Mar 24, 2015

हाशिमपुरा के हिंसा पीड़ितों को कब मिलेगा इन्साफ ?

हाशिमपुरा के हिंसा पीड़ितों को कब मिलेगा इन्साफ ?

हाशिमपुरा [ मलियाना - मेरठ ] गोली कांड के असली क़ातिलों को 27 साल के बाद आख़िरकार उन लोगों ने बचा लिया है , जो अक्सर अद्ल व इन्साफ के विरोधी दिखते हैं और अपने घिनौने मफ़ाद को हासिल करने के लिए सरगर्म रहते हैं | दिल्ली में तीस हजारी की एक अदालत ने गत 21 मार्च को 1987 के हाशिमपुरा जनसंहार के सभी 16 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। 
उत्तर प्रदेश के मेरठ में स्थित हाशिमपुरा में पी ए सी के जवानों ने 42 मुसलमानों की हत्या कर दी थी | यह गोलीकांड पुलिस की बर्बरता , नृशंसता और हैवानियत का जीता - जागता क्रूरतम मामला है , लेकिन राज्य और केंद्र सरकारों ने इस मुक़दमे में अपनी जिस कारकर्दगी का प्रदर्शन किया है , वह निहायत ही अफ़सोसनाक , निंदनीय और अमानवीय है | अदालत ने कहा कि सबूतों, खास तौर पर आरोपियों की पहचान से जुड़े सबूतों का अभाव था। साथ ही अदालत ने पीड़ितों के पुनर्वास के लिए मामला दिल्ली राज्य विधि सेवा अधिकरण के हवाले कर दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजय जिंदल ने कहा कि सभी आरोपी बरी किए जाते हैं।  बरी किए गए लोगों में सुरेश चंद शर्मा, निरंजन लाल, कमल सिंह, बुद्धि सिंह, बसंत बल्लभ, कुंवर पाल सिंह, बुद्धा सिंह, रामबीर सिंह, लीलाधर, हमबीर सिंह, मोकाम सिंह, शमीउल्लाह , श्रवण कुमार, जयपाल सिंह, महेश प्रसाद और राम ध्यान शामिल हैं। महेश प्रसाद और कुंवर पाल सिंह के अलावा सभी आरोपी अदालत में मौजूद थे और जमानत पर रिहा हैं। अदालत ने अभियोजन, आरोपी और पीड़ितों के वकील से कुछ स्पष्टीकरण मांगने के बाद पिछली 21 फरवरी को शनिवार के लिए फैसला सुनाने की तारीख तय की थी। अदालत ने इससे पहले 22 जनवरी को अंतिम दलीलों को सुनने के बाद अपना सुरक्षित रख लिया था। विशेष लोक अभियोजक सतीश टम्टा ने कहा कि प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी कर्मी 22 मई को 1987 में आए थे और वहां एक मस्जिद के बाहर एकत्र 500 में से तकरीबन 50 मुसलमानों को उठाकर ले गए। अभियोजन पक्ष ने कहा कि पीड़ितों को आरोपियों ने गोली मार दी और उनके शव एक नहर में फेंक दिए। जनसंहार में 42 लोगों को मृत घोषित किया गया। इस घटना में पांच लोग जिंदा बच गए, जिन्हें अभियोजन ने गवाह बनाया। ये पांच गवाह आरोपियों को पहचान नहीं पाए। इस मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गाजियाबाद के समक्ष 1996 में आरोपपत्र दायर किया गया था। इसमें 19 लोगों को आरोपी के तौर पर नामजद किया गया था |सुनवाई के दौरान 19 में से तीन आरोपियों की मौत हो गई | 16 के खिलाफ 2006 में यहां की अदालत ने हत्या, हत्या का प्रयास, सबूतों के साथ छेड़छाड़ और साजिश के आरोप तय किए थे | सितंबर 2002 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मामला दिल्ली स्थानांतरित किया गया।  मामले की जांच करने वाली उत्तर प्रदेश की सीबी-सीआइडी ने 161 लोगों को गवाह के तौर पर सूचीबद्ध किया था। मामले में आरोपपत्र 1996 में गाजियाबाद के चीफ जूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में दाखिल की गई थी, लेकिन सितंबर, 2002 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस मामले को दिल्ली हस्तांतरित किया गया। 
साल 2006 में आरोपियों के खिलाफ हत्या, हत्या की कोशिश, सबूतों से छेड़छाड़ और साजिश रचने के आरोप तय किए गए थे। यह सरकारी आतंकवाद से सीधा जुड़ा हुआ मामला है , जिसमें सबने पी ए सी के जवानों को बचाया ही और इन्साफ की राह में बहुत - सी अडचनें पैदा कर दीं | कांग्रेस , सपा , बसपा - ये सभी एक ही भगवाई रंग में रंगी नज़र आती हैं | हालत इतनी बदतर कर डाली गई कि मुस्लिम नवजवानों को भूनने वाले जवानों के खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई ! पीड़ितों ने इसके लिए बार - बार गुहार लगाई , किन्तु कोई नतीजा सामने नहीं आया | जो पहले से तय कर लिया गया था कि कोई कार्रवाई नहीं होगी , वही हुआ | हद तो यह हो गई कि इस मामले की सुनवाई ही लंबे समय तक ठप रही | जब पीड़ितों ने आर टी आई का सहारा लिया और 24 मई 2007 को लखनऊ पहुंचकर डी जी पी आफ़िस में 615 आर टी आई आवेदन भरे , तब जाकर उन्हें मामले की प्रगति का पता चला ! सितंबर 2007 में उन्हें जो सूचना दी गई , उसमें यह भी बताया गया कि किसी भी आरोपी जवान के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई है , यहाँ तक कि उनके वार्षिक विश्वसनीय  रिपोर्ट [ ACR ] में भी कुछ दर्ज नहीं किया गया | उल्लेखनीय है कि इस मामले में 11 साल तक पी ए सी के क़ातिल जवान अदालत में पेश ही नहीं हुए , जो उनके राजनीतिक संरक्षण का खुला सबूत है | मई 2000 में 16 जवानों ने अदालत में सरेंडर किया | दरअसल यह मामला भी सीधे सांप्रदायिक सियासत से जुड़ा हुआ है | अप्रैल 1987 में केंद्र की राजीव गाँधी सरकार बाबरी मस्जिद का ताला खोलवाया था और वहां पूजा - पाठ शुरू कर दिया गया , जिसके चलते माहौल तनावपूर्ण हो गया था | यह तनाव अन्य स्थानों तक पहुंच चुका था | 19 मई 1987 को हापुड़ रोड , गोला कुआँ और पलोखड़ी में हिंसा की कुछ घटनाएं घटीं , जिनके कारण हालात और तनावपूर्ण हो गए थे | जैसा की उत्तर प्रदेश में अक्सर देखा गया है कि पी ए सी मुस्लिमकुशी का काम करती है | उसे यहाँ बुलाया गया | उसने आते ही मुसलमानों को पकड़ना और सताना शुरू कर दिया , मगर इतने से उसकी तबियत न भरी तो मुसलमानों के सामूहिक हत्या का जघन्य प्लान बना डाला गया | भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी के आरोपों के मुताबिक़ , इस सामूहिक हत्या में कांग्रेसी नेता पी चिदंबरम की भूमिका थी , जो उस वक्त गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सुरक्षा राज्य मंत्री थे | स्वामी ने जून 2012 में पत्रकारों से कहा था कि इस सिलसिले में उनके पास पर्याप्त सबूत हैं | उन्होंने कहा कि ' चिदंबरम ने मेरठ जाकर एक बैठक की थी , जिसमें उन्होंने अधिकारियों से कहा था कि 200 - 300 ऐसे नवजवानों को गोली से उड़ा दो , तो दंगे कभी नहीं होंगे | उस वक्त सांसद रहीं मुहसिना किदवाई उस बैठक की गवाह हैं , लेकिन उन्हें उस बैठक में शामिल होने से जबरन रोक लिया गया था | ' स्वामी ने यह भी कहा था कि इस मामले में वे अदालत में जनहित याचिका दाख़िल करेंगे और ज़रूरत पड़ने पर अंतर्राष्ट्रीय अदालत की भी शरण लेंगे , लेकिन उन्होंने कुछ न किया | वास्तव में इस मामले की अगर ठीक से पैरवी होती तो इन्साफ़ की अधिक आशा थी | उल्लेखनीय है कि रमज़ान के आख़िरी अशरे में यह निर्मम सामूहिक हत्या की गई | जुमअतुल विदाअ , 22 मई 1987 को पी ए सी के प्लाटून कमांडर सुरेन्द्र पाल सिंह ने हाशिमपुरा स्थित मस्जिद से बड़ी तादाद में मुसलमानों को पकडवाया | फिर बच्चे - बच्चियों को अलग करवा दिया | बच गए 43 रोज़ेदार नवजवान , जिनमें ज़्यादातर दिहाड़ी के मज़दूर और बुनकर थे | इन सबको ट्रक में भेड़ - बकरियों की तरह भरकर गाज़ियाबाद के मुरादनगर गंग नहर के पास ले जाया गया , जहाँ सभी को एक लाइन में खड़ा करके गोलियों से भून डाला गया और लाशों को गंग नहर में फेंक दिया गया | गोली लगने के बाद पांच मुसलमानों की जान बच गई , जिनमें नसीम आरिफ़ , मुजीबुर्रहमान , ज़ुल्फ़िकार नासिर और मुहम्मद उस्मान शामिल हैं |ऐसे में वर्षों बाद आया अदालत का फ़ैसला हिंसा पीड़ितों समेत सभी इन्साफपसन्द लोगों को अंदर से हिला दिया |  हाशिमपुरा हक्का-बक्का रह गया। कोर्ट से ऐसा फैसला आएगा, इसकी उम्मीद उन्हें सिरे से नहीं थी | फैसले के बाद लोगों ने सरकार, प्रशासन के खिलाफ गुस्सा जताया। महिलाएं फूट-फूटकर रोने लगी। लोग उम्मीद लगाए बैठे थे कि आरोपियों को सख्त सज़ा मिलेगी | लेकिन उन्हें साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया जाएगा ऐसा किसी ने सोचा तक नहीं था। कुछ लोग मान रहे थे कि कम से कम आजीवन कारावास तो होगा ही । इन्साफ की खातिर अब इस फ़ैसले के खिलाफ अपील करने के सिवा मुसलमानों के सामने अन्य कोई विकल्प नहीं बचा है |

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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