Mar 22, 2015

अच्छे दिन कब आएंगे ?

बढ़ती महंगाई से आम जन दिनोंदिन परेशान

क्या कोई बता सकता है कि अच्छे दिन आने का जो सब्ज़बाग भाजपा ने दिखाया था , वह ज़मीनी हक़ीक़त में कब परिवर्तित होगा ? सत्ताधारी दल के लोग और विभिन्न स्तरों के भाजपाई पहले यह कहते नहीं थकते थे कि 30 दिनों में ही ये अच्छे दिन नहीं आ सकते , इनके लिए तीन - छह महीने का वक्त तो दीजिए | अब तो केंद्र सरकार गठन के नौ महीने पूरे होनेवाले हैं , मगर मुश्किलों और कठिनाई भरे दिनों के सिवा सरकार ने दिया क्या है ? क्या ऐसे ही भाषणों से आमजन का पेट भरेगा ? पेट्रोल , डीज़ल के जो दाम घटे हैं , कुछ भाजपाई इसे सरकार की उपलब्धि बताकर जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं | सच्चाई यह है कि ये दाम तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल के दाम घटने से ही संभव हो पाए हैं | लेकिन यहाँ भी सरकार ने दंडी मारी है और महंगाई की मार से कराहती जनता को जितनी राहत मिलनी चाहिए , उतनी राहत नहीं मिल पाई ! मतलब यह तेल के दाम जितने घटे हमारे देश में उतने कम नहीं हुए ! तेल कंपनियों को जान - बूझकर मालामाल किया जा रहा है और आम जनता को कंगाल !
मतदाताओं ने बढ़ती महंगाई और सब्सीडी पाने के लिए आधार जैसे जंजाल में जनता को फांसने
की वजह से कांग्रेस को सत्ता से हटाया था |  भाजपा ने इन समस्याओं से निजात दिलाने का वादा भी किया था | सत्ता में आने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , वित्त मंत्री अरुण जेटली , वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण आदि ने इस ओर प्राथमिकता के साथ क़दम उठाने के बयान दिए थे , मगर अच्छे दिन न आने , न ही आ सके | फिर इन मोर्चों पर नाकामी को देखते हुए केंद्र सरकार ने कांग्रेस की तर्ज़ पर पुराना राग अलापना शुरू कर दिया है
प्रधानमंत्री महोदय ने यह कहना शुरू कर दिया है कि जनता के दीर्घकालीन कल्याण के लिए थोड़ी कड़वी घूंट तो पीनी ही होगी। दूसरी ओर यह भी कहा जा रहा है कि मोदी सरकार की कोशिशों से देश का औद्योगिक उत्पादन बढ़ा है , लेकिन औद्योगिक उत्पादन बढने का लाभ आम जन को कितना और किस रूप में मिल रहा है , कोई नहीं बता पा रहा है ! सच है कि आर्थिक शब्दजालों से आम जनता अनजान है | वह समझती है कि महंगाई दर घटने का मतलब उपभोक्ता सामानों का सस्ता होना है | लेकिन जब वह बाज़ार जाता है , तो पिछले महीने की तुलना में अधिक कीमत पर चीज़ें खरीद कर लाता है। तब उसे अस्लियत का पता चलता है
वास्तव में महंगाई घटना एक भ्रमित शब्दजाल है | इसकी सच्चाई ट्रेन की स्पीड के उदाहरण से समझा जा सकता है | माना कि पिछले साल अक्टूबर में खुदरा महंगाई के रेल 110 किमी की रफ्तार से दौड़ रही थी | अब उसकी रफ्तार धीमी होकर 65 किमी हो गई है । इसी प्रकार थोक कीमतों की मुद्रा स्फीति रेल पिछले साल 72 किमी की रफ्तार से दौड़ रही थी | अब यह धीमी होकर 17 किमी की रफ्तार से चल रही रही है । कहने का मतलब है कि महंगाई कम नहीं हुई है , बल्कि बढऩे की रफ्तार धीमी हुई। वर्तमान परिस्थितियों में धीमी रफ्तार भी एक उपलब्धि है । 
वस्तुओं की लागत में वृध्दि के कारण महंगाई शून्य स्तर पर तो नहीं लाई जा सकती, किन्तु इसे न्यूनतम स्तर पर रखा जा सकता है । 
आज हालत यह है कि खाद्य पदार्थ खासकर फल और सब्जियों के दाम बेतहाशा बढ़ रहे हैं। यहां तक कि वे मध्यम वर्ग के लोगों की पहुंच से भी बाहर हो रहे हैं। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि सब्जी के दाम खासकर प्याज , गोभी , बैंगन , आलू आदि के दाम बेतहाशा बढ़ गए हैं। किसानों को उससे कोई लाभ नहीं मिल रहा है। उधर उपभोक्ता पिस रहे हैं। जमाखोर और बिचौलिये चांदी काट रहे हैं और सरकार चुप्पी साधे बैठी है ! कुछ अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि सकल घरेलू उत्पाद [जी.डी.पी.] में वृद्धि आवश्यक है | अतः आम आदमी के काम में आने वाली रोजमर्रा की वस्तुओं के उत्पादन में तेजी से वृध्दि जरूरी है। इस विचार से बहुत सहमत नहीं हुआ जा सकता , क्योंकि जनहित पहले हैं और हमारे देश लोकतान्त्रिक देश है , जो ' जनता का , जनता के लिए , जनता द्वारा ' के उसूल पर चलता है
इसलिए ज़रूरी है कि महंगाई घटे और आम जन को राहत मिले | साथ ही जनता की समस्याओं को कम करनेवाले क़दम उठाए जाएं | कांग्रेस ने आधार कार्ड को अनिवार्य ठहराकर देशवासियों के लिए जो अनावश्यक समस्याएं पैदा कीं और सत्ता से हाथ धो बैठी , अब भाजपा भी कांग्रेस के नक्शेकदम पर चलने लगी है | मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद बैंक खाते तो खोलवाए , जिन पर कांग्रेस ने अपने सत्ताकाल में पाबंदी लगा रखी थी | निःसंदेह यह ऐतिहासिक कार्य है
मोदी सरकार ने जनता को राहत पहुँचाने के आधार कार्ड की अनिवार्यता समाप्त करने का ऐलान किया था , लेकिन इस पर अमल न किये जाने की ढेर सारी शिकायतें हैं | कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि ' आधार ' की अनुपस्थिति में अब सब्सीडी वाली रसोई गैस की आपूर्ति बंद कर दी गयी है | एक ओर टी.वी. पर सरकार की ओर से विज्ञापन दिखाए जा रहे हैं कि ' आधार ' नहीं है , तब भी अपने बैंक अकाउंट को गैस एजेंसी से लिंक कर सब्सीडी का लाभ पाया जा सकता है , लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं है ! निश्चय ही इन फ़ालतू कागज़ी कार्रवाई के कामों से जनसमस्याओं में ग़ैरज़रूरी बढ़त हुई है , जिसका खामियाजा सत्ताधारियों को भुगतना ही पड़ेगा | संसार के किसी भी देश में ' आधार ' सफल नहीं सिद्ध हुआ है |   



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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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