Mar 13, 2015

क्या तारिक की हत्या हो जाने के बाद ही लागू होगी निमेष आयोग की रिपोर्ट ?

अखिलेश सरकार के तीन साल पूरे 

क्या तारिक की हत्या हो जाने के बाद ही लागू होगी 

निमेष आयोग की रिपोर्ट ?

क्या खालिद मुजाहिद के बाद तारिक कासिमी को भी मारने की साजिश रची जा रही है ? रिहाई मंच ने यह आशंका प्रकट की है कि लखनऊ जेल में तारिक को मौत के घाट उतारने की सजिश के पीछे खुफिया विभाग, पुलिस और सरकार का गठजोड़ सक्रिय है | मंच ने जेल अधीक्षक को तत्काल बर्खास्त करने की मांग की है | उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव सरकार के 15 मार्च को तीन साल भी पूरे हो गये , लेकिन बेकसूरों की रिहाई अभी तक संभव नहीं हो पाई है !नवम्बर 2007 के लखनऊ,वाराणसी और फैजाबाद के कचहरी बम धमाकों में गिरफ्तार तथाकथित  मुख्य आरोपी आजमगढ़ के तारिक कासिमी और जौनपुर के खालिद मुजाहिद मामले में गठित जस्टिस आरडी  निमेष जाँच आयोग  ने  साफ़ किया था कि इन दोनों आरोपियों की गिरफ़्तारी फर्ज़ी है | इनके सिलसिले के घटनाक्रमों में बहुत सारे विरोधाभास सामने आ चुके हैं , जो पुलिस बल की ग़ैरज़िम्मेदाराना कार्यशैली की कहानी बयान करते हैं | पुलिस प्रताड़ना से खालिद की 18 मई 2013 को मृत्यु हो चुकी है | यह भी कहना उचित होगा कि उत्तर प्रदेश की सपा सरकार की कार्यशैली भी विगत अन्य सरकारों से भिन्न नहीं है | यह और बात है कि यही वह सरकार है , जो बेक़सूर क़ैदियों की रिहाई का वादा करके सत्ता में आई थी |  सच यही है कि सपा के चुनाव घोषणापत्र में बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों की रिहाई के लाख दावे किये गये हों , पर अमलन कुछ नहीं हो सका | पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ज़ुबानी तौर पर  चार सौ बेक़सूर मुस्लिम नवजवानों  को रिहा करने की घोषणा कर चुके हैं , किन्तु अमलन एक की भी रिहाई नहीं हो पाई |  बात दरअसल इच्छाशक्ति की है | अखिलेश सरकार चाहती तो निमेष आयोग की रिपोर्ट का हवाला देकर तारिक और खालिद को रिपोर्ट के आने फ़ौरन बाद रिहा कर सकती थी ,लेकिन उसने ऐसा न करके रिपोर्ट को ही दबा दिया | ' आतंकवाद के नाम पर क़ैद बेकसूरों के रिहाई मंच ' ने बार - बार अखिलेश सरकार से मांग की है कि बेकसूरों को अविलम्ब छोड़ा जाए | इस मंच ने तीस जून 13 को  लखनऊ विधानसभा के बाहर ' वादा निभाओ ' धरने का भी आयोजन करके  इस सिलसिले में सरकार को  आठ सूत्रीय ज्ञापन भी सौंपा था , मगर सरकार सोती रही |जमाअत इस्लामी हिन्द ने भी ठोस प्रयास किये और इस दिशा में आज भी प्रयास जारी है | जमाअत के केन्द्रीय नेताओं का एक प्रतिनिधि मंडल दस अक्तूबर 13  को केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे से मिला था और और बेकसूरों को फ़ौरन रिहाई की मांग की थी , लेकिन कुछ न हो सका |   उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पन्द्रह मार्च 12 को  पदभार ग्रहण करने के बाद ही तारिक और खालिद के मामले की फ़ाइलें मंगाई थीं और रिहाई के सिलसिले में गौर किया था | मगर भाजपा जैसी कुछ पार्टियों द्वारा विरोध जताने के बाद रिहाई की दिशा में कोई प्रगति नहीं हो पाई , यहाँ तक कि निमेष आयोग की रिपोर्ट को भी दबा दिया गया | अब अखिलेश सरकार ने अपने कार्यकाल के तीन साल पूरे कर लिए हैं , मगर उसे अपने वादे का ज़रा भी खयाल नहीं है | इस सरकार से यह भी आशा की गयी थी कि सांप्रदायिक ताक़तों को काबू में रखेगी , जिसके नतीजे में प्रदेश में शांति और अम्नोअमान की फ़ज़ा बनेगी , लेकिन हुआ इसके बिलकुल उल्टा |  गुज़रे तीन साल में छोटे - बड़े सैकड़ों दंगे हुए | इन दंगों के सर्वाधिक शिकार मुसलमान ही हुए |  मतलब यह कि सपा सरकार मुसलमानों के हितार्थ कोई भी पोज़िटिव क़दम उठाने में नाकाम रही है |.निमेष जाँच आयोग पुलिस और सरकारों की पक्षपाती भूमिका को उजागर करने में सक्षम है | यह दोनों को कटघरे में खड़ा करती है | आरोपियों के  मोबाइल नंबरों की जांच में लापरवाहियों और दोनों आरोपियों के अपहरण की सूचना परिजनों और स्थानीय नेताओं द्वारा दर्ज कराये जाने के बावजूद जांच का न होना भी आंतकवाद आरोपियों को फंसाये जाने की ओर इशारा करता है | 
जांच आयोग ने गिरफ्तारी के अनियमितता और झोल को कुल14 बिंदुओं में समेटा है |रिपोर्ट के 14वें हिस्से में कहा गया है कि ‘कथित आरोपी तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की 22 दिसंबर 2007को सुबह 6.20 बजे आपत्तिजनक वस्तुओं के साथ गिरफ्तारी संदेहजनक प्रतीत होती है और अभियोजन के गवाहों पर पूर्णरूप से विश्वास नहीं किया जा सकता | ' जांच आयोग ने अपने 12 सूत्रीय सुझावों में कई महत्वपूर्ण सुझाव आतंकवाद मामलों में होने वाली गिरफ्तारियों को लेकर दिये हैं, जिनमें सुझाव संख्या 8 और 11 बेहद महत्वपूर्ण हैं. सुझाव आठ में कहा गया है कि ‘ऐसे मुकदमों के निर्धारण की सीमा अधिकतम 2 साल् होनी चाहिए. केस समय पर निस्तारण न होने पर समीक्षा होनी चाहिए और संबंधित व्यक्ति के विरूद्ध कार्यवाही होनी चाहिए.|' वहीं सुझाव संख्या 11 में ‘झूठे मामलों में फंसाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही’ और सुझाव 9 में गिरफ्तार बेक़सूर लोगों को मुआवज़ा देने की बात कही गयी है | 135 पन्नों की यह रिपोर्ट एक सदस्यीय जाँच आयोग के अध्यक्ष और पूर्व न्यायाधीश आरडी निमेष ने 31 अगस्त 12 को ही सरकार को सौंप दी थी , लेकिन सरकार रिपोर्ट जारी करने को तैयार नहीं थी | सरकार जानती थी कि रिपोर्ट जारी होते ही मानवाधिकार संगठन और मुस्लिम समुदाय निर्दोषों को छोड़ने, फंसाने वाले पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई  करने को लेकर दबाव बनायेंगे |अखिलेश सरकार ने इस रिपोर्ट को 4 जून 13 को स्वीकार तो कर ली , लेकिन इस पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है | अतः इस जाँच रिपोर्ट के आने 6 साल लग गए , मगर पीड़ितों को न्याय नहीं मिला ! निमेष आयोग ने गिरफ्तारियों पर संदेह का आधार गिरफ्तारियों के दिन के अखबारों में छपी रिपोर्टों और पुलिसिया कहानी के गंभीर अंतर को बनाया है | यह पूरा मामला खुले झूठ पर टिका है | दूसरी ओर ज़ुल्म - ज्यादती भी जारी है | खालिद मुजाहिद की पुलिस द्वारा हत्या का आरोप है है , अब तारिक की भी हत्या की आशंका प्रकट की जा रही है | जेल में यातना और उत्पीड़न का लगातार चलता रहता है |. वाकिया यह है कि तारिक का अपहरण 12 दिसंबर 2007 को दिन में किया जाता है, अखबार 13 को खबर प्रकाशित करते हैं और पुलिस गिरफ्तारी के दस दिन बाद 22 दिसंबर को बाराबंकी से इन दोनों आरोपियों की गिरफ्तारी गोला-बारूदों के साथ दिखाती है | वह भी गिरफ्तारी तब दिखाती है जब नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के प्रदेश तत्कालीन अध्यक्ष चौधरी चरण पाल राज्यपाल को यह ज्ञापन देते हैं कि अगर 22 दिसंबर को तारिक कासमी को उनके परिजनों को नहीं सौंपा गया तो वह दिन के 22 दिसम्बर को ही 2 बजे कोटला मदरसे  के सामने आत्मदाह कर लेंगे | साथ ही तारिक के दादा ने एसटीऍफ़ की  इस ग़ैरकानूनी हरकत की लिखित सूचना 14 दिसम्बर 2007 रानी की सराय थाने को दी थी | पीपुल्स विजलेंस  कमेटी आन ह्यूमन राइट्स [ PVCHR] के महासचिव डॉ . लेनिन रघुवंशी का कहना है कि इस मामले में  पुलिस ने जिन सामानों की बरामदगी दिखाई , उन्हें अमलन पेश नहीं किया . सिर्फ़ कागज़ों में ही डिस्पोज़ल किया गया . उ . प्र . एसटीएफ ने उक्त दोनों नवजवानों के खिलाफ़ कार्रवाई उनके इक़बालिया बयानों के आधार पर की थी और इन बयानों को पुलिस ने अपने मन से लिखा था ! डॉ . रघुवंशी के अनुसार , उ . प्र . के तत्कालीन पुलिस प्रमुख विक्रम सिंह और एसटीएफ प्रमुख बृज लाल ने ने योजनाबद्ध  तरीक़े से मुस्लिम नवजवानों को आतंकी घटनाओं में निरुद्ध किया था | निमेष आयोग ने दोषी पुलिस अफसरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की भी सिफ़ारिश की |.रिहाई मंच के अध्यक्ष और तारिक कासमी के वकील मुहम्मद शुऐब ने हाल में जारी एक बयान में कहा है कि तारिक कासमी के हाई सिक्योरिटी सेल में जेल प्रशासन ने गोरखपुर के कुख्यात अपराधी चंदन को रख दिया है जो उन्हें समुदाय  सूचक गालियां  और जान से मारने की धमकी देता है। उन्होंने कहा कि यह सिलसिला पिछले कई
दिनों से चल रहा है जिसकी शिकायत के बावजूद भी जेल प्रशासन ने कोई  कार्रवाई नहीं की है ,वहीं उक्त अपराधी तारिक और आतंकवाद के आरोप में बंद अन्य लोगों को मारने की धमकी के साथ यह भी कहता है कि प्रशासन उसके साथ है। रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि हाई सिक्यूरिटी सेल में अक्सर आतंकवाद के आरोपियों को ही रखा जाता है | ऐसे में किसी अपराधी को उनके बैरक में रखे जाने से इसकी आशंका बढ़ जाती है कि ऐसा आतंक के आरोपियों को जान
से मरवाने के लिए जेल प्रशासन कर रहा है। उन्होंने कहा कि कचहरी विस्फोटों में आरोपी बनाए गए खालिद मुजाहिद की जेल अभिरक्षा में 18 मई 2013 को हुई हत्या के बाद यह संभावना और बढ़ जाती है कि तारिक कासमी को भी मारने की साजिश रची जा रही है | खालिद की ही तरह तारिक की गिरफ्तारी को भी निमेष कमीशन की रिपोर्ट ने फर्जी बताया था। रिहाई मंच ने  कहा कि निमेष कमीशन की रिपोर्ट में दोषी बताए गए पुलिस और खुफिया विभाग के अधिकारियों के खिलाफ सपा सरकार द्वारा कार्रवाई नहीं किया जाना और खालिद की हत्या की जांच में बार-बार पुलिस को क्लीनचिट दिया जाना साबित करता है कि पुलिस और खुफिया विभाग के अधिकारी अब इस मामले में जिंदा बचे और खालिद की हत्या के गवाह तारिक कासिमी को भी सरकार की सांठगाठ के साथ मारने की साजिश रच रहे हैं और इसीलिए चंदन नाम के अपराधी को वहां हत्या के मक़सद से रखा गया है। प्रवक्ता ने कहा कि जेल प्रशासन तारिक को मारने की पहले भी कोशिश कर चुका है , जिसके बारे में उन्होंने सरकार और प्रशासन को पत्र लिख कर शिकायत की थी और रिहाई मंच ने तत्कालीन राज्यपाल अजीज कुरैशी से मिलकर भी इस सवाल को उठाया था। उन्होंने कहा कि पूरे देश में आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से फंसाए गए मुस्लिम युवकों का कुख्यात अपराधियों से हत्या करवाने की परम्परा नई नहीं है। ठीक इसी तरह इंडियन मुजाहिदीन के
आतंकवाद के झूठे आरोप में पकड़े गए दरभंगा निवासी कतील सिद्दीकी की भी महाराष्ट्र के यरवदा जेल में 8 जून 2012 में खुफिया विभाग और एटीएस के अधिकारियों ने अपराधियों से हत्या करवा दी थी। उन्होंने कहा कि ठीक इसी तरह पिछले महीने ही जर्मन बेकरी विस्फोट मामले
में निचली अदालत से विवादित फांसी की सजा पाए हिमायत बेग , जिसकी सजा पर शुरू से ही  सवाल उठते रहे हैं और यहां तक कि तीन जांच एजेंसियों एन.आई..ए, ,दिल्ली स्पेशल सेल और सेंट्रल क्राइम ब्रांच बेंगलुरू ने भी उसे क्लीनचिट दी है, पर भी 19 फरवरी को यरवदा जेल में एक अपराधी ने जानलेवा हमला किया था। उन्होंने निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर तत्काल अमल करने की मांग करते हुए जेल अधीक्षक को बर्खास्त करने की मांग की।

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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