बेसलियोस क्लीमिस ने कहा है कि इंसानों की भी फ़िक्र करें ! गौरतलब है कि आधार कार्ड का प्रस्ताव भाजपा ने ही तत्कालीन यूपीए सरकार के समक्ष रखा था , जिसे मनमोहन सिंह सरकार ने मान लिया था और जनता के लिए अनावश्यक रूप से मुश्किलें पैदा की थीं | आज भी भाजपा नीत केन्द्रीय शासनकाल में आधार कार्ड की अनिवार्यता के चलते मतदाताओं को मतदाता सूची के साथ ही अन्य लाभकारी सरकारी योजनाओं से वंचित होने का डर उन्हें सताने लगा है। उल्लेखनीय है कि मतदाता पहचान पत्र  से पहले गैस कनेक्शन की कैश सब्सीडी को लेकर बैंकों के खातों को आधार कार्ड से जोड़ने की प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसके अलावा खाद्य सुरक्षा गारंटी योजना में भी आधार कार्ड की अनिवार्यता सुनिश्चित की गई।यही कारण है कि उम्रदराज लोग फिंगर प्रिन्ट के न आने से आधार कार्ड की सुविधा से वंचित हैं और सभी को डर सताने लगा है कि कहीं वोट देने समेत अन्य अधिकारों और सुविधाओं से वंचित न हो जाएं। बहराइच के मोहल्ला बख्शीपुरा निवासी पं. बागीश पाल ने बताया कि मतदाता परिचय पत्र  के लिये फॉर्म भरकर फिंगर प्रिंट देने गए तो मशीन पर फिंगर प्रिंट ही नहीं आया और उनको बैरंग वापस लौटना पड़ा। इस मोहल्ले के ही बड़ी संख्या में 65 से 85 वर्ष के उम्र के लोग आधार कार्ड की सुविधा से वंचित हैं। इसके अलावा मोहल्ला मीराखेलपुरा निवासी सेना से रिटायर्ड बनवारी लाल (65) ने बताया कि फॉर्म भरकर आधार कार्ड बनवाने का उपक्रम किया तो फिंगर प्रिंट न आने की बात कहकर कैंप से लौटा दिया गया। यही हाल उनकी मां फूलमती (85) के साथ भी हुआ। इतना ही नहीं, नगर समेत समूचे जिले में बड़ी संख्या में उम्रदराज लोग फिंगर प्रिंट के न आने से आधार कार्ड जैसी महत्वपूर्ण सुविधा से वंचित हैं। यह परेशानी उत्तर प्रदेश में ही नहीं, दूसरे राज्यों में भी सामने आ रही है। आधार कार्ड बनाने के लिए फिंगर प्रिंट और आंखों की पुतलियों की भी स्कैनिंग की जाती है। उम्रदराज लोगों के हाथ घिस जाने की वजह से फ्रिंगर प्रिंट नहीं आ पा रहे हैं। ताज्जुब और चिंता की बात यह भी है कि मोदी सरकार का कार्यकाल एक वर्ष पूरा होनेवाला है . लेकिन आधार कार्ड को क़ानूनी रूप देने के लिए अभी तक संसद में विधेयक तक नहीं लाया गया है ! 

Apr 7, 2015

गाय पर सियासत क्यों ? हटाई जाए पाबंदी !

गाय पर सियासत क्यों ? हटाई जाए पाबंदी !

प्रेस कौंसिल के पूर्व अध्यक्ष एवं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू अक्सर सुर्ख़ियों में रहते हैं | उनके बयान विचारणीय भी होते हैं और चिंतनशील भी | काटजू ने  गत 5 अप्रैल को इस तरह के किसी भी प्रतिबंध को लोकतंत्र के खिलाफ करार दिया। वे यह मानते हैं कि गोहत्या पर प्रतिबन्ध की मांग केवल राजनीतिक है। काटजू ने गृहमंत्री राजनाथ के बयान का जिक्र करते हुए अपने ब्लॉग में लिखा है कि वे खुद भी गोमांस खाते हैं , कई बार खा चुके हैं और खाते रहेंगे | इसमें कुछ भी गलत नहीं है। उल्लेखनीय है कि केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों एक कार्यक्रम में कहा था कि उनकी सरकार गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने के लिए आम सहमति बनाने का प्रयास करेगी। हाल में महाराष्ट्र और हरियाणा में गोमांस पर प्रतिबंध लगाया गया था। मार्कंडेय काटजू ने गोहत्या पर प्रतिबन्ध के विरोध में पांच तर्क दिए हैं -.1-मुझे गोमांस खाने में कुछ भी गलत नहीं दिखता है। दुनिया में अधिकतर लोग गोमांस खाते हैं। क्या वे पापी लोग हैं? 2-गोमांस सस्ते प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। भारत में कई लोग उदाहरण के लिए उत्तर-पूर्वी राज्यों- नागालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा और दक्षिणी राज्य केरल, जहां गोमांस की बिक्री पर प्रतिबन्ध नहीं है, इसे खाते हैं। गोमांस की बिक्री पर रोक नहीं है। 3-मैंने भी कुछ एक बार गोमांस खाया है। मैं अपनी पत्नी और रिश्तेदारों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए सामान्यत: गोमांस नहीं खाता हूं। लेकिन अगर मौका मिला, तो मैं इसे जरूर खाऊंगा। मैं किसी को गोमांस खाने के लिए विवश नहीं कर रहा हूं, लेकिन कोई मुझे इससे कैसे रोक सकता है? एक लोकतांत्रिक देश में खाने की आजादी होनी चाहिए। 4-इस तरह के प्रतिबन्ध से दुनिया को हम पर हंसने का मौका मिलता है, क्योंकि इससे हमारी सामंती सोच का पता चलता है। 5-जो लोग गोहत्या को लेकर चिल्ला रहे हैं, वे उन हजारों गायों की जरा भी फिक्र नहीं करते, जिन्हें ठीक से खाना नहीं मिलता है। जब गायें बूढ़ी हो जाती हैं या किसी कारण से दूध देने के लायक नहीं रहती हैं, तो ये लोग उन्हें अक्सर घरों से बाहर निकाल लेते हैं। मैंने गायों को कूड़ा-कचरा खाते देखा है। मैंने गायों की इतनी दुर्दशा देखी है कि उनकी पसलियां तक नजंर आती हैं। क्या यह गोहत्या नहीं है? लेकिन कोई इस बारे में कुछ नहीं कहता। इसी बीच अदालत ने इस मामले में नई टिप्पणी की है | पिछले दिनों बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से पशु संरक्षण क़ानून पर जवाब मांगा है। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि क़ानून में सिर्फ गाय और बैल के वध पर रोक और इनके मांस को पास रखने, खाने पर ही रोक लगाने के पीछे क्या आधार है और इस प्रतिबंध में अन्य पशुओं को क्यों शामिल नहीं किया गया। जस्टिस वी एम कनाडे और ए आर जोशी उन याचिकाओं की सुनवाई कर रहे थे जिनमें महाराष्ट्र पशु संरक्षण (संशोधन) अधनियम की धारा 5 (डी) को चुनौती दी गई है। इस धारा में गाय, बैल जैसे पशुओं के वध, मांस पास रखने और खाने पर प्रतिबंध लगाया गया है।याचिकाओं में मांग की गई है कि अगर इन पशुओं का वध महाराष्ट्र से बाहर होता है तो उनके मांस को राज्य में लाने की अनुमति दी जानी चाहिए। बेंच ने सवाल किया कि राज्य में सिर्फ गाय, बैलों के वध पर ही रोक क्यों लगाई गई? बकरी जैसे दूसरे पशुओं के बारे में क्या? इस पर एडवोकेट जनरल सुनील मनोहर ने कहा कि सरकार इस पर विचार कर रही है। सुनील मनोहर ने कहा, “ये सिर्फ शुरुआत है (गाय, बैल पर प्रतिबंध)। हम दूसरे पशुओं के वध पर रोक पर भी विचार कर सकते हैं। फिलहाल सरकार ने गाय, बैलों के संरक्षण को ज़रूरी समझा।” बाम्बे हाईकोर्ट इस मामले में दाखिल कई याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी | महाराष्ट्र में गोमांस पर लगे प्रतिबन्ध के खिलाफ कई लोगों ने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका डाल रखी है। हिंदू धर्म से ताल्लुक रखने वाले दो याचिकाकर्ताओं ने महाराष्ट्र पशु संरक्षण (संशोधन) अधनियम की धारा 5 (डी) को चुनौती दी है। गोमांस व्यापारियों ने भी कोर्ट से राहत की याचिका पेश की है। इस एक्ट के तहत गाय को मारना या उसका मांस खाना प्रतिबंधित है। एडवोकेट विशाल सेठ और छात्रा शाइना सेन ने हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में इसे मूल अधिकारों का उल्लंघन बताया है। याचिका में कहा गया है,'हम हिंदू हैं और गोमांस खाते हैं। यह हमारे भोजन का हिस्सा है और हमारे लिए पोषण का स्रोत है | गोमांस पर प्रतिबन्ध लगाना और इसे बेचने को अपराध बनाना नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन है।' एक याचिका कहती है कि यह प्रतिबन्ध अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की गुणवत्ता के अधिकार तो उल्लंघन करता ही है साथ ही अनुच्छेद 29 का भी उल्लंघन करता है जिसके तहत संविधान में अल्पसंख्यकों के साथ नस्ल, भाषा, धर्म या संस्कृति के आधार पर भेदभाव अपराध है। इस एक्ट के तहत गोमांस बेचते पकड़े जाने पर पांच साल तक की कैद और 10 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है।
यह सच है कि देश की अर्थव्यवस्था गोश्त और चमड़े के कारोबार पर भी निर्भर है | पशुओं को सिर्फ गोमांस खाने वालों के लिए ही नहीं मारा जाता, बल्कि दवा उद्योग की जरूरतों के लिए भी ऐसा किया जाता है। दवाओं के कैप्सूल, विटामिन की दवाओं और चिकन के चारे में इस्तेमाल होने वाले जेलेटिन को जानवर की हड्डियों और चमड़े की प्रोसेसिंग से बनाया जाता है। एक फार्मा कंपनी के सीनियर ऐग्जिक्युटिव के अनुसार , 'किसी न किसी रूप में हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में गोवंश मांस कन्ज्यूम करते ही हैं।' इंडिया में ज्यादातर जेलेटिन मेकर्स का कहना है कि वे इसे बनाने में भैंस की हड्डियों का उपयोग करते हैं, लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा में गोवध विरोधी कानूनों को देखते हुए कंपनियों को आने वाले दिनों में परेशान किए जाने का डर सता रहा है। केरल की निट्टा जेलेटिन इंडिया लिमिटेड के एमडी सजीव मेनन ने कहा, 'हम भैंस की हड्डियों का इस्तेमाल करते हैं। इसकी पहचान के लिए हमारे पास एक सिस्टम है। मसला यह है कि जो लोग हमारे पास हड्डियां भेजते हैं, वे नंगी आंख से देखकर यह तय नहीं कर सकते कि वे भैंसों की हड्डियां हैं या गायों की। अगर किसी ने बवाल खड़ा कर दिया तो हमारी इंडस्ट्री प्रभावित होगी।' यह कंपनी केरल सरकार और जापान की निट्टा लिमिटेड का संयुक्त उपक्रम है।कंसल्टिंग फर्म ग्लोबल ऐग्री सिस्टम के अनुसार, भारत में सालाना करीब 21 लाख टन कैटल बोन जेनरेट होती है। इसके दम पर भारत जेलेटिन का प्रमुख निर्यातक बना हुआ है। निट्टा के कारखाने गुजरात में हैं। गुजरात जेलेटिन बनाने का प्रमुख केंद्र है। इंडिया में 5,000 करोड़ रुपये की कैप्सूल इंडस्ट्री बड़ी मात्रा में जेलेटिन खरीदती है। अस्थमा के इलाज में काम आने वाली कुछ दवाएं कैप्सूल के जरिये ही दी जाती हैं। कंपनियों का कहना है कि कैपसूल का उपयोग आयुर्वेद ड्रग मेकर्स भी करते हैं। इंडिया में कैपसूल बनाने वाली एक बड़ी कंपनी के एक सीनियर ऐग्जिक्युटिव ने कहा, 'इस प्रतिबंध का सबसे बड़ा झटका उन लोगों को लगेगा, जो हड्डियां इकट्ठा करते हैं। हम तो जेलेटिन इंपोर्ट भी कर सकते हैं, लेकिन उनके लिए यह रोजी-रोटी का मसला है।' उन्होंने कहा कि रोटावायरस जैसी कुछ वैक्सींस और बड़े ऑपरेशन के दौरान खून का थक्का बनने से रोकने में काम आने वाली थ्रॉम्बिन को गाय के भ्रूण से तैयार किए गए सीरम से बनाया जाता है। इस प्रतिबंध से चमड़ा  उद्योग पर भी अस्तित्व का संकट मंडराने लगा है | इस उद्योग में लगे लोगों की आजीविका छिन जाने का भी सता रहा है | जानकारों का मानना है कि इससे चमड़े की खाल की कीमत बढ़ जाएगी जो अप्रत्यक्ष रूप से चीनी प्रॉडक्ट्स को फायदा पहुंचाएगा। लोगों का रुझान चीन के सस्ते प्रॉडक्ट्स की ओर हो जाएगा। महाराष्ट्र में गाय, बैल और बछड़ों को मारने पर लगे व्यापाक प्रतिबंध के कारण पहले से ही अस्तित्व संकट से जूझ रहे कोल्हापुर के लेदर मार्केट की हालत और दयनीय होने का खतरा गहरा गया है। कोल्हापुरी के नाम से मशहूर लेदर फुटवेअर के निर्माताओं पर संकट मंडराने लगा है। पिछले दशक से सामाजिक कार्यकर्ता, शैक्षणिक संस्थान, राजनीतिज्ञ और प्रशासक दम तोड़ रहे इस उद्योग में नई जान डालने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन प्रतिबंध से उन सबके प्रयासों पर पानी फिर सकता है। उल्लेखनीय है कि पिछले साल लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोल्हापुर के चमड़ा करोबारियों के प्रति सहानुभूति प्रकट की थी। उन्होंने कहा था, 'आज पूरे देश को कोल्हापुर की चप्पल की जरूरत है, ताकि पूरा देश तेज गति से चले।' लेकिन, उनकी ही सरकार के दौरान इस तरह का प्रतिबंध लग गया है | राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के स्थानीय नेता धनंजय महादिक ने भी इस मामले से राजनीतिक लाभ उठाते हुआ कहा कि वे स्थानीय उद्योग को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। इस कानून का विरोध करते हुए उन्होंने कहा, 'हजारों लोगों की आजीविका खतरे में पड़ गई है। इस कानून में उनकी आजीविका और भविष्य पर गौर नहीं किया गया है। चमड़ा उद्योग के अनुमान के मुताबिक, हर साल पूरे राज्य में करीब तीन लाख बछड़ों को काटा जाता है और उनकी खाल को चमड़े के सामान तैयार करने में इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन, प्रतिबंध होने के कारण खाल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। अतः समाज और देशहित में इस बात की जरूरत है कि गोहत्या हत्या विरोधी क़ानून को तत्काल खत्म किया जाए |