Feb 3, 2015

' बेटी बचाओ , बेटी पढाओ '

' बेटी बचाओ , बेटी पढाओ ' 
हमारे देश में कन्या भ्रूणहत्या ज़ोरों पर है | ऊपर से इन हत्याओं पर न तो कोई शर्म है और न ही कोई पछतावा ! बस , बेटे की चाहत बेटियों की हत्या करवा रही है | कानून चुप है और सभी ख़ामोश तमाशाई बने हुए हैं ! इस नीरवता भरे माहौल में बधाई के पात्र हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , जिन्होंने तन्द्रा भंग की है और समाज में लड़कियों की गिरती संख्या, भ्रूण हत्या पर गंभीर चिंता जताई है | 
हरियाणा से विगत 23 जनवरी को ' बेटी बचाओ , बेटी पढाओ ' शीर्षक से राष्ट्रीय अभियान का शुभारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि बेटा-बेटी एक समान हमारा मंत्र होना चाहिए। भ्रूण हत्या समाज के प्रति द्रोह है। यह समय आरोप-प्रत्यारोप का नहीं है। हर किसी की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक एक समाज के रूप में हम इस समस्या के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, जागरूक नहीं होंगे। हम अपना ही नहीं, आने वाली सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी एक भयंकर संकट को निमंत्रण दे रहे हैं। 
उन्होंने कहा कि सांसारिक चक्र के लिए जरूरी है कि एक हजार लड़के पैदा हों तो एक हजार लड़कियां भी पैदा हों। हरियाणा में ही महेंद्रगढ़ समेत कई जिलों में लड़कियों की संख्या बहुत कम हैं। उन्होंने कहा, माताओं से पूछना चाहता हूं कि बेटी नहीं पैदा होगी तो बहू कहां से लाओगी। हम जो चाहते हैं समाज भी तो वही चाहता है। हम चाहते हैं कि बहू पढ़ी-लिखी मिले, लेकिन बेटियों को पढ़ाने के लिए तैयार नहीं हैं। आखिर यह दोहरापन कब तक चलेगा। अगर हम बेटी को पढ़ा नहीं सकते तो शिक्षित बहू की उम्मीद बेमानी है। 
प्रधानमंत्री ने कहा कि जिस धरती पर मानवता का संदेश दिया गया हो वहां बेटियों की हत्या दुख देती है। यह अल्ताफ हुसैन हाली की धरती है। हाली ने कहा था, मांओ, बहनों, बेटियां दुनिया की ज़ीनत तुमसे है | शास्त्रों में भी बेटियों की प्रशंसा की गई है। उन्हें आशीर्वाद दिया गया है। उसी धरती पर बेटियों को बेमौत मार दिया जाए। इसके मूल में हमारे मन की बीमारी है। जिसमें हम बेटियों को परायी मानते हैं। मां भी बेटों को दो चम्मच घी देती है तो बेटी को एक चम्मच। यह समस्या पूरे देश की है। आखिर कब तक हम बेटियों को परायी मानते रहेंगे। 
उन्होंने कहा कि गर्भ में पाल रही बहन कभी नहीं चाहती की उसकी बेटी को मार दिया जाए, लेकिन परिवार का दबाव उसे इसके लिए मजबूर कर देता है। हम किसी भी तरह से खुद को इक्कीसवीं सदी का नागरिक कहने योग्य नहीं हैं। प्रधानमंत्री ने उस वक्त इस अभियान की शरूआत की है , जब संयुक्त राष्ट्र का यह ताज़ा अध्ययन - निष्कर्ष सामने आया है कि भारत में लिंगानुपात प्रति हज़ार पुरुषों पर केवल 918 महिलाओं का रह गया है | यह 2008 में 915 महिलाओं का था |  
'ट्वेंटी इलेविन ' संस्था द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार , हमारे देश में पिछले तीस वर्षों में एक करोड़ बीस लाख कन्याओं की हत्या की आशंका है | महिलाओं के अनुपात में यह असंतुलन वास्तव में बहुत चिंताजनक है | प्रधानमंत्री ने इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान देकर जो जागरूकता पैदा करने की कोशिश है , वह सराहनीय है | इस सिलसिले में पहले सुप्रीमकोर्ट ने भी कड़ी टिप्पणी की थी और इस कुप्रथा पर रोक लगाने का आदेश दिया था , मगर इस ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया | यूँ तो लड़के-लड़की में फर्क करने यानी बेटे को तरजीह देने की मानसिकता समाज में सदियों से रही है, पर अत्याधुनिक तकनीकी साधनों के इस जमाने में इसने एक क्रूर शक्ल अख्तियार कर ली है। 
बहुत-सी कन्याएं गर्भ में ही मार दी जाती हैं, कुछ जन्म लेने के बाद भी जीवित नहीं रहने पातीं | लिंग चयन निषेध अधिनियम 1994 के लागू होने के बावजूद इस पर रोक नहीं लग पा रही है |  जिन लोगों की पहुंच अल्ट्रासाउंड जैसीतकनीकों तक है, वे पहले ही चोरी-छिपे गर्भ में पल रहे भ्रूण के लिंग का पता लगा लेते हैं और बेटी होने पर उसे नष्ट करा देते हैं। इन अवसरों पर डाक्टर क़ातिल की भूमिका में नज़र आते हैं , मगर क़ानून उनका बाल - बांका तक नहीं कर पाता ! कन्या भ्रूणहत्या के मामले में एक पहलू यह है कि गर्भवती महिला पर आमतौर पर उसके पति या परिवार वालों का दबाव होता है, जिसके सामने वह खुद को लाचार पाती है। 
सुप्रीमकोर्ट के तत्कालीन जज श्री के . एस  राधाकृष्णन और श्री दीपक मिश्रा ने कहा था कि इस सम्बंध में बने क़ानून के क्रियान्वयन न होने की वजह से महिला - पुरुष का अनुपात बिगड़ गया है | कोर्ट ने कहा कि धार्मिक ग्रंथों , वेदों , स्मृतियों , उपनिषदों और लोकोक्तियों में महिलाओं का सम्मान करने का निर्देश दिया गया है एवं धार्मिक अनुष्ठानों में उनका स्थान नियत किया गया है | कोर्ट ने कुछ उद्धरण भी कोट किए | कन्या भ्रूणहत्या के विरुद्ध जनचेतना जगाने के अन्य प्रयास भी किए गए , जो  संयुक्त राष्ट्र की उक्त रिपोर्ट के मद्देनज़र विफल हो गए लगते हैं | 
इस सिलसिले में भी इस्लाम की शिक्षाएं बड़ी कारगर हो सकती हैं | हज़रत मुहम्मद [ सल्ल .] से पूर्व अरब में महिलाओं की हालत बहुत ख़राब थी | उन्हें कोई अधिकार प्राप्त न था | विरासत में किसी तरह का हिस्सा न था | पैदा होते ही लड़कियों की हत्या , बलात्कार और दुराचार सामान्य बात बन चुकी थी | कुमार्गगमन और बेहयाई आम थी | महिला - शोषण की इंतिहा थी . पुरुष जितनी चाहता शादियाँ कर लेता , यहाँ तक कि सौतेली माँ को भी अपनी पत्नी बना लेता | हज़रत मुहम्मद [  स . ]  ने इस महिला - विरोधी गंदी मानसिकता को पूरी तरह स्वस्थ - सकारात्मक मानसिकता में बदल दिया | महिलाओं को उनके स्वाभाविक अधिकार दिए एवं आदर - सम्मान प्रदान किया | आपने लड़कियों के अच्छी तरह लालन - पालन की शिक्षा और प्रेरणा दी | उनकी हत्या पर रोक लगा दी | समाज को भ्रूणहत्या जैसी लानत से मुक्त किया | 
इस्लाम लड़कों को लड़कियों पर प्राथमिकता नहीं देता | हज़रत मुहम्मद [ स . ] ने कहा ,  '' जिस व्यक्ति के लड़की हो वह न तो ज़िन्दा गाड़े , न उसके साथ उपेक्षा का व्यवहार करे , न उस पर अपने लड़के ही को प्राथमिकता दे , तो अल्लाह उसे जन्नत में दाख़िल करेगा '' [ अबू दाऊद ] | एक और हदीस में है -  '' जिसने तीन लड़कियों की परवरिश की , उनकी शिक्षा - दीक्षा का प्रबंध किया , उनका विवाह किया और उनके साथ बाद में भी सद्व्यवहार किया , तो उसके लिए जन्नत है '' [ अबू दाऊद ]  | इस सिलसिले में इस्लाम की और भी शिक्षाएं हैं , जो महिला - सम्मान के लिए उभारती हैं |
- डॉ . मुहम्मद अहमद 

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मैं अपना क्या परिचय कराऊं ... आप इतना जान लीजिए कि कुछ लिखता रहता हूँ , इस संकल्प एवं आकांक्षा के साथ कि किंचित मेरे विचार समाजोपयोगी - मानवोपयोगी बन सकें | इस क्रम में '' साहित्य मन '' आपके समक्ष है , जो एक प्रयास है खट्टे - मीठे अनुभवों की आवयविक समग्रता का , वेदना - समवेदना , अनुभूतियों और अनुभवों को बाँटने का ... यह भी कह सकते हैं कि '' साहित्य मन '' आत्म - अन्वेषण की प्रक्रिया है , आत्मशोधन का पड़ाव है , जिसका उद्देश्य किसी पर भी आघात एवं आलोचनात्मक प्रहार करना तथा किसी को भी नीचा दिखाना नहीं है | साथ ही साहित्य - प्रवाह को अवरुद्ध करना भी नहीं है | मैं अपने बारे में यह बताता चलूं कि मैं लगभग 32 वर्षों से पत्रकारिता और साहित्य की सेवा में संलग्न हूँ | प्रतिदिन कुआँ खोदता और पानी पीता हूँ , जिस पर मुझे सायास गर्व है | --- सबको यथायोग्य अभिवादन के साथ ----- आपका अपना ही ------------ [ डॉ .] मुहम्मद अहमद [ 19 दिसंबर 2013]

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